भोर से हीरक तक-[ 2 ]

         


    अगले दिन, सुबह से हमारे यहाँ बहुत आगंतुक आ रहे थे।  वह दिन भी बहुत अपूर्व था। 

    सुबह की पहली किरण के साथ माँ ने मुझे जगाया। तब मैंने देखा कि घर के सभी सदस्यों ने नये कपड़े पहने हुए थे।  

    मेरी माँ, दादी माँ और बुआ जी गहने भी पहनी हुई थीं। और रमणी दीदी ने भी एक बहुत खूबसूरत गाउन पहना हुआ था। मां ने मुझे भी एक नया गाउन पहनाया। और उन्होंने मेरे बालों की पोनीटेल बना दी। लेकिन मैं तो नहीं चाहती थी। क्योंकि मैं अपनी नई गुड़िया के साथ खेलना चाहती थी, जो मेरे पिता ने मुझे परसों दी थी।

     रमणी दीदी ने मुझे बुलाया। तब मैं उनके पास गया। वहाँ जाते समय मैंने देखा कि घर की सभी दीवारों से गुब्बारे और फूल लटक रहे थे। घर के सामने जो नारंगी का वृक्ष था, उस पर एक लाउडस्पीकर भी रखा था। आँगन में बहुत सारी कुर्सियाँ भी थीं। उधर लोग बातें कर रहे थे। 

     कुछ देर बाद, खाना खाने के लिए बुआ ने रमणी दीदी को बुला लिया।  उसके बाद मैं वहां अकेली थी। थोड़ी देर बाद मेरी माँ ने मुझे भी बुलाया। 


      "इधर आओ गीता, अभी खाना खाओ। जल्दी करो, मुझे और भी बहुत काम है।"


       मैं नाश्ता करने चली गई। मेज़ पर खाने-पीने की बहुत सारी चीज़ें थीं।

     वहां रमणी दीदी भी मौजूद थीं, क्योंकि मुझसे पहले वह बुआ के साथ वहां गई थीं। 

     माँ ने मेरे हाथ पर मिठाई का एक टुकड़ा रखा। रमणी दीदी ने मेरे हाथ से वह मिठाई का टुकड़ा छीन लिया और बाहर फेंक दिया। लेकिन रमणी दीदी की माँ यानी मेरी बुआ ने उसे नहीं डांटा। जब रमणी दीदी मुझे पीटने लगीं, तो मेरी माँ मुझे वहां से बाहर ले गईं।

     वहाँ से जाते हुए माँ बुदबुदा रही थीं, 


      "छी! बदतमीज़ लड़की। उसने इसे कितना पीटा। फिर भी ननद ने उसे कुछ भी नहीं कहा। अगर इसके पापा ने देख लिया तो... वे मुझे खूब सुनाएंगे।... यह काली-कलूटी मेरे पति की ज़िंदगी है ना... इसीलिए यह लड़की मासूम होने पर भी मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आती।"


      घर के सामने पहुँचते ही माँ ने मुझसे कहा, 


     "वह देखो गीता, चाचियाँ डफली बजा रही हैं।"

      उस बड़ी डफली के चारों तरफ बहुत सी महिलाएँ और आदमी बैठे हुए थे।

      कुछ देर बाद मैंने देखा कि मेरे चाचाजी के साथ एक दुल्हन भी थी। मध्याह्न भोजन के बाद, मेरे चाचाजी पड़ोस की एक चाची के साथ मिलकर गीत गाते थे। 


     मेरे चाचाजी ने गाया, 

     " मेरा प्यार भी तू है - ये बहार भी तू है ,

       तू ही नज़रों में जान -ऐ- तमन्ना 

       तू ही नज़ारों में, नज़ारों में। "


      तब उन चाची ने गाया, 

" मेरा प्यार भी तू है - ये बहार भी तू है, 

  तू ही नज़रों में जान -ऐ तमन्ना 

  तू ही नज़ारों में नज़ारों में ".......


      मैंने देखा कि उन दोनों की आवाज़ सुनकर मेरे पिताजी कमरे से बाहर झाँके और फिर से अंदर चले गए।


     फिर चाचाजी गाने लगे, 

      "तू ही तो मेरा नील गगन है....."

     और फिर चाची गाने लगीं, और वे दोनों काफी देर तक गा रहे थे। 

      मेरे पिताजी भी बार बार कमरे से बाहर निकल कर वापस अंदर जा रहे थे। चाचाजी और पड़ोस वाली चाची दोनों सुरीला नहीं गाते थे, लेकिन मैं चुपचाप सुन रही थी।

    और गाते वक्त चाचाजी की लाइनें भी पड़ोस वाली चाची गा रही थीं, क्योंकि चाचाजी को गीत नहीं आता था।

      वह पड़ोस वाली चाची साड़ी और ब्लाउज़ पहने हुए नाच-नाचकर गा रही थीं। चाचाजी और चाची दोनों चिल्ला रहे थे। चारों तरफ हर कोई चिल्ला रहा था और कोई भी उनका गाना नहीं सुन रहा था।

     जैसे-तैसे करके गाना खत्म हुआ। इसके बाद मेरे पिताजी ने चाचाजी को अंदर बुलाया और मैं भी पिताजी के पास चली गई।

        पिताजी ने चाचाजी को खूब डांटा,

      "तुझे ज़रा भी शर्म नहीं है क्या? अपनी नई नवेली दुल्हन के सामने पराई औरतों के साथ लोगों के सामने प्रेम गीत गा रहा है! ऊपर से आज जैसा दिन! लोग क्या-क्या सोचेंगे? तू तो कभी सुधरने वाला नहीं। ह्म्म्! अब जा यहाँ से, अपनी पत्नी के पास बैठ! नालायक कहीं का!"


        चाचाजी ने मुँह उठाकर भी नहीं देखा और चुपचाप वहाँ से चले गए। उस समय मेरी दादी माँ भी वहाँ मौजूद थीं। दादी ने पापाजी से कहा,


      "रहने दो छोटे बेटे, उसे मत डांटो। अभी उसे नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत। आखिर वह घर में सबसे छोटा है ना।"


      "पता नहीं?... क्यों पता नहीं? बदतमीज़ कहीं का!" 


      पापा जी बोले। तब दादी खाँसती हुई वहाँ से चली गईं, क्योंकि जब भी उन्हें गुस्सा आता, उन्हें खाँसने की आदत थी।


      शाम को आए हुए गाँव वालों के साथ मैं भी चाय पी रही थी। तभी रमणी दीदी ने मेरा हाथ पकड़कर कहा, 


      "आओ गीता, हम नई मामी के पास चलेंगे।"


       फिर मैं भी उनके साथ अपनी नई चाची के पास चली गई।

      नई चाची एक पुराना लंबा गाउन पहने बिस्तर पर बैठी थीं। 


      "मामी, छोटे मामाजी कहाँ हैं?" 


     रमणी दीदी ने नई चाची से पूछा। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। रमणी दीदी ने बार-बार पूछा, तब चाची ने बहुत कठिनाई से शब्द इकट्ठा करते हुए जवाब दिया।


      " मुझे... पता...न्...   न..हीं ...!"


      " चाची, आपका नाम क्या है? "

रमणी दीदी ने पूछा। 


     "........... .. "


     "बताइए न चाची जी, आपका नाम क्या है? "


      " ...................  "


     " प्लीज़ हमें आपका नाम बताइये ना, "


       " ..................."


       तभी हमारी दादी आईं।


       "और छोटी बहू, तुम्हारा नाम क्या है?" दादी ने नई चाची से पूछा।


       " ............ "


   दादी ने फिर से दो-तीन बार पूछा, लेकिन चाची ने कुछ भी नहीं कहा।


     "अरी ओ! क्या तुम बहरी हो? या गूंगी हो?"


      लेकिन चाची ने कुछ भी नहीं कहा। तब रमणी दीदी ने कहा,

      

      "नहीं, नहीं दादी माँ, इन्हें सब सुनाई दे रहा है, और ये बोल भी सकती हैं।"


दादी ने चिल्लाया,

      "तो बताओ। तेरा नाम क्या है। "


"............"


"तेरे को नाम नहीं है क्या?"


"..........."


    बार-बार पूछने पर भी चाची के चुप रहने से दादी के गुस्से का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था।


     उन्होंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, 

     "अरी! जल्दी से तेरा नाम बता वरना मैं तुझे....,"


    तभी नई चाची के मुँह से आवाज़ निकली। वे फुसफुसाईं, 


"कु ..सु.. मा.. !" 


    यह सुनकर रमणी दीदी चिल्लाने लगीं, 

      "कुसुमा, कुसुमा, कुसुमा, कुसुमा......." 


    तब हमारी दादी ने कहा, 

      "कुसुमा, अब तुम जाओ। रसोईघर जाकर चाय पी लो।"

    ऐसा कहकर दादी कमरे से बाहर चली गईं। अब तक रमणी दीदी ने अपनी चिल्लाहट बंद नहीं की थी, 

    "कुसुमा, कुसुमा, कुसुमा, कुसुमा......"

     उसी समय विशाल फूफा जी कमरे में आ गए और उन्होंने रमणी दीदी को खूब सुनाया।

      चारों तरफ अंधेरा फैल रहा था। उसी अंधेरे के बीच एक पड़ोसी मामाजी आए। उन्हें देखकर मेरे पिताजी बोले,

     "हाय! कैसे हो?" 

     ऐसा कहते हुए पापा अंदर चले गए। उस वक्त माँ रसोई में चाय बना रही थीं।

     जो पड़ोसी मामाजी आए थे, वे कुर्सी पर बैठकर मेरी गुड़िया की पलकें हिलाने लगे। तब गुड़िया की पलकों से 'टक-टक' की आवाज़ निकलने लगी। यह सुनकर दादी ज़ोर से बोलीं, 

     "रिचार्ड, बच्ची की गुड़िया को मत तोड़ना!"

     तब रिचार्ड मामा ने मेरी गुड़िया को मेज़ पर रख दिया। इसके बाद दादी ने कहा, 

     "रिचर्ड, इधर आओ। चाय तैयार है। कुछ खाकर चाय पी लो।" 

      जब रिचार्ड मामा चाय पीने चले गए, तो एक और दादाजी वहाँ आए। उनके हाथ, सिर और आवाज़ काँप रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा, 

    "आओ छोटी बेटी, हम नाचेंगे।"

     मैं शर्मा गई। दादाजी नाचने लगे और नाचते-नाचते कहने लगे, 

"दहिं, दहिं, दहिं, दहिं....."।    

  मैं अपनी माँ के पास चली गई। तब माँ ने मुझसे पूछा, 

    "वे कौन दादाजी हैं?"

मैंने कहा,

        "दहिं दादा।"

[अगले भाग से संबंधित।]   


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