अकेलेपन के फूल खिल के मेरे दिल के तालाब में हंस कर मुरझाएगा , जगह के बिना वेदी पर । खिले फूलों को चूम लूं इन की खुशबू भी पा कर लूँ तितलियों को नहीं देती हूँ प्राण की तरह मैं रखती हूँ ।। यादों की पगडंडी सजाते, मन में कहानी छिपाते आँखों में गीली सूखाये तार के स्वर द्वारा बजाये ।।। - दुल्कान्ति -
अगले दिन, सुबह से हमारे यहाँ बहुत आगंतुक आ रहे थे। वह दिन भी बहुत अपूर्व था। सुबह की पहली किरण के साथ माँ ने मुझे जगाया। तब मैंने देखा कि घर के सभी सदस्यों ने नये कपड़े पहने हुए थे। मेरी माँ, दादी माँ और बुआ जी गहने भी पहनी हुई थीं। और रमणी दीदी ने भी एक बहुत खूबसूरत गाउन पहना हुआ था। मां ने मुझे भी एक नया गाउन पहनाया। और उन्होंने मेरे बालों की पोनीटेल बना दी। लेकिन मैं तो नहीं चाहती थी। क्योंकि मैं अपनी नई गुड़िया के साथ खेलना चाहती थी, जो मेरे पिता ने मुझे परसों दी थी। रमणी दीदी ने मुझे बुलाया। तब मैं उनके पास गया। वहाँ जाते समय मैंने देखा कि घर की सभी दीवारों से गुब्बारे और फूल लटक रहे थे। घर के सामने जो नारंगी का वृक्ष था, उस पर एक लाउडस्पीकर भी रखा था। आँगन में बहुत सारी कुर्सियाँ भी थीं। उधर लोग बातें कर रहे थे। कुछ देर बाद, खाना खाने के लिए बुआ ने रमणी दीदी को बुला लिया। उसके बाद मैं वहां अकेली थी। थोड़ी देर बाद मेरी माँ ने मुझे ...
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