भोर से हीरक तक-[1]


  1.        उस समय हमारे घर के चारों ओर बहुत से पेड़ और उन पर ढेरों फल थे। इसलिए सुबह-सुबह पत्तों की छाया और धूप मिलकर पूरे आँगन में लंबी और खूबसूरत आकृतियाँ बना देती थीं। और हर सुबह 'रमणी' दीदी अपने पैर के अंगूठे से उन छायाओं के चारों ओर गोलाकार लाईनें खींच रही थीं। 


           उस दिन बहुत अनोखा दिन था, क्योंकि सुबह से ही हमारे घर के सामने वाली सड़क पर बहुत सारे लोग बार-बार आ-जा रहे थे। वे सभी हमारे घर की ओर ही आ रहे थे, लेकिन वो लोग हमारे घर के सामने से नहीं, बल्कि पीछे से आ रहे थे। उन लोगों के बीच बहुत सारी चाचियाँ भी थीं। कुछ लोग वापस जा भी रहे थे। बार- बार दहलीज़ पर आ कर मैं उन्हें देख रही थी। धीरे-धीरे शाम भी घिर आई थी। कुछ देर दहलीज़ पर ठहर कर, मैं वापस घर के अंदर लौट आई थी।

     

        उस दिन हमारे रसोईघर में चूल्हा नहीं जल रहा था, क्योंकि मेरी बुआ के पति, पियसेन-जिन्हें मैं विशाल फूफा कहती थी-ने रसोई के समीप ही सारा काम करने के लिए एक बेहद विशाल कमरा बनवा दिया था।  मां ने कहा था कि इस कमरे का नाम 'भंडारघर' है। जब मैं यहां आई तो मैंने देखा कि भंडारघर में भी बहुत सारी चाचियां थीं। और वे काम में लगी हुई थीं। मेरी दादी इन्हें काम सौंप रही थीं। बुआ के पति विशाल फूफा भी काम कर रहे थे। 


      " कमला, ये मिर्च धूप में रखना।"


      "करोलिस, यहाँ आओ। इन सभी कुर्सियों को सामने ले जाओ।"

  

      "पियसेन, क्या तुम चाय पी लिये हो ?  अगर नहीं तो सबसे पहले चाय पी लो। उसके बाद इन जलाऊ लकड़ियों को काट डालो।"


      अतिरस श्रीलंका की एक पारंपरिक मिठाई है जो चावल के आटे और शहद से बनाई जाती है। उस पल में जिलिं चाची उन्हें तलने की तैयारी कर ही रही थीं कि तभी मेरी दादी ने उन्हें आवाज़ दी,


        "अरे ओ.. जीलिं ! अब तुम 'अतिरस' तलना शुरू करो। वरना रात हो जाएगी।" 


     उसी बीच एक चाची ने कहा, 

      " दीदी, नारियल का तेल खतम हो गया है ना।"


       "रुको ज़रा। मैं अभी लाती हूँ।"   

दादी ने जवाब दिया।


       उधर दो चाचियां मिठाईयों के लिए आटा बना रही थीं। वे भीगे हुए चावल को ओखली में डाल कर कूट रही थीं।  वो दोनों एक ताल के अनुसार कूट रही थीं। 

    ".…"डिग" , डिग", 

          "डिग","डिग", 

          "डिग" , डिग", 

          "डिग","डिग"....."


        दोनों में से एक चाची पतली थीं और दूसरी मोटी थीं। छरहरी काया वाली चाची का घाघरा बहुत सुंदर था। वह सुंदर घाघरा नाचते हुए यहाँ-वहाँ झूल रहा था। क्योंकि वह चाची बहुत सुंदर तरीके से भीगे हुए चावल कूट रही थीं। उनके पास दो चाचियां थीं, जो नारियल खुरचने वाली बेंच पर नारियल खुरच रही थीं।    

   ".....क्रास , क्रास, 

         क्रास,  क्रास,

         क्रास,  क्रास,

          क्रास,  क्रास,......."

     उनके सिर ऊपर नीचे झूल रहे थे। उन चाचियों के सिर के साथ-साथ लंबे-लंबे झुमके भी झूल रहे थे। 

       उधर एक खूबसूरत दादी भी थीं जो रसोई में काम कर रही थीं। इन्होंने एक ब्लाउज और छींट पहना हुआ था। उन दादी की यह छींट बहुत खूबसूरत थी, क्योंकि इसे बड़े-बड़े फूलों से डिज़ाइन किया गया था। और उनके ब्लाउज की दोनों आस्तीनें बहुत बड़ी थीं। 

       वो दादी बहुत ही छोटी थीं और उनके बाल बहुत लंबे थे। उन्होंने अपने लंबे बाल को गोलाकार तरीके से बना कर बांध ली थीं। उस गोलाकार बाल पर सुंदर फूल भी लगे हुए थे। उनके सिर पर ढेर सारे बाल क्लिप व हाथों पर बहुत सारी चूडियाँ भी थीं। और सभी उँगलियां अँगूठियों से भरी हुई थीं। उनकी आवाज़ किसी पक्षी की तरह बहुत मीठी और ऊंची थी।

      मेरी दादी ने इन दादी को कोई काम नहीं दिया; क्योंकि दोनों दादियाँ एक-दूसरे से थोड़ा डरती थीं।


        मैंने उसी पल तय कर लिया कि मैं उन्हें 'नन्ही दादी' कहूँगी, लेकिन सच तो यह है कि हमारे गाँव में हर कोई उन्हें 'नन्ही दीदी' कहकर पुकारता था, और मेरे घर में सभी भी ऐसा ही करते थे।

       जब मैं उनकी तरफ देखते हुए अपने विचारों में खोई हुई थी, तभी अचानक मेरे चाचाजी अंदर आ गए।  


       नन्ही दादी पर एक नज़र डालते हुए, उन्होंने मज़ाक उड़ाया,

        "नन्ही दीदी, अगर इस वक्त गरजते बादलों के साथ अचानक एक भीषण तूफ़ान आ जाए, तो हम बिना किसी डर के आपको सीधे बाहर फेंक सकते हैं... क्योंकि आपके शरीर का एक-एक इंच धातु से ढका हुआ है! हा! हा! हा!"


       "अरे मिल्टन, तुम भी ना... जब भी मुझे देखते हो, बस कुछ न कुछ बकते ही रहते हो!"

        नन्ही दादी ने अपने चिरपरिचित सीटी जैसे सुरीले स्वर में कहा।


      उस दिन नन्ही दादी के पति 'नेपो सिंज्ञो' दादा भी हमारे यहां आये थे। 

      वैसे मेरे पापा जी और नेपो सिंज्ञो दादाजी बैठकख़ाने में बातचीत कर रहे थे। उस वक्त मेरी मां भी भंडारघर में काम कर रही थीं। तब दादी ने मेरी माँ से कहा,


      "बड़ी बहू,...अरी ओ बड़ी मालकिन...!! अब तुम इस बिटिया को साफ करके इसे कुछ खिला दो।.... अबे ओ! यह सुनो बड़ी।  सबसे पहले हमारे छोटे बेटे को और नेपोसिंज्ञो को चाय बिस्कुट वगैरा दे दो।" 


        कुछ देर बाद मेरी माँ पिताजी और नेपो सिंज्ञो दादाजी, दोनों के लिए चाय ले जा रही थीं। मैं भी माँ के पीछे चली गई हूँ।

           उधर मेरे पिताजी के साथ नन्ही दादी के पति बातचीत कर रहे थे। उनकी आवाज़ कांप रही थी, और हाथ तथा सिर कांप रहे थे। वे कुछ खा रहे थे और बार-बार थूक रहे थे। माँ जी ने चाय की ट्रे स्टूल पर रखी और वापस चली गयी।  नेपोसिंज्ञो दादाजी ने गट-गट करके चाय पी ली। वे किसी भी चीज़ को ज्यादा देर तक हाथ में रोक कर नहीं रख सकते थे, क्योंकि उनके हाथ कांपते थे।     

       कुछ देर बाद माँ मुझे बुलाने वापस आईं। उस वक्त नेपोसिंज्ञो दादाजी ने तम्बाकू का एक बड़ा टुकड़ा लेकर उसे अपने मुंह में डाल लिया। उसे देखकर मेरी माँ, 

         "ओव्वह्यो.. र्रक्प्प्तू..ह्ओक, ओवे.. क!"     


     करती हुई उल्टी करने लगीं। मेरे पिता जी ने माँ को खूब डांटा। माँ चुपचाप घर के अंदर चली गईं। यह देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। 

      चारों ओर से अंधकार फैल गया था। सभी लोग वापस जा रहे थे। नन्ही दादी भी अपने पति के

 साथ वापस चली गईं।            

   (अगले भाग से संबंधित।)


Comments

Popular posts from this blog

නිශා , නුඹ හිනැහියන්

यादों के फूल।

भोर से हीरक तक-[ 2 ]