भोर से हीरक तक-[10]

         


               उनके जाने के बाद घर में जो सन्नाटा पसरा, उसे माँ की आवाज़ ने घेर लिया। कहता है कि, खुशियां बांटने से बढ़ती है और दुख बांटने से कम होता है, इसलिए हमारी माँ सुबह से शाम तक, फिर शाम से सुबह तक दादाजी की मृत्यु तथा ज़िंदा रहते समय की यादों के बारे में ही बात करती थीं।

       सुबह से शाम तक तो सभी जागते रहते हैं, लेकिन रात से सुबह तक  कौन जागता रहता है भला? मगर दादाजी की हत्या के बाद, केवल हमारे घर के सदस्य ही नहीं, बल्कि हमारे गाँव के आधे से ज़्यादा लोग बिना नींद के रातें बिताने लगे थे।


         जैसे-तैसे करके हम शाम तक का इंतज़ार कर रहे थे। आख़िरकार शाम ढल गई। दादी, बुआ, रमणी दीदी और विशाल फूफा वापस आ गए। 

     उनके आते ही सबसे पहले माँ ने दादी माँ से पूछा, 

     "मामी, वो बाबा जी ने क्या कहा? उन्होंने कोई इशारा बताया क्या?"


     माँ का सवाल सुनते ही दादी माँ के भीतर का बाँध टूट गया। वो अपने दिल में दबी हुई सारी बातें बिना रुके बताने लगीं—

     "उन्होंने हमें अंदर बुलाया। उसके बाद वो कांपते हुए कड़े स्वर में बोले, 

     'बच्चा! तुम्हारे घर की मुख्य शहतीर को ही किसी ने काट दिया है... मैं सही कह रहा हूँ या नहीं?'


     तब पियसेन ने आगे बढ़कर जवाब दिया, 

    'हाँ बाबा जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं!'


      इस पर बाबा ने पियसेन की ओर देखा और गंभीर होकर कहा, 

     'तो फिर अब मुझसे क्या जानना चाहते हो?'


पियसेन ने हाथ जोड़कर कहा, 

   'बाबा जी! हमें बस यही जानना है कि... वह दुर्घटना कैसे हुई थी?'


     बाबा ने आँखें बंद कर लीं और गहरी सांस खींचकर बोले,—

     'बच्चा! वह प्राणी सिर से पाँव तक चादर ओढ़कर सो रहा था... ओढ़ी हुई चादर के साथ ही वह पेशाब करने चला गया... उसने पिछला दरवाज़ा खोला... बाहर चला गया... अपना काम कर रहा था... ॐ... एक अनजान आदमी वहाँ छुपा हुआ था... वह घर की ओर बढ़ रहा था... मुख्य प्राणी अपनी चादर ठीक कर रहा था... चादर उस अनजान आदमी के सिर से छू गई! वह खुले हुए दरवाज़े से अंदर घुस गया... ॐ... एक बड़ी डफ़ली! वह उस बड़ी डफ़ली के पीछे छिप गया... ॐ... मुख्य प्राणी वापस आ रहा था... वह अंदर आया... दरवाज़ा बंद किए बिना ही वह फिर से सोने चला गया... वह सो रहा है... खर्राटों की आवाज़... गर् र्... अनजान आदमी बिस्तर के पास आया... उसने यहाँ-वहाँ देखा... बिस्तर के पास एक कुदाल थी... ॐ... उसने वह कुदाल उठा ली... और मुख्य प्राणी के सिर पर धड़ाम से मार दिया!... ॐ... वह खुले हुए दरवाज़े से भाग गया......'


     "हा...?! कौन हो सकता है वह आदमी?" 

माँ ने गहरी हैरानी और खौफ से पूछा।


     "भले ही वह आदमी कोई भी हो... लेकिन मैं तो यह सोच रही हूँ कि... उसने हमारे ही घर के किसी सदस्य की मदद से इस घिनौने काम को अंजाम दिया है," 

बुआ ने फुसफुसाते हुए कहा।


     "हमारा छोटा बेटा,... मेरा मतलब तुम्हारे भैया जी, ऐसा नीचा काम कभी नहीं कर सकते! ... और क्या मैं खुद अपने पति को मार डालने में किसी की मदद करूँगी भला? हाँ?! ... फिर रही बड़ी मालकिन, तो क्या वह अपने ही सगे मामाजी को मारने की साज़िश रचेगी? ... और कुसुमा? वह भला कैसे मदद कर सकती है, जो ठीक से दो शब्द भी नहीं बोल पाती! बाकी बचे पियसेन और हमारा छोटा लड़का। अगर मददगार पियसेन होता, तो क्या वह खुद हमारे साथ बाबा के पास जाता? ... मैंने सबके बारे में सोच लिया। मुझे तो छोटे लड़के पर ही शक है! ... हाय मेरे भगवान! अगर उस बेचारे को पुलिस ने पकड़ लिया, तो मैं क्या करूँगी? पापा तो हमें छोड़कर चले ही गए हैं..."

     दादी माँ ने रोते हुए कहा।  उनकी बातें सुनकर बुआ को गहरा गुस्सा आ गया।


       "हूँ! आपकी बात तो बहुत अच्छी है ना माँ! अगर छोटे लड़के ने हत्यारे की मदद की है, तो उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाने का इंतज़ार क्यों करें? बल्कि हमें खुद उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना चाहिए!" 

बुआ ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा।


      "क्यूं छोटे बेटे, उन बाबा की बातों के बारे में तुम क्या सोचते हो?"

दादी ने पापा से पूछा।  


     "...सच ही कहूँगा तो मुझे भी उस नालायक पर शक है, क्योंकि उस रात वह घर पर नहीं था।...लेकिन अम्मा, हड़बड़ी में कुछ तय करना उतना अच्छा नहीं है,... क्योंकि बाबाओं की बातें पुलिस नहीं मानती।… लेकिन, उन बाबाजी की बात पर... मुझे तो थोड़ा यकीन भी हो रहा है, क्योंकि उन्होंने कहा था कि वहाँ एक बड़ी डफ़ली थी। वह बात सही है ना माँ?… नीचे घर के अंदर एक बड़ी डफ़ली है ना... हूँ...! वैसे पुलिस हत्यारे को पकड़ लेगी ना? तब सबकुछ सामने आ जाएगा, और इस बात का भी पर्दाफ़ाश हो जाएगा कि उसका मददगार कौन था।" 


          डर के साए में ऐसे ही दिन बीत रहे थे। हमारे गाँव में बिजली, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं थीं। घर के चारों तरफ बड़े-बड़े, घने पेड़ थे और पाँच एकड़ के इस सुनसान इलाके में हमारा इकलौता घर था।

       मुझ पर तो डर की छाया तक पड़ने नहीं दी थी मेरे पिताजी ने। .. लेकिन उस वक्त इस माहौल के बीच, हम बच्चों को रात के समय अकेले घर से बाहर जाने नहीं दिया उन्होंने। डर के  साए में ऐसे लगातार जीना बहुत मुश्किल हो रहा था, इसलिए दादी ने एक योजना बनाई। उन्होंने पापा से कहा,

       "छोटे बेटे, इस तरह हमेशा डर से कांपते हुए जिया नहीं जा सकता।"


      "तो हम क्या करेंगे अम्मा?" - पापा ने पूछा।


      "क्या हम शरत को यहाँ बुला लें?"


     "अरे माँ, वह अब शादीशुदा है... वह भला कैसे आ पाएगा? और वह भी यहाँ रहने के लिए?"


     "अरे कोई बात नहीं छोटे बेटे, हम उससे कहेंगे कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को भी साथ ले आए।"

       

        "हाँ, हाँ माँ... आप जो चाहें वो कीजिए। …पर शरत तो पापाजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद अभी-अभी ही वहाँ पहुँचा होगा, है ना?"


     दादी ने उसी पल विशाल फूफा को बुलाया, 

      "पियसेन, तुम अभी के अभी जाकर शरत को एक टेलीग्राम भेज दो कि 'अपने परिवार के साथ जल्दी यहाँ आ जाओ'।"


       चार दिन बाद शरत मामा—यानी मेरी माँ के छोटे भाई—अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ हमारे यहाँ आ गए।

       उनके आने के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। हमारे मामाजी, यानी शरत मामा, एक बेहद निडर और साहसी व्यक्ति थे। इस कारण के अलावा घर की खामोशी भी दूर हो गई थी, क्योंकि उनके आने से हमारे घर में सदस्यों की संख्या भी बढ़ गई थी।


      "शरत, तुमने अपनी नौकरी छोड़ दी है क्या?" 

दादी ने शरत मामा से पूछा।


     "हाँ मामीजी... वरना मैं इतनी जल्दी यहाँ कैसे आ पाता?"


      "अरे... यह तो बहुत अफ़सोस की बात है... लेकिन इस मुश्किल वक़्त में तेरा आना हमारे लिए बहुत बड़ी मदद है।"


       शरत मामा के आने से हमारे घर में कुल नौ बच्चे और नौ बड़े सदस्य हो गए थे। हम बच्चों में रमणी दीदी, मैं, चाचा के दो बच्चे, मेरी दो बहनें, मेरा भाई और शरत मामा के दो बच्चे शामिल थे। और बड़े सदस्यों में—दादी, मेरे माता-पिता, चाचा-चाची, फूफा-फूफी तथा मामा-मामी शामिल थे।

        एक तरह से देखा जाए तो वह बहुत ही खूबसूरत परिवार था, क्योंकि खाना पकाते समय दादी, चाची और मामी हमारी माँ की मदद कर रही थीं।

       ऐसे वक्त बुआ रसोईघर के आसपास भी नहीं जा रही थीं, वे कोई कपड़ा सिल रही थीं या फिर एक लेस गूँथ रही थीं।


      शरत मामा हर शाम घूमने जाते थे, और सुबह से शाम तक बार-बार एक ही काम करते थे। अगर कहूँ कि वह काम क्या था... तो वह था लड़ाई करने का अभ्यास!!


एक दिन दादी ने शरत मामा से कहा,   

      "शरत, तुम आज भी शाम को घूमने जाओगे ना... तो थोड़ा जल्दी वापस आ जाना!"


       "क्यों बड़ी मामीजी?  बात क्या है? अभी भी मेरे पास कोई काम नहीं है ना, इसलिए मैं बाहर कोई लायक काम ढूँढने जाता हूँ। मैं फालतू में समय बर्बाद करने नहीं जा रहा हूँ। बताइए मामीजी, क्या काम है?"


      "तुम्हारी गुणवती दीदी, मतलब हमारी छोटी बेटी... उसके पति पियसेन ने एक बेकरी खोली थी ना?… तुम्हारे बड़े मामाजी की हत्या के बाद से वह आज तक बंद है। पियसेन बुदबुदा रहा था, 

    'क्या करूँ, अकेले जा भी नहीं सकता, बहुत डर लगता है।' 

  …तो शरत, क्या तुम कल सुबह तक वहाँ रह सकोगे?"


    "जी हाँ मामीजी, क्यों नहीं? ज़रूर जाऊँगा," 

शरत मामा ने कहा।    


      उसके बाद विशाल फूफा ने अपनी बेकरी फिर से खोली। लेकिन वे उस बेकरी में रात नहीं गुज़ारते थे।  


      दादाजी के कत्ल के बाद लगभग दो-तीन महीने बीत गए थे, लेकिन अकेले घर से बाहर जाने वाले केवल शरत मामा थे।


     मुझे शरत मामा का एक काम बहुत अच्छा लगता था, और वह काम यह था। 

      हमारे घर के सामने मैंगोस्टीन का एक पेड़ था। उसके चारों ओर बड़ी-बड़ी शाखाएँ थीं। शरत मामा ने उन शाखाओं में से जो सबसे नीचे वाली शाखा थी, उस पर एक बड़ा बोरा लटकाया। उसके बाद उन्होंने उस बोरे को रेत से भर दिया।

     उसी बीच, मैं ध्यान से उनका यह काम देख रही थी। उन्होंने उस बोरे का ऊपरी हिस्सा  कसकर बाँध दिया। उसके बाद, वे एक शेर की तरह लपक-लपक कर उस बोरे पर वार करने लगे। 

       मुझे पता नहीं था कि शरत मामा ऐसा क्यों कर रहे थे। जब मैंने माँ से पूछा, तो उन्होंने कहा, 

       "तुम्हारे मामाजी बुरा करने वालों के लिए

 काल हैं और अच्छे इंसानों के लिए वे खुद एक बहुत अच्छे इंसान हैं।"    

[अगले भाग से संबंधित]

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