भोर से हीरक तक-[11]
शरत मामा के आगमन को लगभग पांच महीने बीत चुके थे। एक दिन हमारे चाचा जी जब दादी के पास आए, तब मैं भी वहीं उनके पास बैठी थी। चाचा जी ने दादी से कहा,
"माँ, तुम्हें पता है? मैंने सुना है कि शरत भाग गया है।"
"क्या...? वह पिछले दो दिन से गायब है। तो मैंने जो सोचा था, वह ठीक ही था।"
दादी ने चौंकते हुए कहा।
"क्या माँ? आपने क्या सोचा था?"
"जब शरत घर नहीं आया, तो मुझे लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है।"
"माँ, क्या आपको पता है?... शरत यहाँ एक नौकरी भी कर रहा था।"
"क्या...? मुझे तो कुछ भी नहीं पता था। अगर वह नौकरी कर रहा था, तो उसे घर चलाने के लिए कुछ पैसे देने चाहिए थे न!... यहाँ तुम्हारे भैया अकेले पूरा खर्च उठा रहे हैं।"
फिर दादी ने मामी को आवाज़ दी,
"वायलेट,...वायलेट...! जल्दी इधर आओ!"
और उनसे पूछा,
"शरत कहाँ है?"
"सच में मामी जी, मुझे नहीं पता कि वे कहाँ हैं। दो-तीन दिन से उनकी कोई ख़बर नहीं है।"
"क्या तुझे शरत ने पैसे दिए हैं?"
दादी ने कड़क आवाज़ में पूछा।
"जी मामी जी, दिए हैं।"
वायलेट मामी ने डरते हुए धीरे से कहा।
"तो कहाँ हैं वो पैसे?"
"मेरे पास हैं मामी जी।"
"यह छोटा लड़का कह रहा है कि शरत भाग गया है। शरत ने तुम्हारे हाथ में जो पैसे रखे हैं, कौन जाने उसने वो पैसे किस तरीके से कमाए हैं! क्या पता चोरी या लूटपाट करके उसने वो पैसे बटोरे हों?"
"नहीं, नहीं मामी जी, शरत जी एक दुकान पर काम कर रहे थे।"
वायलेट मामी ने सफ़ाई देते हुए कहा।
"वह कौन-सी दुकान है?"
दादी ने तुरंत सवाल किया।
"कितुल का शहद बेचने वाली दुकान है मामी जी।"
तभी चाचा बीच में बोल पड़े,
"माँ, मैंने सुना है कि लोग बातें कर रहे थे... कि जिस दुकान पर शरत काम कर रहा था, वहाँ किसी आदमी ने चोरी की थी। शरत ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया और उसकी खूब पिटाई कर दी।"
"अगर ऐसा है तो शरत वापस हमारे घर नहीं आएगा। तो फिर इस बेचारी वायलेट और बच्चों का क्या होगा? उनके साथ आगे क्या होगा?"
दादी ने गहरी चिंता में कहा।
"मैं वापस अपने गाँव चली जाऊँगी, मामी जी।" वायलेट मामी ने उदास स्वर में कहा।
"तुम तो कह रही हो... पर उतनी दूर तुम इन छोटे-छोटे बच्चों के साथ अकेले कैसे जाओगी?"
"मैं अपने बड़े भैया को बुला लूँगी।"
दादी ने एक ठंडी आह भरी,
"फिर से हमें डर-डर कर जीना होगा। न जाने मैं क्या करूँ...! अब तक तुम्हारे मामा जी के हत्यारों को भी पुलिस नहीं पकड़ पाई है।"
वायलेट मामी अपने दोनों बेटों को लेकर वापस चली गईं। उनके जाने के बाद मुझे बहुत दुःख हो रहा था, क्योंकि जाने से ठीक पहले तक शरत मामा के छोटे-छोटे बच्चे हमारे साथ खेल रहे थे। तभी मुझे याद आया कि एक दिन शरत मामा वायलेट मामी की पिटाई कर रहे थे। उस वक्त भी मुझे बहुत बुरा लगा था। शरत मामा मुझसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन मेरी छोटी बहन भाग्या को वे मुझसे भी ज़्यादा प्यार करते थे, शायद इसलिए क्योंकि हमारी माँ भी भाग्या से ही सबसे ज़्यादा प्यार करती थीं।
और वायलेट मामी का घर पोलोन्नरुवा के पराक्रम समुद्र के पास ही था। वहाँ के लोगों की एक आदत थी कि वे अपने बच्चों को नहलाते समय, उन्हें उस विशाल समुद्र (जलाशय) के पानी में डुबकी लगवाकर नहलाते थे।
हमारे घर रहते समय भी वायलेट मामी ने अपनी वह आदत नहीं छोड़ी। वे अपने बच्चों को नहलाते वक्त हमारे कुएं के पानी में डुबकी लगवा देती थीं। वायलेट मामी को ऐसा करते देख मेरी माँ ने मुझसे कहा,
"हे भगवान! वह देखो गीता, उतने छोटे-छोटे बच्चों को वायलेट मामी कुएं में डुबोकर बाहर निकाल रही हैं।... हे मेरे भगवान! तुम्हारी मामी तो बहुत अजीब हैं न?"
"ऐसे डुबाते समय वे मर क्यों नहीं जाते, माँ?"
मैंने माँ से पूछा।
"भले ही वे बच्चे छोटी उम्र के हैं, पर उन्हें भी इसकी आदत हो गई है, इसलिए कुछ नहीं होता।..."
माँ ने समझाया।
"माँ, मामा के बड़े बेटे की उम्र कितनी है?"
"अरे गीता, वह बड़ा बेटा यानी निलंत सिर्फ दो साल का है, और छोटा बेटा नंदन अभी नौ महीने का है।"
वायलेट मामी के वापस जाने के बाद लगभग दो-तीन हफ़्ते गुज़र चुके थे। एक सुबह करीब दस बजे, अचानक हमारी मौसी, उनके पति और उनके चारों बच्चे हमारे घर आ पहुँचे। उनके अचानक आने से दादी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि दादाजी की हत्या के बाद से दादी और घर के बाकी सभी लोग भारी डर और साए में दिन बिता रहे थे।
मौसा जी का नाम 'जयशेखर' था और उनके बच्चों के नाम 'दुष्यंत', 'निशा', 'नाथ' और 'दुमिंद' थे।
नाथ को दोनों कानों से बहुत कम सुनाई देता था, इसलिए वह हमेशा बहुत शोर मचाता रहता था। निशा भी बहुत अलग स्वभाव की थी; उसकी बोलचाल और हाव-भाव आम लड़कियों से काफी अलग थे।
"बहुत अच्छा हुआ जो तुम लोग आ गए, वो भी ठीक ऐसे समय में! वैसे जयशेखर, अचानक कैसे आना हुआ?"
पापा ने मौसा जी से पूछा।
"बड़े भैयाजी, सच तो यह है कि अचानक मेरी नौकरी चली गई। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब हम क्या करेंगे। तब हमारी छोटी मालकिन ने कहा कि हमें बड़े भैया के पास चलना चाहिए, वे हमें कभी भी मना नहीं करेंगे।.... इसीलिए मैंने सोचा कि जब तक मुझे कोई नया काम नहीं मिल जाता, तब तक छोटी मालकिन और बच्चों को बड़े भैयाजी पास छोड़ देना ही ठीक रहेगा।... मैं कल या परसों वापस चला जाऊँगा।"
"हूँ.... बहुत अच्छा तय किया तुमने।"
पापा ने कहा।
मौसी के दोनों बड़े बेटे, दुष्यंत और नाथ, जयशेखर मौसाजी से डरते थे। सबसे छोटा बेटा ऐसा नहीं था, क्योंकि वह अभी सिर्फ एक साल का था। उनकी बेटी 'निशा' अपने पापा की लाडली थी, इसलिए वह भी उनसे नहीं डरती थी।
अगली शाम हमारी दादी ने कहा,
"छोटी मालकिन, जयशेखर ने कहा है कि कल उसे वापस जाना है... इसलिए सुबह-सुबह कुछ खाना पका लेना चाहिए, ताकि वह अपने साथ ले जा सके। वरना बेचारा बाहर कैसे खाना खा पाएगा।"
दादी की वह बात सुनकर मैंने माँ से पूछा,
"...माँ, हमारी दादी छोटी माँ को 'छोटी मालकिन' कहती हैं और आपको 'बड़ी मालकिन'। ऐसा क्यों?"
"हूँ... बचपन में हमारे माँ-बाप हमें इसी तरह बुलाते थे। और चूंकि मेरी माँ,... इसका मतलब तुम्हारी नानी और तुम्हारे दादाजी भाई-बहन हैं, इसलिए तुम्हारे दादा, दादी, चाचा, बुआ और पापा भी हमें बचपन से ही यही कहते आ रहे हैं।"
मौसाजी वापस जाने की तैयारी में थे। उनकी बेटी 'निशा' रोने लगी। रोते-रोते कहने लगी,
"मुझे भी जाना है... अरे ओ भगवान!... अपने पापा के बिना मैं एक पल भी जी नहीं सकती... मैं मर जाऊंगी! खुदा की कसम मैं मर जाऊंगी... अरे ओ... मुझे भी जाना है...!!!"
उस छह साल की बच्ची के रोने-धोने का तरीका देख-सुनकर हमारी दादी ने कहा,"छोटी मालकिन, तुम इस बच्ची को बर्बाद कर रही हो। इसे अच्छे संस्कार देने की कोशिश करो, वरना बाद में पछताना पड़ेगा।"
उसी बीच मौसाजी ने कहा,
"ओ मेरी छोटी बिटिया, तुम रोना बंद करो, हम दोनों जाएंगे! छोटी मालकिन, मेरी बच्ची को फटाफट तैयार कर दो।"
मौसी ने निशा को तैयार किया। तब दादी ने खाँसते हुए कहा,
"इस बच्ची को तुम दोनों कभी भी सुधार नहीं सकते, क्योंकि यहाँ भी इस बच्ची की ही जिद चल गई।"
यह कहकर वे फिर से खाँसती हुई वहाँ से चली गईं
, क्योंकि जब भी उन्हें गुस्सा आता था, तो उन्हें खाँसी भी आ जाती थी।
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