भोर से हीरक तक-[12]
जयशेखर मौसाजी और निशा के जाते ही हमारी मौसी हाथ में कुदाल लेकर घर के पीछे वाले हिस्से में चली गईं। मैं रसोईघर की दहलीज़ पर खड़ी कौतूहल से उन्हें ही देख रही थी। मौसी कुदाल से ज़मीन की घास साफ़ करने लगीं। लगातार मेहनत करने के कारण उनका पूरा चेहरा पसीने से तर-बतर हो चुका था। मौसी लंबे कद और गठीले बदन की एक बेहद मजबूत महिला थीं, इसलिए उन्होंने अपने पसीने की ज़रा भी परवाह नहीं की। घास साफ करने के बाद, उन्होंने उसी कुदाल से ज़मीन खोदना शुरू कर दिया। काफी देर तक वह पूरी ताकत से मिट्टी खोदती रहीं। फिर वह पास ही मौजूद केले के झुरमुट के पास गईं और वहाँ से केले का एक नया पौधा उखाड़ लाईं।केले के उस नन्हे पौधे को दूसरी खोदी हुई जगह पर रोपने के बाद, मौसी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पोंछती हुई कुएं की तरफ बढ़ गईं। उन्होंने कुएं से पानी खींचकर नए पौधे की जड़ों में डाला और फिर रसोईघर की दहलीज पार करके अंदर आ गईं। इसके तुरंत बाद, मौसी सबके लिए गरमा-गरम चाय बनाकर ले आईं।
मैंने अपनी माँ को कभी इस तरह खेतों या बगीचे में कड़ा परिश्रम करते हुए नहीं देखा था, इसलिए मैं मौसी के काम करने के इस अंदाज़ को बड़े गौर से निहार रही थी।तभी मौसी ने दादी से पूछा,
"बड़ी मामी, रात का खाना बनाने जा रही हूँ… क्या मैं अरबी का कोई व्यंजन बना लूँ?"
मौसी के मुँह से 'अरबी' शब्द सुनते ही अचानक मेरी स्मृतियों में एक पुराना वाकया तैर गया। मुझे याद आया कि एक दिन हमारी माँ भी रसोई में अरबी का व्यंजन बनाने जा रही थीं। माँ को अरबी काटते देखकर पापा ने तुरंत उन्हें टोकते हुए कहा था,
"अरे भाई! अरबी बहुत उष्ण होती है। खाने के लिए यह कहीं से भी लायक नहीं है। मत बनाओ।"
पापा की बात सुनकर माँ ने चुपचाप अरबी एक तरफ रख दी थी। लेकिन आज यहाँ का माहौल अलग था। जहाँ एक तरफ पापा के कहने पर माँ ने तुरंत अपने कदम पीछे खींच लिए थे, वहीं दूसरी तरफ मौसी थीं—कड़े परिश्रम से न डरने वाली और अपनी शर्तों पर जीने वाली। मैं उत्सुकता से देखने लगी कि मौसी के इस सवाल पर दादी क्या जवाब देती हैं, और क्या यहाँ भी अरबी बनाने से मना कर दिया जाएगा।
दादी ने मौसी की बात सुनकर कहा,
"अरे भाई, हम तो यहाँ कभी भी अरबी नहीं खाते हैं, क्योंकि हमारे छोटे बेटे को यह बिल्कुल पसंद नहीं है।… तुम कुछ और ही पका लो।"
भले ही मौसी हमारी माँ की सगी बहन थीं, पर स्वभाव में वे माँ जैसी बिल्कुल नहीं थीं। दादी की बात सुनकर वे बिना कुछ कहे सीधे रसोईघर में चली गईं। दादी, जो कुछ देर पहले घर के सामने पत्थरों की एक मेड़ बना रही थीं, वापस उसी काम को पूरा करने चली गईं। उस समय माँ कुएं के पास कपड़े धो रही थीं, चाची बीमार होने के कारण बिस्तर पर लेटी थीं, और बुआ अभी तक बेकरी से वापस नहीं लौटी थीं। इसी बीच मौसी का दूसरा बेटा, नाथ, रेत से भरे एक तसले (रॉंगे) को रस्सी से खींचता हुआ पूरे घर में यहाँ-वहाँ दौड़ रहा था। उससे होने वाली घिसटने की तेज़ आवाज़ से परेशान होकर, मैंने काफी देर तक अपने कानों में उँगलियाँ दबा रखी थीं और सब्र कर रही थी।
तभी मौसी का सबसे छोटा बेटा, दुमिंद—जिसकी उम्र महज़ दो साल थी—दौड़ता हुआ मौसी के पास आया। उस वक्त दुमिंद का मुँह चल रहा था, वह कुछ चबा रहा था। मौसी उसे चुटकी भर चीनी खिलाने के लिए तैयार हुईं और दुलार से बोलीं,
"मेरा भाई, ज़रा अपना मुँह तो खोलो!"
मौसी ने अपने बेटे को 'मेरा भाई' कहकर इसलिए पुकारा क्योंकि घर के सभी सदस्य उसे प्यार से इसी नाम से बुलाते थे। जैसे ही दुमिंद ने अपना मुँह खोला, मौसी अचानक डर कर चिल्ला उठीं,
"छी! यह क्या कर रहा है तू? …अरे भाई, इतनी देर से तू इस जोंक को चबा रहा था?… देखो, भगवान की कृपा रही कि यह जोंक कहीं तेरे पेट के अंदर नहीं गई!"
यह कहते हुए मौसी ने घबराकर तुरंत उसके मुँह से जोंक को हटा दिया।
धीरे-धीरे शाम ढल चुकी थी और रात का अंधकार घिर आया था। तभी बुआ, विशाल फूफा, रमणी दीदी और बाकी सभी लोग घर लौट आए। दीवार पर लटकी बड़ी घड़ी ने
'ढांग, ढांग, ढांग, ढांग,
ढांग, ढांग, ढांग!'
की सात गूँजती आवाज़ों के साथ ऐलान किया कि रात के भोजन का समय हो चुका है।
तभी रसोई के अंदर से एक ऊँची और आत्मीय आवाज़ सुनाई दी,
"बड़ी मामी जी, खाना तैयार है! बच्चों, आओ, तुम सभी की थालियों में खाना परोस दिया है!"
मौसी ने सबको आवाज़ लगाते हुए कहा।घर के सभी सदस्य भोजन कक्ष में इकट्ठा हो चुके थे। जैसे ही खाने का दौर शुरू हुआ, मौसी आदरपूर्वक पापा की तरफ बढ़ीं और बोलीं,
"बड़े भैया जी, यह अरबी का व्यंजन लीजिए। यह शरीर के लिए बहुत ही पौष्टिक और खाने में बेहद स्वादिष्ट है।"
मौसी की बात सुनते ही पापा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने भड़कते हुए कहा,
"मेरे इतना मना करने के बाद भी उस औरत ने इस कूड़े को पका ही दिया ना! न जाने इस औरत का दिमाग खराब हो गया है क्या!... बस, बहुत हुआ! यह बच्चों को खिलाना तो दूर, उनकी नज़रों के सामने दिखाना भी मत!"
पापा ने तीखे और ऊंचे स्वर में माँ पर अपना सारा गुस्सा निकाल दिया।पापा को इस तरह गरजते देख मौसी बिल्कुल नहीं डरीं। उन्होंने तुरंत शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,
"अरे नहीं, नहीं बड़े भैया जी! दीदी ने इसे नहीं पकाया है। आप अकारण ही उन पर मत डांटिए। इसे मैंने अपनी मर्ज़ी से पकाया है।"
मौसी की बात सुनकर पापा के पास कहने को कुछ नहीं बचा। वे पूरी तरह निरुत्तर हो गए और उन्होंने अपनी थाली में अरबी का व्यंजन बिल्कुल नहीं लिया। हालाँकि, उनके इस मौन विरोध का बाकी सब पर कोई असर नहीं हुआ। दादी, माँ, बुआ, चाचा और ख़ास तौर पर विशाल फूफा ने तो बड़े ही चाव और मज़े से अरबी का लुत्फ़ उठाया। भोजन कक्ष का तनाव धीरे-धीरे अपनों की हँसी-मज़ाक और तृप्ति के माहौ
ल में बदल गया।
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