भोर से हीरक तक-[13]


             मौसी के बड़े बेटे दुष्यंत भैया बहुत अजीब थे। हमारे पापाजी ने दुष्यंत भैया का दाखिला भी उसी स्कूल में कराया था, जिसमें हम पढ़ते थे। 

इसी बीच हमारे मौसाजी, दुष्यंत भैया के पिताजी हर हफ्ते हमारे यहां आते थे।

       दुष्यंत भैया बहुत नटखट थे, वह एक पल भी एक जगह चैन से नहीं बैठते थे। वे उसी कक्षा में थे जिसमें मैं पढ़ती थी। हमारी शिक्षिका हमेशा दुष्यंत भैया पर चिल्लाती रहती थीं। एक दिन दुष्यंत भैया की डेस्क पर कौवे का मल (बीट) गिरा हुआ था। दुष्यंत भैया उसे अपनी जीभ पर लगाकर लड़कियों के पीछे दौड़ रहे थे। लड़कियां भी चिल्लाती हुई भाग रही थीं। हमारी शिक्षिका ने मुझसे कहा,


     "बेटी गीता, देखो तुम्हारे बड़े भैया अपना काम पूरा करने के बाद दूसरों को उनका काम नहीं करने देते। तुम्हारे भैया कितना गलत कर रहे हैं? ...तुम आज घर जाओ और दुष्यंत के माता-पिता को यह बता दो कि वह अपनी शिक्षिका को पढ़ाने में बाधा डालता है।"


       वह शुक्रवार का दिन था। स्वभाव से मैं बहुत कोमल थी, क्योंकि पापा ने मुझे अपनी पलकों पर बिठाकर पाल-पोसकर बड़ा किया था। इसलिए मैंने नहीं सोचा था कि आगे क्या-क्या होगा। जब हम स्कूल से वापस लौटे, तब मैं जयशेखर मौसाजी के सामने से होकर घर के अंदर जा रही थी। उन्होंने मुझसे पूछा,

      "कैसी हो बिटिया? आज स्कूल में खूब पढ़ाई हुई क्या?…और टीचर ने क्या कहा?''


      "मौसाजी, टीचर ने मुझसे कहा कि आपको बता दूँ कि दुष्यंत भैया अपना काम पूरा करने के बाद दूसरों को परेशान करते हैं, और वे बहुत शरारत करते हैं।"

     तभी मौसाजी ने दुष्यंत भैया को आवाज़ दी। वे जैसे ही अपने पापा के सामने आए, मौसाजी ने उन्हें पकड़ लिया और खूब मारा। उन्होंने दुष्यंत भैया के बाल पकड़े और उनका सिर दीवार पर दे-मारते चले गए। इसके बाद उन्होंने भैया को उनकी बांहों से पकड़कर ऊपर हवा में उठाया और आंगन में फेंक दिया। उनका ऐसा रौद्र बर्ताव देखकर मुझे बहुत बुरा लगा, और मैंने सोचा

       'हे भगवान, यह मैंने क्या कर दिया!... काश! मैंने वे बातें क्यों ही कहीं!... अब मैं क्या करूँ...'

     इसी बीच माँ ने मुझे अंदर बुलाया और अप्रसन्न स्वर में कहा,

      "गीता, तूने मौसाजी से झूठी चुगली करके उस बेचारे को जानवरों की तरह पिटवाया। नालायक कहीं की, तूने क्यों ऐसा किया?''


     "...मैंने नहीं सोचा था माँ... कि मौसाजी दुष्यंत भैया की इस तरह पिटाई करेंगे..."

     मुझे रोना आ रहा था। मैंने फटाफट अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाए। 

       बिस्तर पर बैठकर मैंने सोचा,

       "आज के बाद मैं कभी किसी को कुछ नहीं बताऊँगी।"


     उसके बाद मानो मेरी ज़ुबान पर ताला लग गया था। जब मैं स्कूल गई, और शिक्षिका जी ने मुझसे कुछ पूछा, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया। यहाँ तक कि अगर पापाजी ने भी कुछ पूछा, तब भी मैंने उत्तर नहीं दिया; क्योंकि मुझे हमेशा यही डर लगा रहता था कि मेरे मुँह से कुछ गलत निकल जाएगा और मुझे फिर से डाँट खानी पड़ेगी, इसलिए मैं घर में एक चूहे की तरह दुबककर जी रही थी। स्कूल में बच्चे मुझसे बहुत प्यार करते थे; भले ही मैं सांवली थी, फिर भी वे मुझे 'गोरी', 'छोटी गुड़िया' जैसे नामों से पुकारते थे, क्योंकि मेरे पिताजी हमारे स्कूल में उप-प्रधानाचार्य थे। उस समय बच्चे ही नहीं, बल्कि गाँव वाले भी गुरुओं का बहुत सम्मान करते थे। उस घटना के बाद, हर दिन की तरह एक दिन हमारी कक्षा के पास आकर पापा ने कहा,

       "बेटी आओ, चाय ठंडी हो रही है।"

     जब मैं दफ्तर के अंदर गई, तो पापा ने मुझे चाय के साथ दूध-चावल की एक थाली दी और वे वापस चले गए। मेरी एक आदत थी कि पापा, माँ या किसी भी बड़े व्यक्ति ने मुझसे जो कुछ भी कहा, मैं उस काम को ठीक वैसे ही करती थी। हर दिन पापा मुझे दफ्तर में बुलाकर चाय देते थे और कुछ देर बाद किसी छात्र को मुझे वापस क्लास में भेजने के लिए कहते थे। लेकिन उस दिन पापा वह बात भूल गए थे।  मैंने दूध-चावल खा लिया और धीरे-धीरे चाय भी पी ली। लेकिन पापा वापस नहीं आए। मुझे रोना आ रहा था, पर मैंने उसे रोक लिया। गला अटक रहा था, इसलिए मैंने अपनी गर्दन पर ज़ोर से हाथ फेरा। लेकिन आँसू काबू में रखना मुश्किल हो रहा था। तभी किसी छात्र के बजाय खुद पापा ही अंदर आए।

       "अरे बेटी, मैं भूल गया था ना!… अब तुम अपनी क्लास में जाओ।"        पापा ने कहा। उसके बाद मैं कक्षा में पढ़ रही थी, तभी प्रधानाचार्य जी मेरी कक्षा के पास आए। उन्होंने मुझसे धीरे से कहा,

        "बिटिया, तुम एक लड़की हो।… जिस थाली में खाना खाया है, उसे खुद धोने की आदत डाल लेनी चाहिए।"


       उस वक्त मुझे मालूम नहीं था कि उन्होंने क्यों ऐसा कहा। मैं चुप रही। उन्होंने फिर से कहा,

        "तुमने खाना खाया और थाली नहीं धोई। अब जाकर थाली धोओ।"

       तभी मैंने दफ्तर में जाकर थाली धोई। उसके बाद से आज तक मैंने जिस भी थाली में खाना खाया, उसे खुद धोने की आदत डाल ली।


       मेरी छोटी बहन भाग्या के पैदा होने के बाद माँ ने मेरी परवाह करना छोड़ दिया था, इसलिए मैं अकेली रहते हुए अपने कामों में व्यस्त रहने लगी थी। 

       एक दिन मैं चित्र बना रही थी, तभी भाग्या मेरे पास आई और मेरे चित्र पर रंग लगाने लगी। मैंने उसका हाथ चित्र पर से हटा दिया। यह देखकर माँ ने चिल्लाकर पापा से कहा,

       "सुनिए जी, इस गीता ने हमारी बेचारी भाग्या की पिटाई कर दी।"

      भले ही मेरा पूरा ध्यान अपने काम पर था, लेकिन माँ की आवाज़ सुनते ही मेरा ध्यान वहाँ से हटकर उनकी बात पर टिक गया। पापा बिल्कुल शांत थे, इसलिए माँ उनके और करीब जाकर कहने लगीं,

      "यह गीता हमारी बेचारी भाग्या से हमेशा नफ़रत करती है।… मुझसे तो यह सब देखा नहीं जाता..."

       पापा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उस वक्त दादी पापा के पास ही बैठी थीं। वह बोल पड़ीं— 

       "अरी बड़ी मालकिन!… तुम क्यों छोटी-छोटी बच्चियों की बातों को लेकर बैठ गई हो?… तुम अपने काम पर ध्यान दो ना!" 

      उस वक्त तो माँ ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके बाद से उन्होंने हमेशा मेरे बारे में पापा से शिकायत करना शुरू कर दिया। हर बार पापा उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते थे। कभी-कभी वे माँ को डांट भी देते थे, लेकिन माँ भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आती थीं। भाग्या हमेशा माँ के साथ ही रहा करती थी। हमारी गोरी बहन निरूपा को माँ के पास रहना पसंद नहीं था, इसलिए वह दादी के साथ ही रहा करती थी।


      हमारे चाचा मिल्टन, पापा की तरह शांत स्वभाव के नहीं थे। इसलिए वे माँ की इन हरकतों को देखकर उनका मज़ाक उड़ाते थे, और ख़ास तौर पर भाग्या को चिढ़ाते थे। एक शाम जब मैं एक कहानी पढ़ रही थी, तब चाचाजी भी वहीं पास में बैठे थे। तभी अचानक भाग्या ने आकर मेरी किताब पर पानी डाल दिया। तब मैंने माँ से कहा,

      "देखिए माँ, भाग्या ने मेरी नई किताब पर पानी डाल दिया, जो कल ही पापा ने मुझे लाकर दी थी।''

      "हूं! भाग्या तो अभी छोटी है ना, तुम्हें खुद अपनी किताब को संभालकर रखना चाहिए था ना!"

     माँ ने लापरवाही से जवाब दिया और वे सीधे पापा के पास चली गईं।

      "सुनिए जी, वह गीता फिर से हमारी बेचारी भाग्या को परेशान कर रही है..."

       माँ की यह बात सुनकर पहले तो पापा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन माँ बार-बार वही बात दोहराती रहीं। आखिरकार पापा को गुस्सा आ गया और उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा,

      "अरी भाग्यवान! तुम कभी नहीं सुधरने वाली! छोटी बच्चियों को अपने मामले खुद सुलझाने दो।… तुम जाओ और अपना काम पूरा करो!"

        वह बात सुनकर चाचाजी को बड़ा मज़ा आया। वे हूटिंग करते हुए चिल्लाने लगे,

       "हूँ, हूँ...! भाग्यो... क्या हुआ तुझे?… गीता बेटी के ख़िलाफ़ पापा से झूठ बोला था ना…? जीत मिली क्या…? हूँ, हूँ.…..! तू हमारे भैया की सगी बेटी नहीं है, भाग्यो…! तुझे पता नहीं है, तुझे हमारे भैया ने गोद लिया था। …हाहाहाहा..."

     उस घटना के बाद माँ मिल्टन चाचा से बुरी तरह नाराज़ हो गईं। एक दिन माँ ने मुझसे अकेले में कहा,

     "गीता, तुझे एक राज़ की बात बताऊँ?… किसी से मत कहना।''

      "राज़?... कैसा राज़ माँ?''

      "…दादाजी के ज़िंदा रहते समय, दादी हमेशा उनसे झगड़ा किया करती थीं... तुझे याद है क्या?''

       "हाँ माँ,… मुझे याद है। तब दादाजी तंग आकर अपने छोटे भाई गोमस दादाजी के पास चले जाते थे ना?''

    "हाँ, तो तुझे याद है! ... पर क्या तुझे पता है कि दादी आख़िरकार ऐसा झगड़ा क्यों करती थीं?''

      "नहीं माँ, मुझे नहीं पता।''

      "क्योंकि तुम्हारे मिल्टन चाचा, दादी के सगे बेटे नहीं हैं!''

      "तो?... फिर वे किसके बेटे हैं?''

       "उन्हें तुम्हारी दादी ने गोद लिया था... वो भी दादाजी से बिना पूछे! चाचा का तो अब तक कोई जन्म प्रमाण पत्र भी नहीं है।… दादी हमेशा दादाजी पर दबाव डालती थीं कि वे चाचाजी को अपना नाम यानी अपना सरनेम दे दें, पर दादाजी हमेशा साफ़ मना कर देते थे। …उन दोनों के बीच होने वाले झगड़े की असली वजह यही थी।"


    "…हाँ…!"


        हमारी दादी हर महीने की पूर्णिमा पर अष्टशील ग्रहण करने जाती थीं। कभी-कभी हम भी उनके साथ मंदिर जाते थे। इस बार मैं, स्वर्णा और दुष्यंत भैया दादी के साथ अष्टशील ग्रहण करने के लिए मंदिर गए थे। वहां धर्म शाला में बैठने के लिए ज़मीन पर चटाइयां बिछाई गई थीं। दुष्यंत भैया बहुत मुश्किल से बैठ पाए थे, क्योंकि वे एक जगह ज़्यादा देर तक बैठ नहीं सकते।

      लगभग दस बजे प्रधान भिक्षु धर्म देसना करने आ गए। दादी ने दुष्यंत भैया को फुसलाकर कहा,

       "दुष्यंत, नखरे तो नहीं करना। इस वक्त शांत रहना।"

     दादी से डर था, इसलिए उन्होंने उस वक्त कोई गड़बड़ नहीं की। लेकिन जब उपासक-उपासिकाओं के लिए भोजन दान का समय आया, तो उन्होंने सबसे पहले खाकर दादी की तरफ देखा और चुपचाप धर्मशाला से बाहर निकल गए। खाना ख़त्म करने के बाद दादी ने पूछा,

     "दुष्यंत कहां है? दिखाई नहीं दे रहा है।''

      "वे बाहर निकल गए दादी माँ,"

      स्वर्णा ने कहा। तभी नायक भिक्षु के किसी को डांटने की आवाज़ सुनाई देने लगी— 

      "इतना छोटा होकर भी ऐसा नीचा काम कर रहा है!… ऊपर से मंदिर आकर!… शर्म नहीं आती क्या?"

      वह आवाज़ सुनकर सभी लोग उस तरफ बढ़ गए, और दादी ने कहा,

       "बड़े भिक्षु किसी को डांट रहे हैं।… पता नहीं यह दुष्यंत कहां है।... मुझे शक है कि उसने ही कोई घिनौना काम किया है… मैं देख कर आती हूँ।"

      दादी के ऐसा कहते ही बड़े भिक्षु दुष्यंत भैया को हाथ से खींचकर धर्मशाला के अंदर ले आए।

       "ओह…! इसने क्या किया है भंतेजी?"

     दादी ने पूछा।

    "देखो माँ, आज पूर्णिमा का दिन है। यह लड़का चिड़िया के अंडे तोड़ रहा था, पाप है पाप! …हूँ! अब तुम शील को छोड़ दो

। आओ, पंचशील ग्रहण करो!!"

बड़े भिक्षु ने कहा।

      [अगले भाग से संबंधित]

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