भोर से हीरक तक-[14]


             घर का माहौल साधारण था।  कुछ समय बीत गया था।  तब हमारे घर के चारों ओर नए-नए पौधे दिखाई दे रहे थे, जो मौसी ने लगाए थे। बड़े पेड़ फूलों और फलों से भरे हुए थे। जो पगडंडियां घर से कुएं तक, रास्ते तक और बगीचे तक बनी हुई थीं, वे बहुत साफ़ थीं; क्योंकि हमारी मौसी रोज़ उन्हें साफ़ करती थीं। लेकिन मौसी का सबसे छोटा बेटा 'दुमिंद' बहुत गंदा रहता था। उसकी नाक हमेशा बहती रहती थी। दूसरे बेटे 'नाथ' को कान से सुनाई नहीं देता था और वह हमेशा शोर मचाता था, लेकिन वह हमेशा बहुत साफ़ कपड़े पहनकर, सुंदर तरीके से रहता था। नाथ की एक आदत थी, वह केवल अपनी मां के हाथों का बना हुआ खाना ही खाता था, वरना वह भूखा रहता था। 


      इस तरह समय बीतता गया। एक दिन हमारे पापा हमारा रेडियो बना रहे थे। अपने दोनों हाथों की अंगुलियां जोड़कर और उन्हें शरीर के आगे नीचे की ओर रखकर, पापा के सामने खड़े होकर विशाल फूफा ने कहा,

      "बड़े भैया जी,… क्षमा कीजिए, मैं आपके काम में बाधा डाल रहा हूँ... मुझे आपसे कुछ कहना है।''

     "हूँ... ओ पियसेन, बताओ क्या कहना है?"

        पापा ने अपना काम करते हुए उनसे पूछा।


     "मुझे मेरी बेकरी तक रोज़ आना-जाना बहुत मुश्किल लग रहा है। …तो मैंने सोचा कि हम तीनों का वहीं रहना अच्छा रहेगा, क्योंकि अब खन्ना भी हमारे साथ है, इसलिए डरने की भी कोई ज़रूरत नहीं है।"

      "…तुम जो चाहो वो करो... माँ से भी कह दो।"        पापा ने कहा। उसके बाद विशाल फूफा यानी पियसेन फूफा, हमारी बुआ और रमणी दीदी अपनी बेकरी में रहने लगे। कुछ दिन बाद दादी ने हमारे पापा से कहा,

       "छोटे बेटे, वह हमारा छोटा लड़का... वह कह रहा है कि... अगर वह खुद अपने लिए एक घर बना ले तो अच्छा है।"

        "अरे भाई!… वह कैसे घर बना लेगा?.. पहले उसे कोई नौकरी करनी चाहिए ना, माँ!"

       "छोटे बेटे... तुम हमारे छोटे लड़के की मदद कर दो ना!"

       "माँ... पागल हो क्या? उसके बीवी-बच्चों को और उसे भी मैं ही पाल-पोस रहा हूँ।… तो मैं उसके लिए घर कैसे बनाऊँ?"

      "अरे नहीं, नहीं छोटे बेटे... बड़ा घर नहीं, उसका मतलब एक छोटा-सा मिट्टी का घर है। …छत पर नारियल के पत्ते डालने हैं और फर्श को मिट्टी और गोबर से लीपना है।"


      कुछ समय बाद चाचा जी ने हमारे घर से सटाकर एक छोटा-सा घर बना लिया था। उसके बाद वे लोग उस घर में रहने लगे। इसी बीच हमारी दादी की भाभी अपने दो बेटों के साथ हमारे घर आईं। उन्होंने दादी से कहा,   

      "इन बच्चों के पापा की मृत्यु के बाद मैं अकेली पड़ गई हूँ। …मेरे पास कोई नौकरी भी नहीं है। …पांच लड़कियां तो बड़ी हैं, लेकिन इन दोनों को पढ़ाने-लिखाने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। …तो मैंने सोचा कि अगर इन्हें कुछ समय के लिए छोटे बेटे के पास रख दूँ, तो अच्छा होगा।…"

       "बहुत अच्छा तय किया तुमने। …यहाँ भी लड़कों की थोड़ी कमी ही है ना," 

       दादी ने कहा। हमारी दादी के भाई एक पायलट थे और उनका नाम जॉर्ज था। उनकी बीवी का नाम तो मुझे आज तक पता नहीं है। हम बच्चे और हमारी माँ भी उन्हें 'आंटी' कहकर ही पुकारते थे, क्योंकि हमारे पिताजी और बुआ भी उन्हें ऐसा ही कहते थे। आंटी के बड़े बेटे का नाम 'रॉयिस' और छोटे बेटे का नाम 'क्रिस्मल' था। रॉयिस चाचा मुझसे दो साल बड़े थे और क्रिस्मल चाचा मुझसे सात महीने छोटे थे। क्रिस्मल का एक पैर थोड़ा-सा छोटा था, क्योंकि उसे पोलियो हो गया था।

     

      "क्रिस्मल, तुम मिल्टन भैया के घर जाओ... और रॉयिस! तुम अपने बड़े भैया के पास रहो। स्वर्णा, तुम इस क्रिस्मल चाचा को अपने घर ले जाओ।" 

      दादी ने कहा। तभी क्रिस्मल अपने कपड़े लेकर स्वर्णा के साथ हमारे चाचा के घर चला गया।

      "रॉयिस, आओ, इस सामने वाले कमरे में अपने कपड़े वगैरह रख दो," 

      हमारी माँ ने कहा। तभी आंटी भी रॉयिस चाचा के साथ अंदर जाने लगीं।

      "भाभी, तुम यहाँ नहीं, मेरे साथ आओ। हम अपने छोटे लड़के के घर चलेंगे," 

       जब दादी ने ऐसा कहा, तो आंटी वापस लौटीं और दादी के साथ चलने लगीं। 

      आंटी कुछ दिनों तक हमारे यहाँ ठहरीं। इसी बीच एक दिन एक अनजान आदमी हमारे घर के सामने आकर खड़ा हो गया। माँ ने पूछा,

      "जी कहिए, आप किसे ढूंढ रहे हैं?"

     "क्या सिसिलिन यहाँ आई हैं?"

      "सिसिलिन...? नहीं, यहाँ तो कोई नहीं है। लगता है आपको कोई ग़लतफ़हमी हो गई है।"

      "अरे नहीं, नहीं। यह समरसिंह बड़े गुरु जी का घर ही है ना?"

      "जी हाँ। पर... यह सिसिलिन कौन हैं?"

      "वे कुछ दिनों पहले अपने दोनों बेटों के साथ यहाँ आई थीं।"

      "ओह! हमारी आंटी... क्रिस्मल की माँ का नाम सिसिलिन है क्या?..."

      "हाँ, हाँ।"

      "आइए, आइए जी। इधर बैठिए। मैं उन्हें बुला देती हूँ।"

      माँ ने आंटी को आवाज़ दी। कुछ देर बाद आंटी रसोईघर के अंदर आईं और उन्होंने माँ से कहा,

      "बड़ी मालकिन... वे मेरे मंगेतर हैं। क्रिस्मल के पापा जॉर्ज की मृत्यु के बाद मैं बेसहारा हो गई थी। इसी बीच वे अंकल, जो बाहर आए हैं, उन्होंने मुझे प्रपोज किया था और मैंने भी हाँ कर दी। पर पता नहीं हमारी भाभी यानी तुम्हारी सासू माँ क्या कहेंगी... हम कल सुबह यहाँ से जाने वाले हैं, इसीलिए अंकल आज आए हैं।"

      ऐसा कहकर आंटी बाहर निकल गईं। उसके बाद वे उन अंकल से बात कर रही थीं। इसी बीच हमारी दादी रसोईघर में आईं।

     "मुझे तो लगता है कि ज़रूर दाल में कुछ काला है," 

दादी ने माँ से कहा।

      "क्यों मामी जी?"

      "कौन है वह आदमी?"

      "आंटी ने कहा कि वे उनके मंगेतर हैं।"

      "छी! निर्लज्ज औरत! वह कोई मंगेतर-वंगेतर नहीं, बल्कि उस औरत का गुप्त प्रेमी है, गुप्त प्रेमी!… मेरे भाई की साँसें रुकने से पहले ही उस औरत ने यह सब करना शुरू कर दिया था, कुलक्षणी कहीं की!" 

      दादी ने घृणा से भरी आवाज़ में कहा। लेकिन जब वे उन अंकल के सामने गईं, तो उनका बर्ताव बहुत अच्छा था। और जब अंकल और आंटी दोनों वापस जाने की तैयारी में थे, तब मैंने सुना कि दादी ने उनसे कहा,

      "छोटे भाई जी, फिर कभी यहाँ ज़रूर आना... और हमें भूल मत जाना।"


     उसी समय कुसुमा चाची ने एक और बेटे को जन्म दिया था। स्वर्णा का भी हमारे स्कूल में दाखिला करा दिया गया था। क्रिस्मल चाचा, रॉयिस चाचा, स्वर्णा और मैं एक साथ स्कूल जाते थे। रॉयिस चाचा हमारे घर पर खाना खाते थे और क्रिस्मल चाचा मिल्टन चाचा के घर पर। रॉयिस चाचा से हमारी माँ कोई भी काम नहीं करवाती थीं, इसीलिए वे खाना खाकर सीधे मिल्टन चाचा के घर चले जाते थे। उन्हें अपने कपड़े धोने और खाना खाने के बाद अपनी थाली धोने के अलावा और कोई काम नहीं था। क्रिस्मल चाचा ऐसे नहीं थे, वे रोज़ बहुत काम करते थे। एक दिन दादी ने कहा,

     "रॉयिस, तुम यहाँ-वहाँ घूमते रहते हो। इससे कहीं अच्छा यह होगा कि तुम उस दीदी की बेकरी में कुछ काम करना सीख लो। तुम अब वहीं जाओ।"

      उसके बाद रॉयिस चाचा हमारी बुआ के साथ रहने लगे। 

     इसी बीच हमारी मौसी बहुत काम करती थीं। एक दिन मौसा जी ने एक टेलीग्राम भेजा।

      -"छोटी मालकिन, जल्दी आना। - जयशेखर।"

         टेलीग्राम पढ़कर मौसी ने कहा,

      "मैं कैसे जाऊँ? उन्हें खुद आना चाहिए था ना! अगर वे लेने आएँगे, तभी मैं जाऊँगी।"

      कुछ दिन बीत गए। मौसा जी ने गुस्से में एक चिट्ठी भेजी।

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...अगर तुम न आईं, तो मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगा कि बड़े भैया तुम्हें ज़बरदस्ती अपने पास रख रहे हैं।

      तुम्हारा पति, 

           -जयशेखर।

      यह चिट्ठी सुनकर दादी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा,

     "जब मुश्किल समय आता है, तब तो बड़े भैया सोने के लगते हैं!... लेकिन जैसे ही थोड़ा-सा कुछ यहाँ-वहाँ हुआ, तो बड़े भैया पत्थर के हो गए!.. हे भगवान! इंसानियत कहाँ गायब हो गई है?... छोटी मालकिन, मेरा मन तो नहीं करता, लेकिन कहना ही पड़ेगा... तुम वापस चली जाओ। वरना हमारे छोटे बेटे को दिक्कत होगी, क्योंकि वह गधा 

सचमुच पुलिस में शिकायत कर सकता है।"

     [अगले भाग से संबंधित]

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