भोर से हीरक तक-[15]
हमारी मौसी की रवानगी के साथ पूरे घर में खामोशी फ़ैल गई थी। इसी बीच एक दिन हमारी माँ तकिये की खोल सिल रही थीं। अचानक माँ ने मुझे पुकारा।
"गीता, गीता, चुपके से खिड़की से देखो।…
वहां, वहां। वह हाथ, कौन है वह?"
"माँ, वह तो किसी छोटे लड़के का हाथ है ना?"
"हाँ, यह तो सच है, पर चोरी करने वाला लड़का कौन है? अगर मैं देखने गई तो वह भाग जाएगा, इसलिए तुम ही देखो।"
जब माँ ने ऐसा कहा तो मैंने धीरे-धीरे खिड़की का परदा हटा दिया और देखा।
"अरे माँ, समिंद, समिंद! … पापा ने कुछ देर पहले जो केले का गुच्छा काटा था – वह उसमें से केले ले जा रहा है। चोरी कर रहा है वह।"
"तुम उस केले के गुच्छे को घर के अंदर लाओ।"
"जी माँ, मैं अभी लाती हूँ।"
मैंने कहा।
उस समय समिंद तीन साल का छोटा लड़का था, लेकिन मानो तब भी उसके मुंह में एक भी दांत नहीं था, इसलिए उसे हम 'पोपला भाई' कहते थे। इतना ही नहीं, समिंद की आवाज़ हमने कभी नहीं सुनी थी। वह एक शब्द भी नहीं बोलता था, और कभी नहीं हँसता था। उसके हमउम्र बच्चे एक साथ खेलते थे, लेकिन समिंद नहीं खेलता था।
एक दिन चाची के पापा आए थे। वो दादा भी ठीक समिंद जैसे ही थे, क्योंकि वे भी हँसते-बोलते नहीं थे, इसलिए हम बच्चे उन्हें 'उल्लू दादा' कहते थे। वे हमेशा हमारे बगीचे में दादी के लगाए हुए पेड़ों के फलों की ओर देखते रहते थे और बार-बार फल तोड़ने वाला डंडा लेकर फल तोड़ते थे।हमारे घर के सामने पापा ने एक मौसंबी का पेड़ लगाया था। एक दिन उल्लू दादा अपना डंडा लेकर आए और मौसंबी तोड़ना शुरू कर दिया। यह देखकर माँ ने मुझसे कहा,
"देखो गीता, उल्लू दादा पेड़ों पर एक भी फल नहीं छोड़ते। अब वे हमारे घर के सामने, तुम्हारे पापा के लगाए हुए पेड़ के फल भी तोड़ रहे हैं।"
माँ ने मुझसे ऐसा कहा और वे उल्लू दादा की ओर चली गईं।
"बड़े बाबू,… बड़े बाबू!"
माँ ने उन्हें पुकारा, लेकिन उन्होंने माँ की आवाज़ की परवाह नहीं की।
"अरे ओ बड़े बुजुर्ग!! यह पेड़ हमारे बड़े गुरु जी का है। मौसंबी तोड़ना बंद कीजिए।"
भले ही माँ ने ऐसा कहा, लेकिन उल्लू दादा ने अपना काम नहीं रोका। वे पेड़ पर लगे सारे फल तोड़कर मिल्टन चाचा के घर ले गए।
***
बेकरी में ठहरने के बाद बुआ और रमणी दीदी कभी-कभी हमारे यहाँ आती थीं। लेकिन वे दोनों सीधे हमारे घर नहीं, बल्कि मिल्टन चाचा के घर जाती थीं। वहाँ से खा-पीकर हमारे घर आती थीं और लगभग दस मिनट बातचीत करके वापस मिल्टन चाचा के घर चली जाती थीं। उस समय बुआ काफी अमीर थीं और उन्हें घमंड भी बहुत था। इतना ही नहीं, उन्होंने हमारी माँ को 'बड़ी मालकिन' के बजाय केवल 'बड़ी' कहना शुरू कर दिया था।
एक दिन जब वे हमारे घर आईं, तब बुआ ने माँ से कहा,
"बड़ी, यह देख! मैंने अपनी रमणिया को सोने का हार खरीद कर दिया है।… गीता के गले में तो कुछ नहीं है ना?… वह तो जन्म से ही काली-कलूटी है! हाहाहाहाहा। अगर उसे सोने का हार पहना भी दिया, तो ऐसा लगेगा मानो किसी कौवे के गले में पहना दिया हो।"
उनकी बात सुनकर माँ को गुस्सा आया था, लेकिन मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तभी माँ ने कहा,
"गीता के पापा ने उसके लिए सबसे पहले सोने का एक हार खरीदा था। अगर वह हार गीता के गले में पहना दिया, तो अनजाने में उससे खो सकता है, इसलिए मैंने उसे अपने गहनों के डिब्बे में रख दिया है।"
"क्या…? मुझे तो अब तक यह पता ही नहीं था,"
"ऐसी बातें सभी को बताने से क्या फायदा?…"
माँ ने कहा।
पिताजी हर महीने जब उन्हें वेतन मिलता था, तो मेरे लिए कुछ न कुछ खरीद कर लाते थे। कभी-कभी वे भाग्या के लिए भी कहानियों की किताब जैसी चीजें लाते थे।
एक दिन सुबह के समय लगभग साढ़े दस बजे बुआ और रमणी दीदी हमारे यहाँ आ रही थीं। हमारे घर के सामने खड़े होकर जब मैंने दाएं हाथ की दिशा में देखा, तो करीब सौ मीटर तक रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। इसलिए हमने उन्हें दूर से ही आते हुए देख लिया। तभी स्वर्णा ने गाते हुए चिल्लाया...
"अरे, अरे, अरे, अरे, बुआ और रमणी दीदी
आ रही हैं,…
आ रही हैं…!
जाएंगे, जाएंगे,
हम जाएंगे,
जाएंगे, जाएंगे,
हम जाएंगे…!!"
... फिर हम सभी वैसे ही चिल्लाने लगे। ऐसे ही शोर मचाते हुए हम दौड़कर उनके पास चले गए और उनके साथ-साथ घर तक आए। लेकिन इस तरह आते वक्त बुआ ने हमारी तरफ देखा तक नहीं; वे बस रमणी दीदी का हाथ थामे, अपना मुंह ऊपर उठाए घर तक पहुंच गईं।
उस दिन के बाद से जब भी वे हमारे घर आतीं, तो हमने भी वैसा ही व्यवहार करने की आदत डाल ली थी। आख़िर उस समय हम बच्चे ही तो थे, इसलिए हमारे दिल बहुत मासूम और साफ़ थे।
एक दिन जब बुआ हमारे घर आईं, तो उन्होंने माँ से कहा,
"बड़ी, देखो ना, हमारी रमणिया को मैंने नया गाउन सिल कर दिया है। कैसा लग रहा है?… और इसके हाथों में चूड़ियाँ कैसी लग रही हैं? गीता के पास तो कुछ भी नहीं है।"
रमणी दीदी के दोनों हाथ लाल और काले रंग की चूड़ियों से भरे हुए थे। दुष्यंत भैया के साथ हुई उस घटना के बाद से मैंने अपनी जुबान पर जो ताला लगाया था, वह आदत इस समय तक भी वैसी ही बनी हुई थी। इसलिए मैं चुप रही, पर रमणी दीदी की चूड़ियों को देखकर मैंने मन ही मन सोचा,
"अरे वाह! यह तो बहुत कमाल है।"
इसी बीच हमारी माँ ने बुआ से कहा,
"दीदी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?… गीता के हाथ में भी तो एक चूड़ी है ना…''
"…अरे! उसके पास तो सिर्फ एक ही चूड़ी है।… हमारी रमणिया के पास चौबीस चूड़ियाँ हैं, चौबीस चूड़ियाँ!!"
बुआ ने गर्व से कहा।माँ ने शांत स्वर में जवाब दिया,
"अरे दीदी, गीता के पापा नहीं चाहते कि वह ढेर सारी चूड़ियाँ पहने। वे कहते हैं कि जब किसी लड़की के दोनों हाथ चूड़ियों से भरे होते हैं, तो वह लड़की सिंहली नहीं, बल्कि एक द्रविड़ औरत की तरह दिखाई देती है। लेकिन दीदी… गीता के हाथ में जो यह एक चूड़ी है, वह भी तो बहुत सुंदर है ना…!"
बुआ के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था, इसलिए वे कुछ भी नहीं बोलीं।
इसी तरह समय बीत रहा था। बहुत समय के बाद, एक दिन सुबह-सुबह विशाल फूफा हमारे घर आए।
"ओह पियसेन!… बहुत समय के बाद आए... आज काम नहीं है क्या? बेकरी में छुट्टी है?" दादी ने फूफा से पूछा।
"अरे नहीं, नहीं सासू माँ जी, मैं एक नई ख़बर लाया हूँ। दरअसल बात यह है कि आज सुबह जैसे ही मैंने बेकरी खोली, मेरा एक दोस्त आया था। उसने बताया कि हमारे ससुर जी के हत्यारे को पुलिस ने पकड़ लिया है। मैं बस यही ख़बर बड़े भैया को देने आया था। अब मैं निकलता हूँ, अगर कोई ज़रूरत हो तो मुझे बता दीजिएगा।"
इतना कहकर विशाल फूफा वापस चले गए। उसके बाद जब दादी ने वह ख़बर पापा से बता दी, तो पापा ने विशाल फूफा से मिलने गए, और दोनों
ही पुलिस थाने गए थे।
[अगले भाग से संबंधित]

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