भोर से हीरक तक-[3]

 

                              जब मेरे पिताजी वापस चले गए , तो फिर मैं और मेरी माँ चौबीसों घंटे कमरे में रहने लगीं। केवल खाने पकाने के लिए माँ रसोईघर की ओर जाती थी। 

          बहुत समय के बाद बुआ के पति विशाल फूफा जी ने हमारे घर के सामने ढलान पर एक छोटा सा घर बनवाया। जब हम अपने घर के सामने खड़े होते, तो उस घर की छत को देख सकते थे। सुबह, दोपहर और रात का भोजन करने के लिए वे सभी हमारे घर आते थे।

           वह घर बनने के बाद, दादी हमेशा वहीं आती-जाती रहती थीं।

और कुछ समय बाद दादी ने नीचे, बुआ के घर पर खाना पकाना भी शुरू कर दिया। तब से हर सुबह मेरे दादाजी रोटी का एक टुकड़ा लेकर हमारे पास आते थे, लेकिन मुझे कुछ भी खाना पसंद नहीं था।

         जिस घर में हम रहते थे, उसी घर में नई चाची और चाचाजी भी रहते थे। रोज़ सुबह-सुबह वे दोनों भी नीचे घर जाकर वापस आते थे। लेकिन मेरी माँ वहाँ नहीं गईं, वे मेरे साथ घर पर ही थीं।

         एक दिन दादाजी ने मेरी माँ से कहा, 

       "बड़ी मालकिन, मुझे तुझ पर बहुत अफसोस होता है, पर मैं क्या करूँ?" 


     उसी पल दादी माँ हमारे पास आईं और उन्होंने दादाजी से कहा,  

          "अरे ओ जी, सुनिए! देखना होगा कि हमारे छोटे बेटे ने पैसे भेजे या नहीं। अगर नहीं, तो तुम हमारे छोटे बेटे को एक टेलीग्राम भेज दो और कहो कि जल्दी पैसे भेज दे तो अच्छा होगा, क्योंकि उसके द्वारा भेजे गए सारे पैसे अब खत्म हो चुके हैं।"


        जब से नई चाची हमारे घर आई थीं, तब से मेरी दादी हर वक्त उनके साथ गलत व्यवहार करती थीं। अगर वे खड़ी होतीं, तो दादी उन्हें डांटती थीं; और अगर बैठतीं, तो भी डांटती थीं। इस कारण नई चाची हर पल डर के मारे कांपती रहती थीं। इसी बीच, एक सुबह नई चाची अपने गांव चली गईं और काफी दिनों तक वापस नहीं आईं।

            फिर एक दिन, अचानक नई चाची हमारे घर लौट आईं। उसके बाद दादी ने उनके साथ दोबारा कभी गलत व्यवहार नहीं किया। यह बदलाव देखकर, हमारी बुआ ने माँ से फुसफुसाकर कहा, 

      "सुनिए बड़ी मालकिन, हमारी माँ को क्या हुआ है?... मुझे लगता है कि अब वे पहले से बहुत बदल गई हैं, है ना?"


इस पर माँ ने पूछा, 

      "अरे दीदी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"


       "अरी बड़ी मालकिन, क्या आपको दिखाई नहीं दे रहा है कि हमारी माँ अब कुसुमा के साथ कितना अच्छा बर्ताव कर रही हैं? पहले तो ऐसा नहीं था, है ना!" 


इस पर मेरी माँ ने कहा, 

       "जी हाँ दीदी, आपने बिल्कुल सही कहा।" 


फिर बुआ ने कहा, 

       "कभी-कभी मुझे लगता है कि कुसुमा ने माँ पर कुछ जंतर-मंतर कर दिया है, क्योंकि वह बड़ा आदमी बहुत चालाक है।" 

       माँ ने हैरान होकर पूछा, 

      "बड़ा आदमी? कौन है वह?" 


बुआ बोलीं, 

       "अरी पगली!   कुसुमा के पिता है ना, और कौन!।... मुझे लगता है कि हमारी माँ को कुसुमा ने मोहनी पेय पिलाया है।"


       वैसे दादी ने केवल कुसुमा के लिए नीचे घर से खाना लाना शुरू कर दिया था।  जैसे-तैसे करके कुछ महीने बीत गए थे। फिर से एक दिन चाची ने भुनभुनाया,

          "मैं...अपने...,मा...यके.. जाना चा...हती हूँ।" 


     ऐसी बात करना, उनकी आदत थी। फिर दादी ने कहा,

          "बहुत अच्छा निर्णय। तू जा! मैं भी साथ आऊंगी।" 


        "को...ई ज़रू...रत नहीं। मैं अकेली जाऊंगी।" 

         दादी ने हाँ कर दिया। लेकिन  जाते समय दादी उनके साथ रास्ते तक गई थीं।


      फिर एक दिन, जब मेरे पिताजी घर आए, तो दादाजी ने उनसे कहा, 

         "छोटे बेटे, तुम इस बड़ी मालकिन और हमारी बिटिया रानी को अपने साथ ले जाओ। इन दोनों के लिए यहाँ रहना ठीक नहीं है।"


      मेरे पिताजी के वापस लौटने से पहले, हम नई चाची को देखने के लिए उनके मायके गए। नई चाची के घर के चारों ओर बहुत सारे नारियल के पेड़ थे। उस घर की तरफ पैदल जाते समय, उन नारियल के पेड़ों के बीच से मैंने एक इंद्रधनुष भी देखा। 

          आँगन में नारियल की कई सूखी पत्तियाँ गिरी थीं। अचानक पैर फिसल जाने से, मैं नारियल की एक पत्ती पर गिर गई। फिर हम घर के अंदर चले गए। मेरे पिताजी एक कुर्सी पर बैठ गए और मैं उनकी गोद में बैठ गई। मेरी माँ खड़ी ही रहीं, क्योंकि वह घर बहुत छोटा था। वहाँ की मिट्टी की ज़मीन और नारियल की पत्तियों से बनी छत जैसी चीज़ें मेरे लिए बहुत अजीब थीं।

       और, उस घर के सामने समुद्र भी था। समुद्र तट पर कई लोग थे और बच्चे खेल रहे थे। हम भी समुद्र देखने गए। समुद्र की लहरें हमारी ओर दौड़ती हुई आईं, जिससे पिताजी के कपड़े गीले हो गए और माँ की साड़ी भी भीग गई।    

      दोपहर का खाना खाने के बाद, मेरी माँ ने नई चाची की छोटी सी बेटी को मेरी गोद में रख दिया। कुछ देर बाद हम वापस घर आ गए। 


       पिताजी के वापस जाते समय मैं और मेरी माँ भी उनके साथ चली गईं। हम भोर में घर से निकले थे। बहुत लंबा सफर तय करने के बाद  अंधेरा बढ़ने लगा था।

         हमारी कार के अंदर भी काफी अंधेरा था। जब मैं अपनी माँ की गोद में लेटी, तो मैंने देखा कि सोने की थाली जैसा चमकता चंद्रमा भी हमारे साथ-साथ चल रहा था। वह बार-बार सफेद सूती जैसे बादलों के पीछे छिप जाता। चंद्रमा को इस तरह निहारते-निहारते कब मेरी आँख लग

 गई, मुझे पता ही नहीं चला।

(अगले भाग से संबंधित)


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