भोर से हीरक तक-[5]
जब हम दोबारा गाँव वापस आए, तब घर में रमणी दीदी और उनके माता-पिता के अलावा दादी माँ, दादाजी, चाचाजी, नयी चाची और उनकी बेटी 'स्वर्णा' रहते थे। शुष्क क्षेत्र छोड़कर वापस आने के बाद, पिताजी भी हमारे साथ ही रहने लगे थे।
एक दिन मैं मेरी गुड़ियों के साथ खेल रही थी। तब रमणी दीदी ने मेरी सारी गुड़ियों को छीन लिया। तो मैं घर के अंदर चली गई। लेकिन मेरे मन में कोई नाराज़गी या दुखी नहीं था। मेरी बुआ भी वहाँ थीं। पर उसने रमणी दीदी को नहीं डांटा। और कुछ भी नहीं कहा। बुआ मुस्कुरा रही थीं। नयी चाची तब तक भी नहीं बोलती थीं।
मैं पापा के सामने आई। वे अपने कमरे में हमारा रेडियो ठीक कर रहे थे, क्योंकि उसमें से कोई आवाज़ नहीं आ रही था। पापा जानते थे कि ऐसे काम कैसे किए जाते हैं, उन्हें बहुत से काम आते थे। रेडियो मेज़ पर रखा था और उस मेज़ के सामने कुर्सी पर पापा बैठे थे। शुष्क क्षेत्र से वापस आने के बाद, पापा ने मेरे लिए खेलने का एक छोटा सा कुआँ भी बना दिया था, जो उनके कमरे के ठीक सामने था। मैंने फिर से अपना खेल शुरू कर दिया। मैं अपने खेल -घर में कपड़े धोने लगी, क्योंकि रमणी दीदी ने मेरी सारी गुड़ियों को छीन लिया था।
उसी वक्त माँ कमरे से रसोईघर की तरफ जा रही थीं। उन्होंने देखा कि मैं खेल के कुएं पर कपड़े धो रही हूँ। वे मेरे सिर पर दो मुक्के मारकर, रसोईघर में चली गईं।
कुछ देर बाद मेरी छोटी बहन रोने लगी। मेरी माँ, जो बहन की आवाज़ सुनकर कमरे की ओर भाग कर आ रही थीं, उन्होंने फिर से मेरे सिर पर एक मुक्का मारा। दादी ने यह देखा और वे ज़ोर से चिल्लाईं,
"अरे ओय बड़ी...! मैंने दो-तीन बार देखा है कि तुम उस बेचारी बच्ची के सिर पर मुक्के मार रही हो।... तुझे क्या हुआ है, हाँ?... पागल हो गई है क्या तू?.... वह बच्ची तो बस खेल रही थी और तुम?.. नालायक कहीं की!"
माँ चुपचाप कमरे के अंदर चली गईं। तब पापा ने दादी से पूछा,
"क्यों? क्या हुआ माँ?"
"कुछ नहीं... अब ठीक है।"
"हुआ क्या? कुछ नहीं तो फिर आप क्यों चिल्ला रही थीं?"
पापा ने थोड़े ऊँचे स्वर में पूछा। क्योंकि वे अपने काम में व्यस्त थे और उन्होंने कुछ देखा नहीं था।तब दादी ने थोड़े शांत स्वभाव से कहा,
"वह... मैं कह रही थी कि... मैंने दो-तीन बार देखा कि वह बड़ी बहू... इस बच्ची के सिर पर मुक्के मार रही थी।... इसलिए मैं उस पर चिल्लाई...हाहा..."
"पागल है क्या? क्या हो गया है उसे!"
पापा ने ऐसा कहा और फिर से अपना काम शुरू कर दिया।
कुछ हफ्तों बाद मेरी माँ ने एक और बहन को जन्म दिया। उस समय मेरी उम्र लगभग चार साल थी और मेरी छोटी बहन एक साल की थी। उस समय भी हमारे दादाजी उसी रेस्तरां में काम करने जाते थे, जहाँ उनकी मुलाकात दादी से हुई थी। उस समय दादाजी की उम्र लगभग अड़सठ वर्ष थी। एक दिन दादाजी ने पापा से कहा,
"छोटे बेटे ! अब तो मैं बहुत थक गया हूँ।.... कभी-कभी लगता है कि काम पर जाना भी मुश्किल है।''
"तो मत जाइए। इस उम्र में आपको काम करने के लिए कौन कहता है? मैंने पहले भी कई बार कहा है कि अब काम छोड़ दीजिए।"
पापा ने ऐसा जवाब दिया। उसके बाद दादाजी घर पर ही रहने लगे। लेकिन उन्होंने उसके बदले में एक नया काम शुरू कर दिया था।
हमारे दादाजी की ज़मीन, जिस पर हमारा घर था, वह पांच एकड़ की थी। दादाजी उनमें से साढ़े दो एकड़ का हिस्सा खुद साफ़ कर रहे थे। लेकिन किसी को पता नहीं था कि वे किसलिए जमीन साफ़ कर रहे हैं। इसलिए पिताजी ने अपने पापाजी से पूछा,
"पापाजी, आप किस काम के लिए इतना पसीना बहा रहे हैं? इस उम्र में इतनी थकान मोल लेना अच्छा नहीं!"
अरे छोटे बेटे, मैं अपने लिए नहीं, बल्कि हमारी बिटिया रानी के लिए ज़मीन का यह हिस्सा साफ़ कर रहा हूँ।"
दादाजी ने जवाब दिया।
"हमारी बेटी के लिए? बिटिया रानी के लिए क्या करने जा रहे हैं आप?"
"...हमें अपनी बिटिया रानी के भविष्य के बारे में अभी से सोचना चाहिए न? इसलिए मैंने सोचा कि उसके लिए कुछ 'रबर के पौधे' अभी से लगा दूँ तो अच्छा है, क्योंकि कौन जाने आगे हमारे साथ क्या हो।"
दादाजी ने कहा।
उस समय घर में सभी के लिए खाना पकाने की ज़िम्मेदारी हमारी माँ की ही थी। हमारी दादी भी खाना पकाने में माँ की मदद करती थीं। कभी-कभी हमारी मौसी भी हमारे यहाँ आया करती थीं, जो हमारे गाँव से बहुत दूर रहती थीं। मौसी का नाम 'हेममाली' था। उनकी बेटी 'निशा' और बेटा 'दुशांत' भी मौसी के साथ हमारे यहाँ आते थे।
जब मौसी हमारे घर आईं, तो वे निरंतर काम में लगी रहती थीं, क्योंकि वे ज़रा भी आलसी नहीं थीं। वे हमारे घर आकर खाना पकाना, बर्तन धोना आदि कार्य करने के साथ-साथ बगीचा साफ़ करना और पौधे लगाना वग़ैरा भी करती थीं।
लेकिन एक समय ऐसा आया जब काफी समय तक उनके बारे में कोई खबर नहीं मिली।
एक दिन हमारे पापा कहीं बाहर गए थे। जब वे वापस आए, तो उनके साथ एक बहुत बूढ़े दादाजी भी थे। उन दादाजी ने मुझे अपने पास बुलाया। वे अपनी हथेलियों में कुछ छुपाते हुए कहने लगे,
"चिड़िया, चिड़िया... मेरी मुट्ठी में एक चिड़िया है—छू.. टो, छू.. टो!"
उनकी इस बात की वजह से मैंने उनका नाम 'छूटो दादा' रख दिया था। उनकी आवाज़ भी किसी पक्षी जैसी ही थी। छूटो दादाजी हमारी दादी के पिताजी थे। उनका कद बहुत छोटा था और वे हमेशा एक डंडे के सहारे चलते थे। मेरी माँ ने मुझे बताया था कि उस डंडे को 'बैसाखी' कहते हैं। छूटो दादाजी को अंडे का पीला भाग अर्थात जर्दी खाना बहुत पसंद था। एक दिन दोपहर के भोजन में अंडे बने थे। छूटो दादा खाना खा चुके थे, लेकिन उन्होंने अंडे का पीला भाग नहीं खाया था। वे उसे पत्तल पर रखकर बस उसकी ओर देख रहे थे और बार-बार मुझे भी दिखा रहे थे। बहुत देर बाद आखिरकार उन्होंने उस जर्दी को अपने मुँह में डाल लिया। यह देखकर मेरे पिताजी ने मुस्कुराते हुए छूटो दादा की पत्तल पर एक और अंडा रख दिया।
एक सुबह रमणी दीदी और मैं खेल रही थीं। हमारी बुआ भी वहाँ मौजूद थीं। बुआ ने रमणी दीदी से कहा,
"अरे ओ, रमणिया… यह देख! गीता के बाल तो तुझसे भी लंबे हैं।''
"जी हाँ माँ, बहुत सुंदर हैं ना?"
रमणी दीदी ने कहा। बुआ चिढ़कर बोलीं,
"ऐसा नहीं होनी चाहिए। तू किसी भी चीज़ में गीता से पीछे मत रह!"
जब बुआ ने ऐसा कहा, तो रमणी दीदी के दिल में मेरे प्रति जलन की भावना पैदा होने लगी।
इसी बीच विशाल फूफा ने एक नयी बेकरी खोली। वह बेकरी हमारे घर से करीब तीन किलोमीटर दूर थी। विशाल फूफा अक्सर रात में उसी बेकरी में रुकते थे। कभी-कभी हमारी बुआ और रमणी दीदी भी रात बिताने वहाँ चली जाती थीं और अगली सुबह वापस
घर लौट आती थीं।
(अगले भाग से संबंधित)

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