भोर से हीरक तक-[7]

.                     "अरे, मैं हूँ ना छोटे बेटे... तू डर मत! अगर सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा तो मैं जाऊँगी। चल न मेरे बच्चे, हम दोनों चलेंगे!" 

    दादी ने दृढ़ता से कहा।


       पापा, दादी, दादा और चाचा तुरंत 'कंधों पर राजमिस्त्री' के साथ चले गए। मैंने देखा कि जाते समय पापा अपने साथ कैंची, सर्जिकल स्पिरिट की शीशी, सुई और धागा लेकर गए थे।


       "माँ, वे बूढ़े बाबा कौन हैं?"

मैंने अम्मा से पूछा।


       "वे 'कंधों पर राजमिस्त्री' हैं।"

माँ ने जवाब दिया।


     "आँ...? ऐसा भी कोई नाम होता है क्या?"

मैंने अचरज से पूछा।


     "नहीं-नहीं, वह उनका असली नाम नहीं, बल्कि एक उपनाम है जो गाँव वालों ने उन्हें दिया है। उनका असली नाम तो मुझे भी नहीं पता।''


     "पर माँ, लोगों ने उन्हें ऐसा नाम क्यों दिया?''


      "मैंने सुना है कि वे अपनी शादी के दिन, अपनी दुल्हन को अपने कंधों पर बिठाकर घर लेकर आए थे। बस, उसी दिन से गाँव के लोगों ने उन्हें 'कंधों पर राजमिस्त्री' कहना शुरू कर दिया।"


      "अरे! यह तो बहुत सुंदर कहानी है।"


       हम यह बात कर ही रहे थे कि तभी चाचाजी वापस घर आए। उन्होंने हड़बड़ाते हुए कहा,


        "बड़ी मालकिन! मैं थोड़ा गर्म पानी, सूखी लकड़ी, नारियल के खोल और माचिस का डिब्बा लेने आया हूँ। जल्दी से ये चीज़ें तैयार कर दीजिए।"


       माँ तुरंत उन चीज़ों को इकट्ठा करने लगीं। इसी बीच उन्होंने चाचाजी से पूछा,

       "क्यों मिल्टन भैया, क्या उस घर में जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं है?"


        "क्या कहूँ बड़ी मालकिन! वहाँ तो ज़मीन पर लीपा हुआ गोबर भी जगह-जगह से उखड़ गया है। उस बेचारी औरत को लिटाने के लिए एक अदद बिस्तर तक नहीं है। अरे बड़ी मालकिन, थोड़ा मिट्टी का तेल भी दे दीजिए, वह भी ले जाना पड़ेगा।".. …

चाचा वापस चले गए।


       इसके बहुत देर बाद पापा, चाचाजी, दादाजी और दादीजी वापस घर लौटे। तब माँ ने अपनी सास—जो रिश्ते में उनकी मामी जी भी थीं—उनसे पूछा,

       "क्या हुआ मामी जी, सब ठीक है ना? और... नन्हा मेहमान कौन आया है, बेटी या बेटा?"    


       दादी ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा, 

       "बेटी हुई है। पर हालत देखकर दिल बैठ गया बड़ी मालकिन।... उस नन्ही बच्ची को सुलाने के लिए उनके पास एक बिस्तर तक नहीं है। कितनी अजीब और लाचार दुनिया है।"


       बिस्तर पर लेटने के बाद, माँ ने धीरे से मुस्कुराते हुए फुसफुसाकर पापा से कहा,

     "सुनिए, जो कुछ भी हुआ... उसके बारे में बाहर किसी को मत बताइएगा। नहीं तो पूरे गाँव के लोग आपको 'दाइयों वाले बड़े गुरु जी' कहना शुरू कर देंगे!"

      

        पापा को शर्म आ गई होगी। उन्होंने कहा,  

        "हँ! अरे... पागल है क्या? तुम भी न, कुछ भी कह रही हो।" 


        उस घटना के लगभग एक सप्ताह बाद हमारे दादाजी ने हमें बुलाया।            "बिटिया रानी, स्वर्णा, रमणी, भाग्या!  बच्चियों, तुम सब जाओ। बुआ के घर जाओ। जल्दी करो।" 


      "दादाजी, मेरा छोटा भाई?" 

    स्वर्णा ने पूछा। 


       "उसे छोड़ दो, तुम अपनी बहनों के साथ जाओ... मैं कुछ समय बाद तुम्हें बुलाऊँगा। तब वापस आना।"

तभी दादी आईं। उन्होंने कहा, 


       "बिटिया रानी... तू इस गोरी बहन को भी ले जा।" 

          ऐसा कहकर उन्होंने गोरी बहन को मुझे सौंप दिया। हम नीचे बुआ के घर चली गईं। बहुत देर बाद जब दादाजी ने हमें पुकारा, तब हम वापस ऊपर अपने घर आईं।


       "बिटिया रानी, इधर आना।..."


       दादी की आवाज़ सुनकर मैं उनके पास चली गई। वहाँ बिस्तर पर माँ लेटी हुई थीं और उनके पास एक छोटा-सा सुंदर-सा बच्चा था।


        "यह देखो, तेरा छोटा भाई है यह। आजा, इधर आकर यहाँ बैठ जा।"


          दादी ने लाड़ से कहा। जब मैं बिस्तर पर बैठ गई, तो उन्होंने छोटे भाई को मेरी गोद में लिटा दिया। इस तरह अब मेरी दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई हो गए। मुझे तुरंत याद आया कि जब चाची का बेटा पैदा हुआ था, तब भी दादी ने उसे बिल्कुल इसी तरह मेरी गोद में रख दिया था।

       लेकिन जैसे ही दादी कमरे से बाहर गईं, माँ ने मुझसे कहा, 


      "गीता, बच्चे को मुझे दे दो और आँगन से दो-तीन जलाऊ लकड़ियाँ अंदर ले आओ।"


       मैं वह काम निपटाने बाहर चली गई।  उसी बीच माँ ने फिर से मुझे पुकारा,

         "गीता...! गीता..., अरी ओ गीता...!!!"


        "मैंने कितनी बार मना किया है कि बच्चों को उनका नाम लेकर मत पुकारा करो! यह औरत कभी नहीं सुधरने वाली।....."

       कमरे से आई यह कड़क आवाज़ पिताजी की थी।


       पापा के मना करने के बावजूद माँ हमेशा मुझे नाम से ही पुकारती थीं। हाँ, पापाजी के सामने उन्होंने खुद को बदल लिया था और 'गीता बेटी' कहकर बुलाने की आदत डाल ली थी।


          एक शनिवार की सुबह लगभग दस बजे, दादी लेस गूंथ रही थीं। माँ छोटे भाई को सुला रही थीं और मैं चित्र बना रही थी। मेरी दो बहनें, भाग्या और निरुपा, कमरे में खेल रही थीं। चाचा, चाची और उनके दोनों बच्चे चाची के गाँव गए हुए थे। दादाजी अपने भाई को देखने गए थे। बुआ, रमणी दीदी और विशाल फूफाजी बेकरी में थे। उधर पापा अपनी नानी को देखने गए थे।


       कुछ समय बाद दादी रसोई की ओर चली गईं। माँ भी कमरे से बाहर आईं और मैं भी माँ के पास ही खड़ी थी। तभी एक अनजान व्यक्ति हमारे घर की ओर आता दिखा। उसने धूप का चश्मा पहन रखा था। वह एक गोरा और छैला युवक था। वह घर के सामने आकर रुका। वह किसी अजनबी की तरह नहीं, बल्कि पूरे हक से सीधा अंदर आया और माँ से पूछा,


        "मुझे पहचान सकती हो?"


       "म्.... हँ! मुझे तो.... आइए, अंदर आइए। यहाँ बैठिए। मैं अभी आती हूँ।"


         इतना कहकर माँ तुरंत अंदर चली गईं। और वे दादी के पास गईं। मैं भी माँ के पीछे-पीछे रसोईघर तक गई।


         "बड़ी मामी, बड़ी मामी!.... ये सुनिए मामीजी !  कोई आया है। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसे पहचान सकती हूँ? मुझे तो समझ नहीं आ रहा। आप ज़रा जाकर देख लीजिए।"


          माँ दादी को 'बड़ी मामी' बोलती थीं, क्योंकि मेरे दादाजी और मेरी नानी सगे भाई-बहन थे।


         दादी फटाफट बाहर चली गईं। माँ और मैं भी उनके पीछे-पीछे गईं।


        "अरे, यह हमारा शरद है ना! हे हे... तो कैसे हो शरद? कैसे आना हुआ? अब तुम कहाँ रहते हो? कितने लंबे समय बाद आए हो! बिटिया रानी, यह तो तुम्हारे मामाजी हैं।"

      दादी ने एक ही सांस में कई सवाल पूछ डाले।


    "... बड़ी मामी ने तो मुझे झट से पहचान लिया, लेकिन मेरी अपनी बड़ी बहन ही मुझे नहीं पहचान पाईं!...  इसका मतलब हमारी बड़ी मामी की आँखें अब भी बहुत अच्छी हैं, हा हा हा!"

          शरद मामा ने हँसते हुए कहा।


       "अरे, मैं कैसे पहचानती? तुम तो बहुत समय पहले हमारे घर से भाग गए थे। उस समय तुम्हारे चेहरे पर मूंछें भी नहीं थीं! क्या तुमने अब शादी कर ली है?"

     माँ ने पूछा।


     "पहले मैं हमारी बड़ी मामी के सवालों का जवाब दूँगा। ...मैं 'पोलोन्नरुवा' शहर में रहता हूँ, क्योंकि मेरी शादी वहीं हुई है।"

  शरत मामा ने कहा।


     "पत्नी का नाम क्या है? और...  बच्चे भी हैं क्या?"

      वह आवाज़ माँ की थी।


        "उसका नाम 'वायलेट' है। एक बेटा है और दूसरा अभी आने वाला है। कल रात ही मैंने सोचा कि गाँव जाना चाहिए। वैसे, यह बिटिया अब कौन सी कक्षा में पढ़ रही है?"


       "अभी तो यह पहली कक्षा में पढ़ रही है।... मैं चाय लेकर आती हूँ।"

      यह कहकर माँ घर के अंदर चली गईं।


      "शरत , ...क्या तुम गाँव गए हो?" 

     दादी ने पूछा।


      "अभी तक तो नहीं। सोच रहा था कि सबसे पहले बड़ी दीदी के पास ही जाऊँगा।"


     "...कल ही चले जाओ। तुम्हें देखकर अपनी नानी को बहुत अच्छा लगेगा। तुम तो उनकी आँखों का तारा हो ना!"


      अगले दिन सुबह ही मामा गाँव जाकर शाम वापस लौट आए। वह एक सप्ताह तक हमारे यहाँ रहे। उस सप्ताह के दौरान वे हर शाम घूमने बाहर जाते थे और उन्होंने गाँव के हर एक व्यक्ति को पहचान लिया था।


         उसके बाद, बिना किसी खास घटना के लगभग दो हफ़्ते गुज़र गए। 

      फिर एक दिन दादाजी अचानक एक टेलीग्राफ लेकर आए, और उन्होंने उसे माँ के हाथ में रख दिया। माँ ने उसे पढ़ा।

         "दादी का देहांत हो गया है। अंतिम संस्कार शनिवार, ग्यारह तारीख को किया जाएगा।"- छोटे चाचा।


        तभी पापा और दादीजी भी उधर आए।


       "क्या? .. तो हम अभी जाएंगे ना?"

      माँ ने रोते हुए कहा।


      "अरे बड़ी मालकिन...तुम?... तुम कैसे जाओगी? फिर बच्चों को किसके साथ छोड़ेंगे?.. तुम हमारी माँ के साथ घर पर ठहरो। मैं पिताजी के साथ जाऊंगा।"

पापा ने अपना निर्णय बता दिया। 


          कुछ देर बाद माँ ने मुझसे फुसफुसाकर कहा,

      "देखो गीता, बचपन में ही मैंने अपने माँ-बाप को खो दिया था। तब से हम तीनों को नानीजी ने ही पाला-पोसा। आज उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने का भी नसीब नहीं है मुझे।"


       "माँ, नानी को क्या हुआ है?" 

मैंने पूछा।


       "मेरी नानी भी भगवान के पास चली गई हैं।"


      "भगवान के पास?.. तो यह तो अच्छा है ना?"


      "तुम्हारे बड़े दादा, .. मतलब छूटो दादा... उनके साथ जो कुछ हुआ था, आज मेरी नानी के साथ भी वही हुआ है।"

[अगले भाग से संबंधित।]                 

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