कच्चा-पक्का प्यार


 हाँ, मैं फूल सी सुंदर हूँ,

फिर भी युवती जैसी हूँ

हाँ, मैं सबसे शोभन हूँ,

पर क्या अब भी कुंवारी हूँ?


हाँ, मैं एक परी जैसी हूँ,

किसी किशोरी समान भी हूँ

हाँ, मैं प्यारी नारी हूँ,

बोलो ना भला मैं क्या करूँ? 


मेरी पायल छनक रही है,

लेकिन तेरी धुन पे नहीं।प्यारी आँखें झलक रही हैं,

लेकिन तेरी चाह पे नहीं।


नज़र से दिलों को चुराने वाली,

मैं तो कहीं नहीं।

आँखों में है ममता का समंदर,

धरती खींच रही।


हे मेरे लिए मर जाने वाले 

प्यार इतना सस्ता है क्या? 

हे दिलवाले, तेरे लिए है जो 

प्यार कच्चा-पक्का है क्या? 


किसी के इंतज़ार में थे जो काले बाल कभी,

चाँदी उतर आ रही है आज 

उनमें कहीं-कहीं। 


अरे छोड़ दो सुंदरता को 

जो मुझे छोड़ के जा रही है,

अरे छोड़ दो प्यार मुहब्बत 

अंतिम बिंदु भी दूर नहीं है।

     _(DS).



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