तो मैं पैदा हुई हूँ तेरे लिए ?
पहला प्यार नहीं है निर्धन
मिटने के बाद नहीं निर्मल
तुमने ही जब उसे फेंक दिया,
तो क्यूँ फिर से ये उम्मीद।
क्या सूर्य उगता है हमारे लिए,
क्या फूल खिलते हैं भौरों के लिए।
क्या फल आते हैं बंदरों के लिए?
और मैं पैदा हुई हूँ तेरे लिए ?
अगर मैं एक फूल बन जाऊं,
तो मैं फूलों के बीच सूख जाऊंगी
अगर मैं एक नदी बन जाऊं,
तो मैं समुद्र की गोद में छिप जाऊंगी
अगर मैं एक शायरी बन जाऊं,
तो मैं तेरे लिए नहीं होगी,
मैं अपने लिए तेरी उपमा न मानूँगी ... —दुल्कान्ति।✍.

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