*अदृश्य हमसफ़र! (साँस)
यह दिल धड़कता है जानू,
तेरी ही खातिर।
ख़्याल भी आते हैं जानू,
तेरी ही खातिर।
पलकें झपकती हैं जानू,
तेरी ही खातिर।
मैं जी रहा हूं मेरी जानू,
तेरी ही खातिर।
तुझ बिन न मिली है फ़ुरसत,
तू थी और है मेरी ताकत
दुआ है मेरी, मृत्यु तक,
न हों तुझे कोई दिक्कत।
झरने जैसे हैं तेरे अलक,
मैं सोचता हूँ जानू।
कंठ स्वर में है वो खनक,
मुझे लगता है जानू।
बिठा लूँ तुझे पलकों पर,
कैसे कर लूं जानू?
जब मैं 'गुस्सा' बनता हूँ तो,
तू बनती है 'बेचैनी'।
जब मैं 'शांत' बनता हूँ तो,
तू बनती है वह 'मौनी'।
सरदी में तू ध्यान से जाना,
मुझे भी ठंड पकड़ लेगी।
गर्मी में तू ध्यान से चलना,
मुझे भी दवा खानी होगी।
चंदन जैसा है खुशबूदार
कभी नहीं बन तू बदबूदार
अंजन जैसा है चमत्कार
तू बन मेरे दिल का निखार।
दुनिया में शामिल हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
घूमता फिरता हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
हँसता-रोता हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
कर्म भी करता हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
प्यार भी करता हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
जंग भी करता हूँ जानू,
तेरी ही खातिर।
आख़िर तू निकलेगी जानू,
तेरी ही खातिर।
—दुल्कान्ति समरसिंह।

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