निर्दयता का बूमरैंग - 2
चम्पिका की सबसे छोटी बहन सुरेखा भी एक सरकारी स्कूल की टीचर थी। अड़तीस साल की उम्र में निलंत नाम के एक बस ड्राइवर से उसकी शादी हुई थी। निलंत अपनी पत्नी सुरेखा से सात साल छोटा था। इस कारण निरूपा यानी परिवार की तीसरी बहन इस शादी के बहुत खिलाफ थी। चम्पिका ने तो कहा था कि शादी का उम्र से कोई नाता-रिश्ता नहीं होता, अगर वे दोनों ख़ुशी से जी सकते हैं तो उतना ही काफी है।
वैसे शादी के बाद सुरेखा अपने ससुराल में नहीं, बल्कि मायके में ही रहने लगी, इसलिए निलंत भी सुरेखा के मायके आ गया। इसका एक और कारण यह था कि निलंत उसी इलाके में चलने वाली बस का ड्राइवर था।
जब शादी के बाद निलंत सुरेखा को साथ लेकर पहली बार अपने घर गया था, तो उसने सुरेखा से कहा था,
"आज़ हमारी माँ की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए तुम भी खाना पकाने में हाथ बँटाओ।..."
सुरेखा अपने मायके में भी खाना नहीं पकाती थी, इसलिए उसने मुँह फुलाकर अपनी सासू माँ की मदद की।
दूसरी बार भी जब वह निलंत के साथ अपने ससुराल गई, तो उस दिन भी निलंत ने कहा,
"माँ अकेले खाना पका रही हैं, तुम भी उनकी मदद करो।"
तब सुरेखा ने कहा,
"मैं तो नहीं पकाने वाली, मैं अपने लिए खाने का पार्सल घर से ही लाई हूँ।"
उस वक्त निलंत का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया था, लेकिन वह कुछ भी नहीं बोला। अगली बार जब वह अपने गाँव जा रहा था, तब सुरेखा ने कहा,
"क्या तुम गाँव जा रहे हो?.. रुको ज़रा, मैं भी आती हूँ।.."
तब निलंत ने कहा,
"तुम्हारा वहाँ के माहौल से मेल नहीं बैठता, ..इसलिए इसके बाद तुम्हें वहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
उस दिन के बाद निलंत कभी भी सुरेखा को अपने गाँव साथ लेकर नहीं गया। गुणवती यानी सुरेखा की माँ ने कई बार सुरेखा से कहा था,
"निलंत तुम्हें छोड़ कर अपने गाँव जाता है तो जाने दो, तुम खुद किसी दूसरे समय वहाँ जाओ, वरना घर-परिवार टूट सकता है।"
लेकिन सुरेखा ने उनकी बात नहीं मानी और वह कभी वहाँ नहीं गई।
शादी के बाद सुरेखा पूरी तरह बदल गई थी। एक तरफ वह बहुत स्वार्थी हो गई थी, दूसरी तरफ निलंत की उम्र से छोटी लड़की बनने की कोशिश कर रही थी। उसने छोटे-छोटे कपड़े पहनना शुरू कर दिया था और तुतलाकर बात भी करती थी, लेकिन कपटता में वह एक नंबर की बन गई थी। उसने अपने हम-उम्र पुरुषों और खुद से छोटे लड़कों को 'भैया' कहकर पुकारना भी शुरू कर दिया था। उसका यह बदलाव देखकर एक दिन गुणवती ने निरूपा से फुसफुसाकर कहा,
"देखा ना, कि एक बेमेल शादी से औरत का गौरव कैसे तार-तार हो जाता है!.. कभी-कभी तो मुझे डर लगता है कि यह कल या परसों में एक छोटी बच्ची की तरह ज़मीन पर रेंगना न शुरू कर दे! ...इतना ही देख लेना मेरे लिए काफी होगा। भला एक टीचर होने के नाते भी यह खुद को संभाल नहीं पा रही है?.. छी! तुम्हारे पापा यह नाटक देखने से पहले ही दुनिया छोड़कर चले गए, यही अच्छा हुआ। वरना वे यह सब देखकर खुदकुशी ही कर लेते।..."
"..हाँ माँ, आपने बिल्कुल सही कहा।.. देखिए ना माँ, सोशल मीडिया पर भी वह अपनी हालत का तमाशा बना रही है। उन तस्वीरों में वह किसी चुड़ैल जैसी लगती है, सच में देखकर शर्म आती है। ..मेकअप भी करती है तो ढंग से करना चाहिए ना माँ, पर उसका तो कोई ढंग ही नहीं है! सचमुच उसे देखकर तो ऐसा लगता है जैसे बस उसका मलद्वार ही बिना मेकअप के बचा हो!"
"वैसे चम्पिका के साथ तो कभी ऐसा नहीं होता। सच में बेटी, ऐसा क्यों है?.."
"पता नहीं माँ, वह तो अपने हिसाब से अपने सवालों को जैसे-तैसे हल कर लेती है। लेकिन हमारी यह छोटी बहन, चम्पिका दीदी से कितनी ज़्यादा बुद्धिमान है!.. और जो कुछ इस छोटी बहन के साथ हुआ है, अगर वही चम्पिका के साथ हुआ होता... तो कोई बात नहीं है ना माँ?"
निरूपा ने कहा।
कहा जाता है ना कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है! भले ही ये लोग चम्पिका के साथ कितना ही गलत व्यवहार करते थे, फिर भी वह ईश्वर के भरोसे अपनी ज़िंदगी बहुत अच्छी और सुकून से जी रही थी।
इसी बीच सुरेखा ने एक और काम शुरू कर दिया—अपने मायके की ज़मीन पर हक जमाना। उसने अपनी सभी बहनों और भाई के पास जाकर उनके हस्ताक्षर लिए और काम पूरा कर लिया। उसके बाद उसने उस ज़मीन पर लगे बड़े-बड़े पेड़ निलंत के ज़रिए कटवा दिए और बेच दिए। कुछ समय बाद उसने एक सेकंड हैंड कार खरीदी।
इसी दौरान गुणवती की आँखों का ऑपरेशन हुआ था। जब उन्हें देखने के लिए सुरेखा और निलंत उस कार से चम्पिका के घर आए, तो उस दिन सुरेखा का घमंड सातवें आसमान पर था। वह अपनी कार का रौब दिखाना चाहती थी, लेकिन चम्पिका के पास उससे भी ज़्यादा अच्छी और महँगी कार थी। उस दिन चम्पिका को अपना घमंड दिखाकर उनके चले जाने के बाद, अगली सुबह गुणवती ने चम्पिका से पूछा,
"क्या तुम मुझे घर छोड़ दोगी या मैं अकेले चली जाऊँ?"
"बिटिया को क्लास जाना है माँ, उसके वापस आने के बाद गाँव चलेंगे,"
चम्पिका ने अपनी माँ से कहा।
"मैं इतनी देर नहीं रुक सकती, मैं अकेले ही जाती हूँ।"
"बस में?"
"पागल हो क्या?.. तुम मुझे एक ऑटो बुला दो।"
"मैं तो यहाँ किसी ऑटो वाले को नहीं जानती। ऊपर से अनजान ऑटो वाले के साथ जाते समय कहीं उसने माँ का सारा सामान छीन लिया तो?"
चम्पिका ऐसा कह ही रही थी कि तभी एक ऑटो वहाँ आ पहुँचा।
"ठीक है, ठीक है, ऑटो आ गया। मैं जाती हूँ,"
ऐसा कहकर गुणवती उस ऑटो की ओर चली गईं और चम्पिका भी हैरान होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगी। तभी निरूपा उस ऑटो से उतरी और उसने गुणवती का सारा सामान उठाकर अंदर रख दिया।
"मुझे काम पर जाना है माँ, देर हो रही है। जल्दी कीजिए,"
ऐसा कहती हुई निरूपा भी गुणवती के साथ उसी ऑटो में चली गई।
"माँ, आप उदास मत होइए। नानी वापस चली गईं, यह एक तरह से अच्छा ही हुआ। वे आपके साथ बहुत बुरा बर्ताव करती हैं,"
चम्पिका की बड़ी बेटी ने कहा।
इस घटना को एक हफ़्ता बीत गया था। एक दिन निरूपा ने चम्पिका को कॉल किया और कहा,
"चम्पिका दीदी, आपको पता है? हमारी छोटी की शादी टूटने जा रही है।.. अगर हम निलंत के घर जाएँ तो अच्छा नहीं होगा क्या? ..क्योंकि निलंत के माता-पिता भी तो हम सभी के घरों में आए हैं ना।"
"ठीक है, इस शनिवार को चलेंगे, मैं तुम्हारे जीजाजी को भी बता दूँगी,"
चम्पिका ने कहा और निलंत के घर जाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
इसी बीच अचानक सुरेखा का कॉल आया,
"क्या आप लोग निलंत के घर जाने वाले हैं?"
"हाँ, शनिवार को जाने वाले हैं,"
चम्पिका ने कहा।
"किससे पूछकर जाने की तैयारी कर ली? बिना मुझसे पूछे?... आप लोगों को वहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
"मुझे तो कोई ज़रूरत नहीं है, निरूपा बहन ने मुझे बुलाया, इसलिए मैंने हाँ कह दिया।.. वरना मैं कोई पागल नहीं हूँ जो यहाँ-वहाँ घूमती रहूँ। मुझे बहुत काम हैं, हुह!"
ऐसा कहकर चम्पिका ने फोन काट दिया।
कुछ दिनों बाद निरूपा ने फिर से चम्पिका को कॉल किया,
"सुना है कि निलंत अपना सारा सामान लेकर गाँव चला गया है और वह वापस नहीं आने वाला। उसने हमारी छोटी बहन से कहा है कि तलाक होना चाहिए। उसने सुरेखा से यह भी कहा कि —'तुम्हें भी तलाक चाहिए ना, तो मेरी मदद करो, तुम्हें कोर्ट-कचहरी आने की कोई ज़रूरत नहीं, मैं जैसा कहूँगा तुम वैसा करो'।'—
कुछ महीनों बाद उनका तलाक हो गया। सुरेखा ने अपनी कार भी बेच दी। यह खबर सुनकर चम्पिका की बड़ी बेटी ने कहा,
"छोटी माँ और नानी माँ को अपने-अपने किए की सज़ा मिल गई। है ना माँ?"
यह सुनकर चम्पिका की तीसरी बेटी ने कहा,
"माँ, स्कूल में टीचर ने हमें सिखाया था कि—'जितने लंबे पैर हों, उतनी ही चादर फैलानी चाहिए।'
बड़ी बेटी नर्मदा हँसते हुए बोली,
"अरी पगली! तूने तो बात को ही तोड़-फोड़ दिया, हाहाहाहा! ऐसा नहीं है। सही कहावत है—'जितनी लंबी चादर हो, उतने ही पैर फैलाने चाहिए।'—
यह बात सुनकर चम्पिका को भी हँसी आ गई। उसने बड़ी बेटी को टोकते हुए कहा,
"हाहाहाहाहा! बड़ी बिटिया, तुमने भी ठीक नहीं कहा। 'तोड़-फोड़' नहीं बिटिया, बात को 'तोड़-मरोड़' दिया कहते हैं!"
— DS.

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