—निर्दयता का बूमरैंग-
चम्पिका अपने परिवार में सबसे बड़ी बेटी थी। उसकी तीन छोटी बहनें और एक छोटा भाई था। वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी। उसकी माँ उसे जो भी काम सौंपतीं, वह उसे पूरी निष्ठा से पूरा करती थी। माँ का काम करने के लिए चम्पिका अक्सर अपने सारे काम छोड़ देती और सबसे पहले उनकी आज्ञा का पालन करती, लेकिन उसे यह बिल्कुल नहीं पता था कि गुणवती उसकी सगी माँ नहीं, बल्कि सौतेली माँ है।
धीरे-धीरे चम्पिका बड़ी हो गई और उसे एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। इसके बाद भी वह अपना मासिक वेतन अपनी माँ के हाथों में सौंप दिया करती थी। चम्पिका की माँ गुणवती उसकी कोई मदद नहीं करती थीं, लेकिन चम्पिका को अपनी माँ से इतना प्यार था कि उसे गुणवती का अपने प्रति यह रूखा बर्ताव दिखाई ही नहीं देता था।
जैसे-तैसे चम्पिका की शादी भी हो गई और उसकी तीन बेटियाँ भी हुईं। इसी बीच एक दिन चम्पिका की दूसरी बहन निरूपा ने उसे फोन किया और कहा,
"चम्पिका दीदी, हमारी माँ को दोनों आँखों से ठीक से दिखाई नहीं देता है। आपने भी उनकी हालत देखी ही है... इसलिए अगर आप गाँव जाकर उन्हें अपने साथ ले जाएँ तो अच्छा होगा।.. आपका घर अस्पताल के पास ही है, तो आप माँ की आँखों का ऑपरेशन करवा दीजिए ना!..."
निरूपा की बात सुनकर, चम्पिका अपने पति से अनुमति लेकर अपनी तीनों बेटियों के साथ मायके पहुँची और गुणवती को अपने साथ ले आई। इसके बाद, पूरे सात महीने तक चम्पिका, उसकी तीनों बेटियाँ और उसका पति गुणवती की आँखों के ऑपरेशन और उनकी देखभाल में ही लगे रहे।
उस दौरान चम्पिका की बेटियाँ ठीक से स्कूल भी नहीं जा पा रही थीं, और कभी-कभी तो उन्हें रात-रात भर अस्पताल में ही रुकना पड़ता था। इसी बीच एक दिन चम्पिका ने अपने इकलौते भाई जनक से कहा,
" छोटा भाई, आज रात भी माँ के साथ अस्पताल में ही रहना होगा, क्योंकि डॉक्टर को उनके कुछ और टेस्ट करने हैं।.. क्या तुम आ सकोगे?"
"...अरे चम्पिका दीदी! आज सुबह से ही मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है, इसलिए मैं आज काम पर भी नहीं गया हूँ।... प्लीज़, आप ही मैनेज कर लीजिए ना!.."
भाई जनक का जवाब यही था।
इसके बाद चम्पिका ने अपनी दूसरी बहन निरूपा को फोन किया, तब उसने कहा,
"अरे चम्पिका दीदी!.. आज हमारी छोटी बहन सुरेखा यहाँ आई हुई है। उसने बताया कि उसके पति निलंत जी गाँव गए हैं, इसलिए वह आज की रात मेरे ही घर बिताएगी। अब आप ही बताइए, मैं कैसे आ पाऊँगी?…"
उसकी बात सुनकर चम्पिका मन ही मन सोचने लगी,
—'वाह भाई, यह तो बहुत ही अच्छा हुआ! सुरेखा के पति गाँव गए हैं, तो वह अस्पताल आकर अपनी बीमार माँ की मदद करने के बजाय निरूपा के घर छुट्टियाँ मनाने चली गई! हुह! अद्भुत बेटियाँ हैं भाई, वाह!'—
ऐसा सोचने के बाद उसने अपनी सबसे बड़ी छोटी बहन चाँदनी को फोन किया। चाँदनी ने कहा,
"अरे चम्पिका दीदी, आपको तो पता ही है, अगर मैं स्कूल नहीं गई तो मेरा काम कौन संभालेगा? प्रिंसिपल से बहुत डाँट पड़ेगी मुझे। मैं बाद में आऊँगी, ठीक है?"
चाँदनी की बात सुनकर चम्पिका ने गहरी साँस ली और सोचा,
—'हे भगवान! ये कैसे बच्चे हैं?.. मैं भी तो एक सरकारी शिक्षिका हूँ, मेरे भी बच्चे हैं और मेरे पति भी सरकारी नौकरी में हैं। हम सब भी तो अपना सब कुछ छोड़कर यहाँ लगे हैं। फिर ये लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं? खैर, कोई बात नहीं! मुझसे जो बन पड़ेगा, मैं अपनी माँ के लिए वह सब करूँगी।'—
ऑपरेशन के बाद गुणवती की तबीयत अचानक और खराब हो गई, क्योंकि वह डायबिटीज़ यानी मधुमेह की मरीज़ थीं। इसी बीच एक दिन चाँदनी अपनी माँ को देखने आई, लेकिन अकेली नहीं, बल्कि अपने पति, बेटे और ननद के साथ। घर पहुँचते ही,
—"हे भगवान! यह क्या हो गया माँ को? मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था!"—
चाँदनी ने झूठे दुख के साथ कहा।
चम्पिका का सब्र का बाँध टूट गया और उसने तड़ककर कहा,
"क्या कहा? ..तुम्हें पता नहीं था?... सबसे पहले मैंने ही तुम्हें फोन करके माँ की हालत बताई थी, लेकिन तुमने बहाना बनाया था कि स्कूल नहीं जाओगी तो प्रिंसिपल से बहुत डाँट पड़ेगी! अब इतनी जल्दी भूल गईं क्या?"
चम्पिका के मुँह से यह सुनते ही चाँदनी की ननद बीच में कूद पड़ी और बोली,
"नहीं, नहीं चम्पिका जी! ..अगर आप भी चाँदनी के स्कूल में पढ़ा रही होतीं, तो आप भी इस तरह यहाँ नहीं आ पातीं ना!"
चम्पिका ने पलटकर जवाब दिया,
"हुह! क्या कहा?.. मैं भी चाँदनी की तरह एक टीचर ही हूँ,.. यह बात आप लोग भूल गए क्या? अगर मैं चाँदनी की जगह होती और माँ की बीमारी की खबर सुनती, तो तुरंत छुट्टी लेकर दौड़ी चली आती।.. क्यों? छुट्टियाँ क्या सिर्फ सैर-सपाटा करने के लिए होती हैं, माँ की सेवा के लिए नहीं?"
चम्पिका की बात काटकर चाँदनी ने पूछा, "अच्छा सुनिए चम्पिका दीदी, क्या 'सुन्दर' बहन और छोटा भाई यहाँ आए हैं?"
चूँकि परिवार में सभी निरूपा को प्यार से 'सुन्दर' बहन कहते थे, इसलिए चाँदनी ने ऐसा पूछा था।
"हाँ, वे दोनों यहाँ आए थे और उन्होंने यहाँ रात भी बिताई थी।"
चम्पिका ने उन लोगों को सबक सिखाने के लिए सोच-समझकर एक झूठ बोल दिया। ये सारी बातें चाँदनी के पति कोसल चुपचाप सुन रहे थे। आख़िर में कोसल ने चाँदनी से कहा,
"तुम भी आज शाम तक यहीं रुको।.. मैं शाम को तुम्हें लेने वापस आऊँगा। ठीक है, अब हम चलते हैं।"
ऐसा कहकर वे लोग चाँदनी को चम्पिका के घर ही छोड़कर वापस चले गए। उनके जाने के बाद चाँदनी और गुणवती आपस में बैठकर कुछ फुसफुसाने लगीं। उसी दिन शाम को कोसल दोबारा आए और चाँदनी को अपने साथ वापस ले गए। लेकिन उस दिन के बाद से गुणवती ने चम्पिका के साथ अपना पुराना रूखा बर्ताव फिर से शुरू कर दिया था।
एक दिन चम्पिका की छोटी बेटी ने दौड़ते हुए आकर उससे कहा,
"माँ, नानी माँ ने मुझसे पूछा था कि क्या सबने खाना खा लिया? तब मैंने उनसे कहा कि माँ ने अभी तक खाना नहीं खाया है। यह सुनते ही नानी माँ ने बचा हुआ सारा खाना बाहर फेंक दिया! माँ, अब आपके खाने के लिए अंदर कुछ भी नहीं बचा है।"
हालात ऐसे होने पर भी चम्पिका ने माँ की इस कड़वाहट को चुपचाप बर्दाश्त कर लिया।
अगली सुबह लगभग साढ़े दस बजे सुरेखा और उसके पति आए। वे दोनों घर में मेहमानों की तरह ठाट से बैठ गए। थोड़ी देर बाद सुरेखा के पति निलंत ने चम्पिका से कहा,
"बड़ी दीदी, एक प्लेट लाइए प्लीज़!"
चम्पिका अंदर गई और एक प्लेट ले आई। तभी सुरेखा ने अपने बैग से खाने का सामान बाहर निकालते हुए बड़े घमंड से कहा,
"चम्पिका दीदी, हमें यहाँ का कुछ नहीं चाहिए।... हम अपने साथ कुछ तली-भुनी चीज़ें लाए हैं।.. बच्चों, तुम लोग भी खा सकती हो, क्योंकि हम अकेले इतना नहीं खा पाएँगे।.."
सुरेखा के इस बर्ताव को देखकर चम्पिका की आँखें भर आईं। उनके जाने के दो-तीन घंटे बाद गुणवती ने चम्पिका को पास बुलाकर कहा,
"हमारी छोटी बिटिया सुरेखा अपने कुछ पुराने कपड़े लाई थी, ताकि तुम्हारी इन बेटियों को दे सके।.. उसके पास बहुत सारे पुराने कपड़े हैं। उसने अपनी नौकरानी को भी बहुत सारे कपड़े दे दिए, और नौकरानी को देने के बाद जो कपड़े बच गए थे, वही वह इन तीनों के लिए ले आई है।"
"क्या? कहाँ हैं वे कपड़े?"
चम्पिका ने अपनी माँ से पूछा।
"मैंने वे कपड़े उन तीनों को दे दिए हैं," गुणवती ने जवाब दिया।
यह सुनते ही चम्पिका तेज़ी से घर की ऊपरी मंज़िल पर पहुँची। वहाँ उसने देखा कि उसकी तीनों बेटियों ने वे पुराने कपड़े पहन रखे थे। वे तीनों हूबहू किसी भिखारी लड़की जैसी लग रही थीं। ऐसा होना लाज़मी भी था, क्योंकि सुरेखा तैंतालीस साल की एक शादीशुदा औरत थी, जबकि चम्पिका की इन बेटियों की उम्र महज़ बारह, तेरह और चौदह साल थी। यह देखकर चम्पिका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने चिल्लाते हुए कहा,
"उतारो! तुम तीनों अभी के अभी इन पुराने कपड़ों को अपने शरीर से उतारो!!"
जब चम्पिका ने गुस्से में तमतमाते हुए ऐसा कहा, तो तीनों बच्चियों ने फटाफट नानी के दिए पुराने कपड़े उतारे और अपने खुद के कपड़े पहन लिए।
"आज के बाद तुम तीनों को किसी के भी पुराने कपड़े पहनना मना है! समझीं?"
इतना कहकर चम्पिका अपने कमरे की तरफ भागी और वहाँ जाकर फूट-फूटकर रो पड़ी। कुछ देर बाद, खुद को संभालकर वह वापस आई और अपनी बेटियों से बोली,
"मेरी प्यारी बच्चियों, मैं और तुम्हारे पापा, हम दोनों ही तो कमा रहे हैं। हर महीने मैं तुम तीनों के लिए नए-नए कपड़े लाती हूँ।... तुम्हारी पसंद की हर चीज़—चॉकलेट हो या पनीर—सब कुछ लाकर देती हूँ या नहीं? फिर तुम्हें किसी और के उतरे हुए कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत है?"
"हाँ माँ।"
बच्चियों ने सिर झुकाकर कहा।
"तो फिर क्यों इन पुराने कपड़ों को पहन लिया?"
"नानी ने दे दिए थे, इसलिए..."
"ठीक है, अब कोई बात नहीं। ...लेकिन आगे से कभी भी दूसरों के पुराने कपड़े मत पहनना, ओके?"
चम्पिका ने अपनी बेटियों को समझाते हुए कहा।
अगली सुबह, जब चम्पिका गुणवती के साथ डॉक्टर से मिलने जाने की तैयारी कर रही थी, तब उसने गुणवती से कहा,
"माँ, ज़रा अपनी फाइल दीजिए। जाने से पहले एक बार देख लेना चाहिए कि सारी रिपोर्ट ठीक हैं या नहीं।.." चम्पिका ने कहा।
"तुम मेरी चीज़ों में दखल देने मत आओ! मुझे अपनी आँखों से सब दिखाई देता है। हुह... आई बड़ी फाइल देखने वाली!"
गुणवती ने झिड़कते हुए कहा। जब गुणवती ने ऐसा कहा, तो चम्पिका चुपचाप बाहर चली गई।
डॉक्टर के पास जाते समय चम्पिका की बड़ी बेटी नर्मदा भी उनके साथ गई थी। उसे उसकी क्लास में छोड़कर चम्पिका अपनी माँ के साथ डॉक्टर के क्लिनिक पहुँची। अस्पताल में गुणवती का नंबर तैंतालीसवाँ था। उस वक्त डॉक्टर के केबिन के अंदर इकतालीस नंबर का मरीज़ था। अपनी बारी आने में बस थोड़ा ही समय देखकर चम्पिका ने अपनी माँ से कहा:
"माँ, पहले भी आपने मुझे अपनी फाइल देखने नहीं दी थी। अब तो दे दीजिए प्लीज! ...अगर कोई रिपोर्ट कम निकली, तो डॉक्टर आपको नहीं, बल्कि मुझे डाँटेंगे।"
चम्पिका की बात सुनकर गुणवती ने चिढ़ते हुए अपनी फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी। चम्पिका ने जैसे ही फाइल खोली, उसका माथा ठनका।
"हे भगवान,..माँ! इसमें रिपोर्ट्स कहाँ हैं? यह तो सिर्फ खाली कवर है ना!.."
गुणवती बिना किसी पछतावे के बोली,
"रिपोर्ट्स?... उन्हें तो मैं घर पर ही छोड़ आई हूँ। ..फाइल के अंदर रखती तो कहीं गुम हो जातीं!.."
"अरे भाई! यह क्या बकवास है?.. इसीलिए तो मैं यहाँ आने से पहले आपसे फाइल माँग रही थी।.. सिर्फ आँखों से दिखाई देना ही काफी नहीं होता, दिमाग भी ठीक से चलना चाहिए! ..उम्र बढ़ने के साथ-साथ होश भी कम होने लगता है। सिर्फ आपका ही नहीं, बढ़ती उम्र में सबका ऐसा ही होता है। ..अब क्या? वापस ही जाना पड़ेगा!.." चम्पिका ने माथा पकड़ते हुए कहा।
"नहीं-नहीं, बिना डॉक्टर से मिले तो मैं वापस बिल्कुल नहीं जाऊँगी!"
गुणवती अपनी ज़िद पर अड़ गई।
चम्पिका ने झुँझलाकर कहा,
"माँ, पागल हो क्या?...डॉक्टर के पास ऐसी खाली फाइलें ढेर सारी पड़ी हैं। ..उन्होंने आपको रिपोर्ट देखने के लिए बुलाया था, न कि यह खाली गत्ता देखने के लिए! हुह... अब चुपचाप घर वापस चलो।"
फिर गुणवती ने धीमे से कहा,
"तो मैं एक उपाय बताऊँ?... मैं तुम्हें पेट्रोल के पैसे दे दूँगी। ..हम फटाफट वापस घर जाकर रिपोर्ट ले आते हैं।"
"क्या बकवास कर रही हो माँ! ..हमारे वापस आने तक डॉक्टर क्या यहाँ हमारा इंतज़ार करते बैठे रहेंगे?.. देखो, अंदर अब बयालीसवें नंबर का मरीज़ है,.. और अगला नंबर आपका ही है!.. अगर हम इतनी दूर वापस घर जाएँगे और फिर लौटेंगे, तब तक बिटिया की क्लास खत्म हो जाएगी और वह वहाँ अकेली रह जाएगी। ..तब तक डॉक्टर साहब भी क्लिनिक बंद करके चले जाएँगे। मुझे कहीं नहीं जाना है!.. और माँ... आज आपने मुझे बहुत अच्छा सबक सिखाया है। सच है, हद से ज़्यादा इंसानियत दिखाना भी अच्छा नहीं होता।..."
—दुल्कान्ति समरसिंह।

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