*नामंज़ूरी की दवा —


 *नामंज़ूरी की दवा —


अजनबी बन बेटी  

अजनबी बन।

अवाम के सामने  

ज़माने के सामने 

अजनबी बन।

कभी नहीं होगी 

नामंज़ूरी तब।


अपने ख़ाविंद के सामने,

और औलाद के सामने।

अपनी ससुराल में,

या अपने नैहर में,

बनो तुम हमेशा नवागत,

कभी नहीं आएगी तकलीफ़ तब।


बंधु-बांधव तथा मनमीत,

हमसाया और फिर पड़ोसन,

ये सभी हैं ज़माने की गोद में,

घृणा का पात्र बन जाओगी ज़रूर तुम।


जो करना है करो ध्यान से,

जो उचित न हो तो रहा करो दूर से,

वरना बन जाओगी औज़ार,

सदा बन जाओगी बेकार।


अपनों के सामने

मत करो हद पार,

मत खोने दो निजी सम्मान।

मँझला रखो ना बर्ताव,

वरना बन जाओगी कल भृत्या,

फिर सहना होगा बस उकसाव।


अजनबी बन बेटी 

अजनबी बन।

अवाम के सामने

ज़माने के सामने

अजनबी बन।

अपनों के सामने

नवागत बन।

—दुल्कान्ति समरसिंह- [DS]

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