*पसंदीदा बेटी—


 *पसंदीदा बेटी—


       भानुमती अपने परिवार में दूसरी लड़की थी। उसकी एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई था। बड़ी बहन का नाम अशोका था और छोटे भाई का नाम रोहण था। भानुमती के पिताजी तोमस, अपनी बड़ी बेटी अशोका से बहुत प्यार करते थे और भानुमती की माँ सोमावती, भानुमती से प्यार करती थीं। परिवार में इकलौता बेटा तथा सबसे छोटा होने के कारण परिवार में सभी रोहण से बहुत प्यार करते थे। भानुमती के पिताजी एक किसान थे और माँ गृहिणी थीं। उस समय भानुमती की बड़ी बहन अशोका की शादी नहीं हुई थी, लेकिन वह एक सरकारी स्कूल में इंग्लिश टीचर के रूप में सेवा करती थी और भानुमती भी एक शिक्षिका थी। इस कारण से उनके पिताजी बहुत ख़ुशी से जीते थे। इसी बीच एक दिन अचानक एक युवक तोमस के घर आ पहुँचा। उसने खुद का परिचय देते हुए कहा, 


      "जी, मैं भानुमती टीचर के स्कूल में ही एक शिक्षक हूँ, मेरा नाम ललित शर्मा है। क्या भानुमती जी घर पर नहीं हैं?"


      "हूँ... वह तो अब तक नहीं आई, बस आती ही होगी। आप बैठिए न,"


      तोमस के ऐसा कहते ही भानुमती भी घर आ गई, लेकिन वह ललित शर्मा से बात किए बिना ही घर के अंदर चली गई। उसका यह बर्ताव देख कर सोमावती भी अपनी लाड़ली बेटी के पीछे-पीछे अंदर चली गई।


      "बिटिया, तुम्हारे स्कूल में पढ़ाने वाले उन टीचर से बात किए बिना तुम क्यों अंदर चली आईं?" 


     सोमावती ने भानुमती से पूछा। उस वक्त अशोका भी वहीं थी।


      "पापा बात कर रहे हैं ना माँ, थोड़ी देर बाद मैं भी बात करूँगी।.." 


भानुमती ने कहा। भानुमती ने ऐसा जवाब दिया, लेकिन वह फिर से अपनी माँ से फुसफुसा कर बोली,


    "माँ, कल उसने मुझसे पूछा कि क्या मुझे उससे शादी करनी चाहिए या नहीं... तभी मैंने कहा कि तुम्हें सीधे पापा से आकर पूछना चाहिए।"


     "ओह हो...! तो यह बात है। कोई बात नहीं, अब तुम्हारी उम्र भी शादी के लायक हो गई है... मैं उसके खाने-पीने के लिए कुछ तैयार करने जा रही हूँ।…"


       ऐसा कहती हुई सोमावती वहाँ से चली गईं। तभी भानुमती ने अपनी दीदी से पूछा,


     "दीदी, अगर वह सर मुझसे नहीं, बल्कि आपसे पूछते तो, आप हाँ कहतीं या ना कहतीं?…"


     "अरे भाई,..ये तुम क्या कह रही हो?... पागल हो क्या?" 

अशोका ने कहा।


     "नहीं नहीं दीदी, बताइए ना, अगर ऐसा हुआ तो उसे आपकी सहमति मिलेगी या नहीं?... सीधे बता दीजिए ना प्लीज!.."


     "नहीं...! मेरी चाहत अलग है, और तुम्हारी चाहत मेरी चाहत से अलग है।.." 

अशोका ने कहा।


      "हूँ...! वैसे वह बुरा भी तो नहीं है ना?" भानुमती ने उत्सुकता से पूछा।


      "देखने में तो कोई बुरा नहीं है। हाव-भाव, बातचीत सब अच्छे हैं। स्वभाव से भी बहुत शांत है वह... पर, मैंने तो इससे पहले उसे देखा तक नहीं। तुम्हारे जितना मुझे उसके बारे में कहाँ पता!.."


      "उस दिन के बाद ललित शर्मा भानुमती के घर आने-जाने लगा, लेकिन हमेशा नहीं, कभी-कभी। तोमस और सोमावती भी ललित शर्मा से बहुत प्यार करने लगे, क्योंकि ललित बहुत सीधा-साधा एवं शांत स्वभाव का व्यक्ति था।


      कुछ महीने बीत गए। भानुमती और ललित शर्मा की शादी भी पक्की हो गई थी। शादी दस मई को आयोजित होनी तय हुई थी। परिवार में सभी उसकी तैयारियों में व्यस्त थे। तीस अप्रैल की सुबह-सुबह ललित शर्मा आया था, ताकि एक होटल बुक कराने के लिए भानुमती को अपने साथ ले जा सके। सोमावती ने फटाफट नाश्ता भी तैयार कर दिया। लगभग आठ बजे ललित शर्मा और भानुमती घर से बाहर निकल गए।


       लगभग साढ़े दस बजे ललित शर्मा अपने एक मित्र चंद्ररत्न के साथ वापस तोमस के घर आ गया, और वह बहुत घबराया हुआ था।


      "क्यों ललित बेटा, इतनी जल्दी?... भानुमती कहाँ है?" 


    सोमावती ने पूछा। लेकिन ललित अपनी आँखों के आँसू पोंछ रहा था और उसने कुछ भी नहीं कहा। तभी उसका मित्र बोलने लगा।


     "आंटीजी, मैं किसी काम से सुबह-सुबह शहर आया था। उस वक्त ललित ने मुझे कॉल किया और कहा कि तुम अभी के अभी आओ, मैं मतुगमा बस स्टैंड पर हूँ। तो मैं भी फटाफट वहाँ पहुँच गया।.. ललित ने रोते हुए मुझसे कहा,

— "भानुमती और मैं सुबह-सुबह घर से होटल बुकिंग के लिए निकले थे। उसी बीच हमारे स्कूल में पढ़ाने वाले दया सर हमारे सामने आ पहुँचे। भानुमती बिना कुछ कहे उनके साथ चली गई।.." ऐसा कहकर ललित फिर से रोने लगा। ...आंटी जी, क्या भानुमती ललित को पसंद नहीं करती थी?.."


     चंद्ररत्न की यह बात सुनकर तोमस के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। सोमावती के भी होश उड़ गए थे। कुछ देर तक तोमस ने कुछ भी नहीं कहा और वह चुप ही रह गया।


      "अब हम चलते हैं आंटीजी, कोई ज़रूरत होगी तो मुझे कॉल कीजिएगा।" 


      ऐसा कहकर चंद्ररत्न और ललित दोनों चले गए। उनके जाने के बाद पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था।

      तोमस की हालत देखकर अशोका को बहुत अफ़सोस हो रहा था। कुछ देर बाद उसने रोहण से कहा,


      "रोहण, हम जल्द ही समंता के घर जाकर देखेंगे कि भानुमती वहाँ है या नहीं।.."


   "..क्यों दीदी, अगर वे दोनों भाग गए हैं, तो क्या वे समंता दीदी के घर गए होंगे?.." 

रोहण ने पूछा।


     "अरे भाई तू चुप कर। पागल है क्या?... वह दया सर तीन बच्चों के पापा हैं।.. वे भागे नहीं होंगे। हम चलेंगे, तुम आओ मेरे साथ।.."


       अशोका रोहण के साथ समंता के घर गई, लेकिन उसने सीधे कुछ नहीं पूछा। उन्हें देखकर समंता ने ही खुद कहा,


    "क्यों दीदी, भानुमती हमसे नाराज़ हो गई है क्या?.. बहुत दिनों से उसने मुझे कॉल तक नहीं किया है।..." 

समंता ने पूछा।


      यह बात सुनकर अशोका समझ गई कि भानुमती समंता के घर में नहीं है। फिर वे दोनों भाई-बहन घर लौट आए और घर आते-आते रात के सात बज चुके थे। दहलीज तक पहुँचते ही अशोका ने रोहण से कहा,


     "घर के अंदर कोई मेहमान है।.. कौन हो सकता है?" 


       अशोका ने फुसफुसाकर कहा। जैसे ही वे घर के अंदर पहुँचे, उन्होंने तोमस को उस मेहमान से कहते हुए सुना, 


      "आपकी बहुत बड़ी कृपा है कि आपने हमारी इतनी बड़ी मदद की है।... इससे आगे का मामला हम खुद हल कर लेंगे।.. अब आप इसे हम पर छोड़ दीजिए।.. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जी।.."


     अशोका सीधे ही घर के अंदर चली गई और सोमावती भी उसके पीछे-पीछे चलने लगी।


       "माँ, वो दया सर हैं ना?... भानुमती कहाँ है?.." 

अशोका ने उत्सुकता से पूछा।


       "हाँ, दया सर कह रहे हैं कि भानुमती हिमाली मौसी के घर पर सुरक्षित है। उसने दया सर से कहा है कि वे उसके कपड़े लेकर कल वापस कैंडी आ जाएँ।....तभी तो पापा दया सर से कह रहे थे कि सर, इसके आगे का मामला हम खुद संभाल लेंगे, आप इसे यहीं छोड़ दीजिए।.." सोमावती ने अशोका को समझाया। 


       अगली सुबह तक तोमस ने एक भी शब्द नहीं बोला और खाना भी नहीं खाया। उस दिन लगभग साढ़े दस बजे अशोका ने सोमावती से कहा,


      "माँ, सच में मुझे भी थोड़ा सा शक है कि दया सर और भानुमती के बीच कोई ग़लत संबंध है।.. पापा के मना करने पर भी अगर दया सर वापस मौसी के घर जाकर भानुमती को लेकर कहीं और भाग गए तो सब खत्म हो जाएगा।.. इससे पहले कि ऐसा कुछ हो, हमें अभी के अभी कैंडी जाना चाहिए। अभी ज़्यादा देर नहीं हुई है माँ, हम चलेंगे, जल्दी कीजिए।"


      वैसे वे माँ-बेटी दोनों कैंडी के लिए निकल गईं। हिमाली मौसी का घर पेरादेणिया में था। वहाँ बहुत सारी चट्टानें और ढलानें हैं। जब वे वहाँ पहुँचीं, तो रात के सात बज चुके थे। घरों से निकलने वाली रोशनी के सहारे वे दोनों हिमाली मौसी के घर तक पैदल जा रही थीं। उस घर तक गहरी ढलान थी, इसलिए अशोका ने अपनी माँ से कहा,


      "माँ, ठीक से रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है।.. आइए, मैं आपका हाथ पकड़ लेती हूँ।.. वरना आप गिर सकती हैं।"


     भानुमती की चिंता में सोमावती पहले से ही परेशान और गुस्से में थीं, उन्होंने झिड़कते हुए कहा,


     "तुम अपना काम देखो! हूँ... आई बड़ी मुझे पकड़ने वाली।"


      ऐसा कहती हुई वे तेज़ी से आगे बढ़ने लगीं। अशोका धीरे-धीरे चल रही थी। तभी अचानक सोमावती का पैर फिसल गया और वे लुढ़कते-लुढ़कते सीधे हिमाली मौसी के घर के सामने एक बड़ी चट्टान की तलहटी में जाकर रुकीं।

घर के सामने वाले हिस्से पर हिमाली मौसी की दुकान थी। उनकी बेटी निशा, जो थोड़ी सी अजीब स्वभाव की थी, ज़ोर से चिल्लाने लगी,


      "बड़ी अम्मा आ गईं! सुनो अम्मा, बड़ी अम्मा आ गईं...!!!"


       वह आवाज़ सुनकर हिमाली मौसी बाहर आईं और उन्होंने सोमावती से पूछा,


       "दीदी, आप अकेली आई हैं क्या?"


        सोमावती के मुँह से कोई शब्द निकलने से पहले ही निशा बोल पड़ी,


       "नहीं नहीं अम्मा, अशोका दीदी भी पीछे-पीछे आ रही हैं।"


      "कहाँ है अशोका?"


       "वे पैदल आ रही हैं अम्मा।"


       "तो? बड़ी अम्मा पैदल नहीं आई हैं क्या?"


      "नहीं अम्मा, वे तो जेट की स्पीड से सीधे नीचे आ गईं!... और अगर हमारे घर के सामने यह चट्टान नहीं होती, तो आज बड़ी अम्मा यहाँ रुकने के बजाय सीधे नीचे गाँव में जाकर लैंड करतीं, हाहाहाहाहा!" 

निशा ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा।

—दुल्कान्ति समरसिंह-

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