—सविंदु की डायरी: *कलुतरा की यादें—


                  मेरा नाम सविंदु है, और मेरी मम्मी ने कहा कि अगले महीने मेरा चौथा जन्मदिन है। मेरी मम्मी भी टीचर हैं और पापा भी। मेरे एक ही चाचाजी हैं, उनका नाम शांतनु है और वे पुलिस अंकल हैं।वे बहुत दूर पुलिस की नौकरी करते हैं। जब मैं तीन साल का हो गया था ना, तब चाचाजी की शादी चाँदनी चाची से हुई थी। मेरी दादी ने मुझे बताया कि चाँदनी चाची भी मम्मी-पापा की तरह बच्चों को पढ़ाती हैं। मैं और चाँदनी चाची बहुत प्यार-प्यार करते हैं।छुट्टियों में चाँदनी चाची मुझे बहुत सारी कहानियाँ सुनाती हैं और मेरे लिए प्यारे-प्यारे खिलौने भी लाती हैं। एक दिन मेरे पापा ने दादी माँ से कहा,

      "अम्मा, हमारे छोटे भाई का ट्रांसफर हो गया है, इसलिए कल से वह कलुतरा पुलिस थाने में ड्यूटी करेगा।.. और वह कल से कलुतरा पुलिस क्वार्टर में रहने जा रहा है। आज रात हमें भी वहाँ ठहरना पड़ेगा।..."

       जब हम कलुतरा जाने के लिए तैयार हुए, तो पापा की मोटरसाइकिल पर मम्मी के बैठने के लिए जगह ही नहीं बची! इसलिए मम्मी ने कहा,

      "मैं किसी ऑटो से आ जाऊँगी, .. आप लोग मोटरसाइकिल से चले जाओ।"

      उसके बाद मेरी मम्मी और दादी माँ एक पड़ोसी अंकल के थ्री-व्हीलर में बैठकर चली गईं। और पापा और मैं मोटरसाइकिल से चले गए।

       जब हम चाचाजी के नए क्वार्टर पहुँचे, तो वहाँ चाँदनी चाची नहीं थीं। मैंने तुरंत अपने चाचाजी से पूछा

        "चाचाजी, चाची कहाँ हैं?"

      उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा, बल्कि मेरे पापा से बोले,

      "उसे अभी तक इस नए क्वार्टर के बारे में नहीं पता है। वह अपने मायके  गई हुई है। आज शुक्रवार है ना, इसलिए मैं अब उसे ही लेने जा रहा हूँ। वरना कल सुबह वह हमारे गाँव चली जाएगी।"

      उसके बाद चाचा ने मुझसे कहा,

       "सविंदु, तुम्हारी चाँदनी चाची आकर खाना बना देंगी, तब तक तुम अपनी मम्मी से चाय बनवाकर पी लो.. और किचन में बिस्कुट वगैरह भी रखे हैं।..." 

       ऐसा कहकर चाचाजी अपनी मोटरसाइकिल से चले गए, और हमने चाय भी पी ली। बहुत देर बाद चाचाजी चाँदनी चाची को साथ लेकर आ गए, लेकिन चाचाजी चाची को डाँट रहे थे। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि वे चाची को किसलिए डाँट रहे थे।


       अगली सुबह मेरी मम्मी ने कहा

       "अब हम वापस घर चले जाएँगे।"

   तभी दादी ने कहा,     

       "तुम लोग जाओ।... मैं कुछ दिनों बाद छोटे बेटे के साथ गाँव वापस आऊँगी।..."

       दादी की बात सुनते ही मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ दिन बाद ही जाऊँगा। तभी मैंने भी कहा

       "पापाजी,.. मैं भी दादी के साथ ही वापस गाँव जाऊँगा!"


तभी मम्मी ने कहा—

      "अरे बेटा, तुम पापा के बिना नहीं रह सकते हो। रात को अगर तुम पापा को ढूँढ़ते हुए रोने लगे, तो चाचाजी क्या करेंगे? तुम हमारे साथ ही चलो।"

      जब मम्मी ने ऐसा कहा तो मैंने पापा से पूछा।  

         "पापाजी,.. मैं सचमुच नहीं रोऊँगा। क्या मैं भी कुछ दिनों के लिए यहाँ रह जाऊँ?..."

      पापा ने प्यार से मेरी ओर देखा और कहा— 

      "हूँ! ठीक है, ठीक है। लेकिन तुम वहाँ कोई भी शरारत या परेशानी मत करना।... तुम तो तुम्हारी चाची के सबसे अच्छे साथी हो ना!.."

      ऐसा कहकर पापा, मम्मी के साथ वापस चले गए। कुछ देर बाद जब मैं चाची के साथ किचन में था, तब चाचाजी ने चाची से कहा— 

       "क्या हम कलुतरा बोधि की पूजा करने चलें? हमारी शादी के बाद से हम कहीं भी घूमने नहीं गए हैं। अम्मा को भी बहुत अच्छा लगेगा। हाँ, हाँ! अब जल्दी से तैयार हो जाओ।"

     जब चाचाजी ने ऐसा कहा, तो चाची ने अगरबत्ती, दीये की बत्तियाँ, फूल, नारियल का तेल और पूजा का सारा सामान तैयार कर लिया। फिर उन्होंने मुझे भी तैयार किया और उसके बाद चाची खुद भी तैयार हो गईं।

      आखिर में, जब मैं चाची के साथ मिलकर घर की खिड़कियाँ बंद कर रहा था, तब चाचाजी ने कहा—

       "खिड़कियाँ बंद हो गईं ना? सविंदु, तुम आ जाओ। तुम्हारी चाची दरवाज़ा बंद करके आ जाएँगी।"

       जब चाचाजी ने ऐसा कहा, तो मैं भी उनके साथ नीचे चला गया, क्योंकि चाचाजी का नया क्वार्टर ऊपर था और उसके नीचे भी एक घर था।   हमारी दादी बहुत बूढ़ी थीं और छोटे कद की थीं, ऊपर से उन्होंने साड़ी पहनी हुई थी, इसलिए उनके लिए मोटरसाइकिल पर बैठना बहुत मुश्किल था। बहुत कोशिश करके चाचाजी ने दादी माँ को मोटरसाइकिल के पीछे बिठाया।  चाँदनी चाची ने भी दरवाज़ा बंद किया और हमारे पास यानी चाचाजी की मोटरसाइकिल के पास आते ही कहा—

       "हमें एक थ्री-व्हीलर बुला दीजिए, मोटरसाइकिल पर हम सब तो जा नहीं सकते ना!... और मुझे यहाँ का कोई रास्ता भी नहीं पता है, वरना..."

      उसी बीच मैंने मन ही मन सोचा— 

       'मैं भी चाची के साथ ही जाऊँगा।'

        मुझे नहीं पता कि चाची की बात चाचाजी को सुनाई दी या नहीं, उन्होंने चाची पर चिल्लाकर कहा,

        "तुम मेन रोड तक पैदल जाओ और बस से आ जाओ! बस स्टैंड पर उतरकर बोधि मंदिर तक जल्दी-जल्दी पैदल आना, वरना माँ के लिए ज़्यादा देर तक खड़े रहना मुश्किल होगा।"

         ऐसा कहते ही चाचाजी ने मुझे उठाकर अपनी मोटरसाइकिल के आगे बिठाया और तेज़ी से मोटरसाइकिल चला दी।

       उस वक्त मुझे चाँदनी चाची की बहुत याद आ रही थी। मुझे उनका अकेलापन महसूस हो रहा था और मेरी आँखें भर आईं। मैं अपने आँसू पोंछने लगा। यह देखकर चाचाजी ने पूछा— 

        "क्यों? बैठने के लिए जगह कम पड़ रही है क्या?"

       मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। मुझे मन ही मन लग रहा था कि ये चाचाजी कितने बुरे हैं! हम सबको एक साथ जाना चाहिए था ना... या फिर दादी माँ को चाची के साथ बस से आने देते तो अच्छा होता... या मुझे ही चाची के साथ आने देते तो कितना अच्छा होता! बेचारी चाची को भी रोना आ गया होगा ना...


       मंदिर पहुँचकर दादी माँ पूजा करने लगीं। तब चाचाजी ने मुझसे कहा—  

       "बेटा, तुम भी जाओ और दादी के साथ पूजा करो।"

       लेकिन मैं चाँदनी चाची के मंदिर पहुँचने तक बड़ी बेचैनी से उनका रास्ता देख रहा था। बहुत देर बाद चाची आखिरकार आ गईं। उनका पूरा चेहरा पसीने से भीग गया था और वे बहुत तेज़ी से सांसें ले रही थीं। उनके मंदिर के अंदर आने से पहले ही चाचाजी ने उनसे पूछा—

       "इतनी देर कहाँ लगा दी तुमने?...हां?.. माँ को वापस भी जाना है ना, इस उम्र में उनके लिए इतनी देर खड़े रहना बहुत मुश्किल है। जल्दी करो, बेवकूफ कहीं की!.. अगर पूजा करनी है तो फटाफट कर लो।"

तभी चाची ने कहा— 

      "ज़रा देखो तो सही, मेरा पूरा चेहरा और शरीर पसीने से तरबतर हो गया है, यहाँ तक कि ब्लाउज़ भी भीग गया है! मैं भला इतनी हड़बड़ी में कैसे पूजा करूँ?..."

        "हूँ, हूँ!! अगर ऐसा है तो पूजा करना रहने दो। मैं एक थ्री-व्हीलर बुला देता हूँ,..."

         जब चाचाजी ने ऐसा कहा, तो मैंने सोचा कि चाची की हालत देखकर अब चाचाजी को भी दुख महसूस हुआ है। 

   फिर चाचाजी ने कहा—

         "...मेरी बेचारी माँ के लिए मोटरसाइकिल पर वापस जाना बहुत मुश्किल होगा, इसलिए मैं माँ के जाने के लिए एक थ्री-व्हीलर बुला देता हूँ। माँ को अकेले तो भेज नहीं सकता, इसलिए तुम उनके साथ चली जाओ।"

         जब चाचाजी ने ऐसा कहा, तो चाची ने जवाब दिया— 

       "मैं इतनी दूर पैदल चलकर आई हूँ और बहुत थक गई हूँ। मुझे अब किसी थ्री-व्हीलर से नहीं जाना है। मैं जैसे आई हूँ, वैसे ही खुद वापस चली जाऊँगी। आप लोगों को जो ठीक लगे, वो कर लो।"

         ऐसा कहकर बिना पूजा किए ही चाची पैदल वापस चली गईं।  चाचाजी ने बहुत मुश्किल से दादी माँ को मोटरसाइकिल पर फिर से बिठाया और मुझे भी आगे बिठाकर वापस क्वार्टर आ गए।  उसके बाद मैंने चाची से पूछा— 

       "चाची, आप मुझसे नाराज़ हैं क्या?"

        चाची ने मुस्कुराकर कहा— 

      "अरे नहीं मेरे छोटे! .. मैं भला तुझसे किसलिए नाराज़ होऊँगी?"

—दुल्कान्ति समरसिंह।═𝐃𝐒═

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