मर्द डरता है।


 मर्द डरता है।


नहीं हूँ मैं कोई मदारी, 

नहीं हूँ मैं कोई खिलाड़ी।

नहीं हूँ मैं कोई दुरात्मा,

नहीं हूँ मैं कोई अनाड़ी।


मेरे दस सिर हैं-कहती है पुस्तक, 

पूछो अपने दिल से देकर दस्तक,

'गर कोई नर हो तो अति बुद्धिमान,

बदले में कैसे पाता वह दस मस्तक?


स्वर्ग जैसा है यह पुष्पक का सिंहासन,

मर्द डरता है देखके यह पुष्पक विमान।

गर्म-बर्फ़ फ़र्क नहीं यह वातानुकूलित,

सिर्फ एक इतर आसन है यह एक हैरान।


पिता मैं हूँ, बेटा मेरा रावणहत्था,

आज भी है ना, राजस्थान से रिश्ता।


राम और लक्ष्मण से करीब-करीब था,

शूर्पणखा की नाक लेकर फिर ख़फ़ा ही था।

और सीता बहन को गुफ़ा में डाल कर,

-हाय!-

राम-रावण युद्ध से मैं हार गया था।


भले ही हालात ऐसे थे फिर भी यार,

वह भी नहीं था मेरा ही कसूरवार।

गुफ़ा में रहती सीता की, जैसे एक बाप,

करता था देखभाल और लंकाई उपचार।


बैर निकालने ही नहीं, उसे बंद रखा था मैंने यार,

एक भाई को उसकी बहन की महिमा है अति सुंदर हार।

इसे दिखाने की थी मुझमें, सख्त ज़रूरी भाव,

स्त्रीपुर की सुरंग थी सीता का एक सुखदायक घर।


राम, तुझमें हैं गलतफहमियां,

और मुझमें है स्त्री की अहमियत।

सीता है साध्वी की

मुहर हमारी,

सीता की सरिता है

हसीन दिशा की।

सीता अम्मान मंदिर ही नहीं ,

सीता एलिया भी शान है हमारी।


नहीं हूँ मैं कोई मदारी, 

नहीं हूँ मैं कोई खिलाड़ी।

नहीं हूँ मैं कोई दुरात्मा,

नहीं हूँ मैं कोई अनाड़ी।


ब्राह्मण ऋषि विश्रवा और राक्षसी—

कैकसी हैं जनक-जननी,

ब्रह्म-राक्षस कहती है मुझे

इसलिए यह दुनिया ज़मीनी।

भगवान शिव का परम भक्त—

राजा मैं हूँ वीणा धारी,

तमिल का महान राजा हूँ मैं,

कहता है भारत-दाहिनी।

—दुल्कान्ति समरसिंह। —DS

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