—यकायक चूक हो+ अम्मा!—


 —यकायक चूक हो+ अम्मा!—


सुपूजित ख़ैरियत 

हो तो जिस गोद की

गोद है अम्मा की।


अभ्यागत अमरता

हो तो एक छाती की

छाती है अम्मा की।


असलियत हुई नियत 

हो तो जिस प्रेम की

वह प्रेम है अम्मा।


अनगिनत अहमियत 

हो तो जिस नाम की

वह नाम है अम्मा।


वे नहीं जैसा एक नगीना 

हैं जैसी मणिमाला का हीरा। 

वे नहीं जैसा एक वर्बीना,

हैं जैसा गजरे का मोगरा।


त्रिपुर से मिली थी 

दिल की निरपेक्षता,

त्रिमूर्ति ने सौंप दी— 

थी सहनशीलता।


दिनकर ने चुरा ली थी उनकी दानशीलता से थोड़ी सी,

हिमकर ने छुपा ली थी उनके चित्त से सौम्यता थोड़ी सी।


आँधी के सामने भी अचल

रहता है हिमालय,

वह भी अम्मा जैसा अटल है

नहीं कोई संशय।


गिरतीं तो माँ अपने, 

संतान के साथ।

वर्षा भी गिरती है, 

हर बूँद के साथ।


नदियाँ अगणित हैं, 

उछंग में जलधि के,

इनकार न करता वह 

अम्मा को देख के।


गगन खाता है खूब डाँट,

और पृथ्वी भी,

मानो अम्मा की तरह,

वे भी बेफ़िक्र हैं।


वचनों से अत्युत्तम सबसे सुंदर वचन हैं अम्मा,

अर्थों में सर्वोत्तम सबसे गंभीर अर्थ हैं अम्मा।

 

हज़ारों नज़ारों से सुखद  नज़ारा हैं अम्मा, 

यकायक चूक हो,

मुँह से निकलता है+'अम्मा'!

—दुल्कान्ति समरसिंह—

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