*लोक-सुलाभ ग़ुलाब—.


 *लोक-सुलाभ ग़ुलाब—. 


सिद्धिदाता दिए 

वर प्रदान जिसे 

वे प्रसिद्ध बनके,

जन गण को तुष्ट करते,

भीड़ ऐसे कहती,

फिर भी किसे प्रसिद्धि कहते?…

क्या वे विश्वव्यापी जैसे,

विश्वग्राम तक भी 

सुप्रसिद्ध होंगे ?


करने वालों को -सियासत,

पता है ,राष्ट्रपति की इज़्ज़त।

परदेसी लोगों को -अशिक्षित,

कैसे पता चलेगा कि उनकी हैसियत?


कितने नामी लोग थे जगत में,

बूढ़े जानते हैं उनके बारे में।

आज के नवयुवकों को क्या पता,

कि क्या इतिहास था उनके ज़माने में।


घुमंतू नट की एक ही दुनिया,

है अपना जमघट।

कौन प्रसिद्ध या ना प्रसिद्ध है,

उनके लिए तो नहीं झंझट!


नौनिहाल का संसार में तो,

प्रसिद्धि ख़्वाबों में भी नहीं।

ऐसे में मशहूर है कौन,

उसे कोई परवाह नहीं।


गायक, नर्तक, रचक, प्रबंधक-

सब से मशहूर हैं भगवान।

लेकिन जग में कोई न जाने,

कौन हैं वास्तव में भगवान।


फूल भी खिलते हैं

इस धरती— पर,

ख्याति हर जगह नहीं।

गुलाब है इकलौता मशहूर,

सबको पता है,

मतभेद नहीं।

 —दुल्कान्ति समरसिंह।[DS]

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