—जगत की लत।


 —जगत की लत।


विश्व की आदत 

विश्व में है,

कौन बदल सकता है यार।

विश्व की लत 

हर जगह ही है,

ये कैसे बदल सकता है यार।


कितने सुगंधित पुष्प तो हैं पर,

मक्खी मधु नहीं पीती है यार।

बदबूदार उस सूरन फूल पे,

जाकर वह सुख लेती यार।


चाहे साल भर भूखा रहता,

शेर नहीं घास खाता है यार।

लगता है वह काक भी कोयल,

लेकिन चुप रहने तक यार।


बंदर बूढ़ा हो जाए पर,

कुलांचना नहीं भूलता यार,

दूध से धोओ चाहे कोयला,यह

कभी नहीं रंग बदलता है यार।


चाहे सींचो गुड़-घी भी,

पर नीम न मीठा होए यार।

कितना भी अच्छा कर लो पर,

दुर्जन सुजन न बनता है यार।

— दुल्कान्ति समरसिंह। [DS]

Comments

Popular posts from this blog

නිශා , නුඹ හිනැහියන්

यादों के फूल।

भोर से हीरक तक-[ 2 ]