*मुखड़ा ग्रंथ की जंजीर*
भोर-शाम-रात मुख्य द्वार बंद है,
और सारे गैरों को भी—हाँ, निरूद्ध है।
अंदरूनी भाग पूर्णतः रिक्त है,
यह अनोखी रूपरेखा मुखड़ा ग्रंथ की है।
मिलनसार लोग से मिलना भी शौक है,
सुखद-सुंदर रूप देखना भी शगल है।
लिखित-रचित कुछ तो पढ़ने में भी मरज़ी है,
अतेव कुछ गैरों को वह अनुरोध करता है।
दिल से भला है बन्दा,
पर पास हैं भय-शंका।
कभी-कभी खोलता मेहमानों की प्रोफ़ाइल,
चोरी-चोरी चुपके-चुपके मचाते हलचल
क्योंकि उसको डराती है जली-कटी बातें,
तजरबा है भूल नहीं पुरानी यादें।
तस्वीर की जगह नहीं अपनी तस्वीर,
देखता वह दूसरों के चित्रों की जंजीर।
ढूंढता है वीडियो पर अनेक बकवाद,
यह न जानते पत्नी और औलाद।
शाम ढले तो नदी किनारे होता,
जेब खुले तो चलभाष उसमें होता।
सारी दुनिया उसके हाथ में होती,
चल बसने वाली बात याद ना आती।
पोते करते हैं उनकी सारी मदद,
पाते हैं वे भी इस बंदे की मदद।
नाते, होने के एक दादा साहब,
जाते तो अच्छा है नव दुनिया की तरफ।
—दुल्कान्ति समरसिंह — ═𝐃𝐒

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