*अनंग से जंग।*


 *अनंग से जंग।*


मनको भनक भी लगने ना दो दिल,

प्यार हो गया है उससे।

उसको इंगित करना है दिल,

ग़ौर से और सनक से।


दिमाग पागल, 

करता है जंजाल,

जाना हुआ तो बेडौल।


मेरी मुहब्बत, 

होगी दूषित

पहुँच जाएगा आघात।


उसके बाल खुले हुए हैं, तो 

अति मनभावन है,

पर मन देखेगा तो, कहेगा

आकृतिविहीन है।

 

लब पे झलके 

मुस्कान, जिसकी

नहीं है कोई उपमा, 


वे दो नैना,

मेरी कल्पना, 

बनाया है अपना।


ऐ दिल मेरे प्यारे जनाब,

वह लड़की तो लाजवाब।

दुनिया में सबसे अजीब,

वह है क्या मेरा नसीब?


पहला दर्शन 

था आकर्षण

मुस्काया अंग-अंग,


दिल, तेरी ऋजुता, 

जवाबी होता,

करना पड़ेगा क्या जंग?


मन से विरोध आने से 

पहले कोई अपनाने से 

ऐ दिल कह दो अनंग से, 

कि कुछ तो करा दो ढंग से।

—दुल्कान्ति समरसिंह।═𝐃𝐒.

Comments

Popular posts from this blog

නිශා , නුඹ හිනැහියන්

यादों के फूल।

भोर से हीरक तक-[ 2 ]