— प्यार का नसीब —


 — प्यार का नसीब —


जन्म भर में कभी न मुझे

हुआ था प्यार का नसीब।

ज़िंदगी में कभी न हुई,

स्नेह से मैं खुशनसीब।


स्वामी दिनकर ने चाँद का,

मुखमँडल तक कभी ना देखा,

चाँदनी की बहती धारा

धरातल तक बनती रेखा।


फिर भी चमकता है चंदा,

रश्मि देता किरणमाली।

और धरती पे खिलते हैं फूल,

चाँदनी है खिलाने वाली।


चाँद-सूरज सिखाते हैं सबक,

कि कैसा चलता है प्रेम,

उन्हें देखकर मुझे भी लगा,

कि ऐसा ही करना है प्रेम।


जनम-जनम का साथ है उनका,

ऐसा होता प्यार अपार,

दुनिया को विस्मित करता प्रेम,

विश्वकर्मा हैं ज़िम्मेदार।

–दुल्कान्ति समरसिंह– [—𝐃𝐒.]

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