—नभोवाणी।
—नभोवाणी।
पहले-पहल बहुत भला था अपनापन,
मन से, गहरे हृदय से था वह अपनापन।
पर अजीब है आजकल का अपनापन,
लाभ-स्वार्थ पर चलता है यह अपनापन।
लंबे-लंबे बालों का जूड़ा बांधते,
सज-धज कर टखने तक लुंगी पहनते।
वह पारंपरिक मर्द अपने रिश्ते,
दिल से, मन से अच्छे से थे निभाते।
शाम को जाता था वह संधि-स्थल पर,
खैनी चबाता था चाय की दुकान पर।
मित्र जनों से जुड़ता था रास्ते पर,
उस बीते दौर में था ऐसा हर नर।
ग्राम-प्रमुख, भंते या
प्रधान शिक्षक,
पुलिस हवलदार हो या
कोई अध्यापक।
रोगी या गर्भिणी को
आसपास देख-देख,
किसी भी हालत में वह
नहीं था बेफ़िक्र।
कोई बात न थी कि वह किसकी पत्नी,
मर्द न मानता था उसे महज़ कामिनी।
पुरुष उसे देता था गौरव यानी,
तहे दिल से मानता था उसे मानिनी।
उस दौर का नर जैसा है, यह सूरज,
चाँदनी है जैसी, उस युग की औरत।
पुरखों का अपनापन था अति महत,
नभोवाणी है यह भगवान की बात।
—दुल्कान्ति समरसिंह। [—𝐃𝐒.]

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