इंसानी फितरत-
-इंसानी फितरत-
अरी, अरी, इंसानी फितरत,
किधर है तेरी इंसानियत?
सबसे आगे है हैसियत,
क्या यह है अपनी असलियत?
नहीं पूछती है खैरियत,
खाती-पीती, न करती मेहनत
दिखाती रहती झूठी मुहब्बत,
अरी तेरे पास हैं बुरी-बुरी आदत।
बिना किसी भी काबिलीयत,
भले ही अनुचित,जुटाके हिम्मत
उचित जनों को कराती पीड़ित,
जगह लेती तू बिन किए साबित।
जो होता है तो खूबसूरत,
तेरे साथ हैं ईर्ष्या-नफरत
और जो होता है तो बदसूरत,
उसे नीचा दिखाने की जरूरत।
जिसके पास हो तो धन दौलत
जलन होती है तेरी ताकत
उसे गरीब कराने में ही चिंतित,
तू है इस दुनिया में यमदूत।
अगर किसी को मिली है तो जन्नत,
वह है उसकी अच्छी किस्मत
करने बजाय अपनी मरम्मत,
क्या फ़ायदा, माँगने से मन्नत।
- दुल्कान्ति समरसिंह- ═𝐃𝐒.

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