*दिल की कठपुतली।*


 *दिल की कठपुतली।*

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शीशा है इस दिल से आधा,


फूट जाता है,


टूट जाता है।


तेरी अदा को देखने से यह,


मचल जाता है, 


पिघल जाता है।


तेरी धड़कन से भी यह दिल,


मेल खाता है,


हाँ, मेल खाता है।


हूर, तुझको पाने में यह कुछ भी करेगा,


इसके आगे मैं तो कठपुतली बनूँगा।


यह दिल ज़ालिम है,


पल में रूठ जाता है।


यह तो नहीं रोता,


यह मुझे ही रुलाता।


शीशा है इस दिल से आधा,


फूट जाता है, 


टूट जाता है। 


ख़ामख़ाह ही अब यह दिल,


क़सम खाता है,


और घबराता है।


मेल खाता है,


हाँ, मेल खाता है।


शर्म, शंका, डर भी


इसके पास नहीं है।


'लोग क्या कहेंगे' सोच,


कुछ भी नहीं है।


गगन-धरा के क्षितिज पे, शादी हुई है,


ऐसा मेरे दिल को तूने थाम लिया है।


तू दिल का टुकड़ा,


तू नगमे का मुखड़ा।


शीशा है इस दिल से आधा,


फूट जाता है, 


टूट जाता है।


माने न जो दिल की माँगे,


यह थरथराता है, 


लाल होता है।


कुड़कुड़ाता है, 


बिखर जाता है।


तेरी कांति से भी यह दिल,


मेल खाता है, 


हाँ, मेल खाता है।


—दुल्कान्ति समरसिंह — ═𝐃𝐒.

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