•गीतातीत-[10]
उस समय समरसिंह जी के मकान के सामने जो पगडंडी थी, वह लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित एक ऊंचे भूभाग तक जाती थी। उस पगडंडी के दोनों ओर लगभग हर पांच एकड़ पर एक घर बना हुआ था।
समरसिंह जी के घर के आसपास के क्षेत्र को उनकी माता मटिल्डा ने उपयोगी पेड़-पौधे लगाकर हरा-भरा और समृद्ध बना दिया था, जबकि अन्य घरों के आसपास का इलाका घना जंगल था।
गुरु जी के घर के सामने वाली पगडंडी के नीचे, घर के ठीक सामने स्थित मालाबार इमली के पेड़ के पास से एक और पगडंडी जाती थी। यह पगडंडी मटिल्डा द्वारा खुदवाए गए ठंडे पानी के दो कुओं के पास जाकर समाप्त होती थी।
उस पगडंडी की शुरुआत वाले मालाबार इमली के पेड़ के पास से थोड़ी दूर जाने पर, पत्थरों से बनी वे सीढ़ियाँ थीं जो गीता के विशाल फूफ़ा पियसेन द्वारा बनाए गए उस छोटे से घर यानी नीचे वाले घर तक जाती थीं, जो मुख्य घर यानी समरसिंह जी के घर के सामने वाले ढलान पर स्थित था। इसीलिए, उस छोटे घर के ऊपर से गुजरने वाली पगडंडी से चलने वाले किसी भी व्यक्ति को वह पूरा हिस्सा एक अलग ही किसी चमत्कारजनक गाँव की तरह दिखाई देता था।
इतना ही नहीं, उस छोटे से घर से मटिल्डा द्वारा खुदवाए गए ठंडे पानी के दोनों कुओं तक जाने के लिए भी एक छोटी सी पगडंडी थी। उस जगह से ऊपर की ओर निगाहें उठाने पर, जॉन जी द्वारा लगाए गए रबर के पेड़ों के अलावा चारों तरफ सिर्फ घना जंगल ही दिखाई देता था।
पियसेन के घर से नीचे की ओर देखने पर, सीडन फ़ॉंसेका जी और पियसेन के दोनों के खेत एक साथ मिलकर धान के एक बहुत बड़े मैदान की तरह दिखाई देते थे। उसके पार स्थित बड़े पहाड़ और उनके बीच से होकर गुजरती पगडंडी भी साफ़ नजर आ रही थी। कुछ मौसमों में, रात के समय जॉन जी द्वारा लगाए गए रबर के पेड़ों से फलों के फटने और बीजों के बिखरने की आवाज़ उस इलाके में एक अद्भुत
ही आकर्षण और सौंदर्य जगा देती थी।
पिछली रात गीता सहित सभी लोगों ने मिलकर फ़ॉंसेका मिस की शादी का जुलूस देखने का भरपूर आनंद लिया। इसके बाद, जब भाग्या लगातार कुसुमलता से उस बारे में सवाल पूछने लगी, तो उन्होंने कहा,
"अब बहुत रात हो चुकी है बच्ची, अब सो जाओ। कल सुबह मुझसे पूछना, मैं सब बता दूँगी।"
ऐसा कहकर वह बच्चों के साथ सोने चली गईं।
अगली सुबह लगभग साढ़े छह बजे कुसुमलता ने चाय बनाई, क्योंकि गुरु जी और गीता स्कूल जाने की तैयारी में थे।
उसी बीच मटिल्डा ने कुसुमलता को बुलाया और कहा,
"बड़ी मालकिन, मैं तुम्हारे बड़े मामाजी के लिए चाय लेकर जा रही हूँ। …जाते समय वे कह रहे थे कि उन्हें यहाँ कुछ काम है, इसलिए सुबह-सुबह आएँगे... पर अब तक सो रहे हैं। खैर, मैं फटाफट वापस आती हूँ।"
ऐसा कहकर मटिल्डा चाय की ट्रे लिए नीचे घर की तरफ चली गईं। कुछ समय बाद गुरु जी स्कूल जाने के लिए कपड़े पहन रहे थे और कुसुमलता रसोईघर में ही थीं।
स्कूल जाने की तैयारी कर रही गीता को अचानक सुनाई दिया कि उसके पापा ने कमरे से माँ को आवाज़ दी है। माँ रसोई से निकलकर उनके पास गईं, तो उन्होंने बड़े कौतूहल से माँ से पूछा:
"सुनती हो… तुम्हें भी कुछ अजीब चीखने की आवाज़ सुनाई दे रही है क्या?"
"जी हाँ, मैं भी आपसे यही पूछने वाली थी। किसी औरत के चिल्लाने की आवाज़ है। कौन है वह? आवाज़ कहीं आसपास से ही तो नहीं आ रही है?"
माँ ने जवाब दिया।
उन दोनों की बातचीत में कुछ अजीब महसूस होने पर गीता तुरंत उनके पास गई। तभी पिताजी ने कहा,
"चलो देखते हैं कि कौन चिल्ला रही है।"
ऐसा कहते हुए वे घर के बाहर आए और माँ भी उनके पीछे-पीछे आ गईं। गीता चुपचाप यह सब देख रही थी।
ठीक उसी वक्त एक आदमी बदहवास सा उनकी तरफ दौड़ता हुआ आया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था। उसने हाँफते हुए कहा,
"बड़े गुरु जी, बड़े गुरु जी! हे भगवान...! सत्यानाश हो गया! हाय राम…! सब खत्म... सब खत्म हो गया!!"
"क्यों? आखिर हुआ क्या है?"
समरसिंह जी ने पूछा।
गांव के अधिकांश लोग समरसिंह जी को 'बड़े गुरु जी' कहकर पुकारते थे, क्योंकि वे विद्यालय में उप-प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे।
"अरे गुरु जी... मैं र... र... रास्ते से जा रहा था। तभी मुझे किसी औरत के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। मैं रुक गया और देखने लगा कि आवाज़ कहाँ से आ रही है। तभी मैंने देखा कि आपकी माँ मदद के लिए चिल्ला रही थीं…।"
"क्या..? हमारी अम्मा..? वे कहाँ हैं?"
"वह.. वह... नीचे वाले घर के सामने..."
"घुमा-फिराकर बात करना बंद करो और सीधे बताओ कि आखिर हुआ क्या है?"
गुरु जी ने उसे झकझोरते हुए कहा।
"अ... अ... अरे बड़े गुरु जी!.. न... न... नहीं, नहीं! मुझसे तो कभी नहीं बताया जाएगा। आप खुद ही जाकर देख लीजिए... जल्दी कीजिए, जल्दी!"
उस दौर में आज की तरह आए दिन हादसों के बारे में सुनने-देखने को नहीं मिलता था, इसलिए लोगों में ऐसी खौफनाक ख़बरों को सीधे मुँह पर सुनाने का चलन नहीं था। यही वजह थी कि वह आदमी बस इतना कहकर वहाँ से तुरंत भाग खड़ा हुआ।
गीता के पापा समरसिंह जी कभी दौड़ते नहीं थे, इसलिए वे तेज़ कदमों से नीचे वाले घर की तरफ बढ़ चले। उस समय गीता की बहनें, गोरी और भाग्या, और उसका छोटा भाई जनक सो रहे थे। बच्चों को अकेला न छोड़ने की मजबूरी के कारण उसकी माँ कुसुमलता भारी मन और गहरी बेचैनी के साथ घर पर ही रुक गईं।
"मैं... जल्दी... वापस आऊँगी। तब तक ज़रा... हमारे... छोटे बेटे पर नज़र रखना, वह सो रहा है,"
कहती हुई कुसुमा भी तेज़ी से नीचे वाले घर की ओर चली गई। अब कुसुमलता बार-बार दहलीज़ तक जातीं और फिर छटपटाकर कमरे के अंदर आ जाती थीं। गहरी बेचैनी में वे अकेले ही फुसफुसा रही थीं,
"काश!... मैं कैसे जाऊँ? मेरे वहाँ जाने का तो कोई रास्ता ही नहीं है। ऊपर से कुसुमा भी चली गई। मामाजी तो किसी और के थोड़ी हैं, सिर्फ मेरे हैं...लेकिन सब लोग वहाँ जा रहे हैं।… कल रात जब मैं फोंसेका मिस की शादी का जुलूस देख रही थी, तो मैं कुछ ज़्यादा ही हँस पड़ी। तब मामी ने मुझसे कहा ना…कि बड़ी मालकिन, तुम बहुत ज़्यादा हँस रही हो, इतना मत हँसो, कोई मुसीबत आ सकती है।…हे भगवान, इसके आगे तो मैं कभी इस तरह हँसूंगी भी नहीं, हँसने के बारे में तक सोचूंगी भी नहीं। …बस मुझे इतना जानना है कि मेरे मामाजी को आखिर हुआ क्या है..."
इसी तरह कुछ पल बीत गए। कुसुमलता दहलीज़ पर खड़ी रास्ता देख रही थीं, तभी उन्होंने देखा कि कुसुमा वापस आ रही है।
"मामाजी को क्या हुआ है?"
उन्होंने बड़ी बेचैनी से कुसुमा से पूछा।
"उन्हें... किसी... ने मा...र डा...ला... है।"
बहुत मुश्किल से शब्द जोड़ते हुए कुसुमा ने जवाब दिया। वह खौफनाक ख़बर सुनकर कुसुमलता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"क्या......? मार डाला? ओह नहीं, नहीं… हे भगवान! यह क्या हो गया?"
ऐसा कहती हुई कुसुमलता की आँखों से आँसू बहने लगे। वे विक्षिप्त सी होकर उन्हें पोंछने लगीं। कुछ देर बाद उन्होंने बेहद कमजोर आवाज़ में पूछा,
"किसने मार डाला?"
"पता... नहीं।"
कुसुमा ने सिर हिलाकर कहा। तब कुसुमलता ने भर्राई आवाज़ में कहा,
"अब मैं भी गीता को लेकर नीचे जा रही हूँ। तुम मेरी बच्चियों और बेटे का ज़रा ध्यान रखना।"
ऐसा कहकर वह बदहवास सी नीचे घर की ओर चल पड़ीं, और गीता भी अपनी माँ के पीछे-पीछे चलने लगी।
जब वे वहाँ पहुँचे, तो नीचे वाले घर पर लोगों का भारी हुजूम इकट्ठा हो चुका था और पुलिस भी आ चुकी थी। गीता भीड़ को चीरते हुए बड़ी मुश्किल से उस घर की दहलीज़ तक पहुँच पाई। वहीं से उसने लोगों के बीच से घर के अंदर झाँका।
भले ही उस दिन तक गीता की उम्र छह साल, नौ महीने और सात दिन की थी, पर वह अपनी हमउम्र लड़कियों जैसी नहीं थी। पता नहीं ऐसा क्यों था, वह एक अलग ही बच्ची थी। यहाँ तक कि रमणी से मार खाते वक्त भी गीता चुपचाप खड़ी रहती थी। लेकिन छूटो दादा की मृत्यु से लेकर अपने दादाजी की हत्या तक, वह मन ही मन मृत्यु के बारे में ही बार-बार सोच रही थी। जब उसने कुसुमा चाची से सुना कि दादाजी को किसी ने मार डाला है, तब से वह जानना चाहती थी कि दादाजी के साथ आखिर क्या हुआ है। जब कुसुमलता गीता को साथ लेकर नीचे घर की ओर जा रही थी, तब उसने अपनी माँ से चोरी-छुपे पूछा,
"मार डाला का अर्थ क्या है माँ?"
तभी कुसुमलता ने हड़बड़ी में जवाब दिया,
"तुम्हारे छूटो दादाजी के साथ जो हुआ था, दादाजी के साथ भी वही हुआ है। चल, चल, जल्दी चल।"
तब से वह यही सोच रही थी कि अगर उसके दादाजी मर चुके हैं, तो अब वे उसे किस तरह दिखते होंगे।
और, इसी बात को अपनी आँखों से देखने के लिए ही तो छोटी सी गीता ने अपनी क्षमता से बढ़कर संघर्ष किया और उस घर के अंदर झाँका था। वरना वह ऐसी जगहों पर जबरदस्ती घुसकर ताक-झांक करने वाली लड़कियों में से नहीं थी।
वहीं से उसने लोगों के बीच से उस घर के अंदर झाँका। गीता को अंदर जो दृश्य दिखा, वह रूह कंपा देने वाला था—अपने सबसे प्यारे दादाजी बिस्तर पर बेसुध पड़े थे और उनकी सफ़ेद चादर ख़ून से सराबोर थी। वह दृश्य देखते ही, सबसे पहले उसके नन्हें से मन में गुड़हल के एक फूल की छवि उभर आयी। उसी के साथ, छूटो दादाजी की मृत्यु के बाद से सोते-जागते मौत के विचारों में खोया रहने वाला गीता का मन अचानक पूरी तरह जाग उठा। और उसे महसूस हुआ कि उसकी सोच बिल्कुल सही थी; मरना यानी मृत्यु का मतलब पूरी तरह टूट-फूट जाना है। जैसे एक लाल गुड़हल के फूल को हाथों से मरोड़कर और मसलकर कुचल देने पर जो होता है, जब वही बात किसी मनुष्य के साथ होती है, तो उसे मृत्यु कहते हैं।
तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर ने कड़क कर आदेश दिया,
"भीड़ हटाइए यहाँ से! हमें हमारा काम करने दीजिए।"
गीता ने देखा कि आदेश मिलते ही एक सिपाही ने ज़ोर से सीटी बजाई और चिल्लाया,
"सभी यहाँ से पीछे हटिए! हमें जाँच करने दीजिए।"
पुलिस का हुक्म मानकर भीड़ पीछे तो हट गई, लेकिन लोग आसपास ही खड़े होकर फुसफुसाने और कानाफूसी करने लगे।
इसी बीच, अपने प्यारे पिताजी के साथ हुए इस हादसे का सदमा बर्दाश्त न कर पाने के कारण समरसिंह जी बेहोश हो गए। कुछ लोग उन्हें उठाकर ऊपर वाले घर की तरफ़ लेकर दौड़ पड़े। तभी अंदर से फिर से पुलिस की कड़क आवाज़ गूंजी। कुसुमलता ने घबराकर गीता के कान में फुसफुसाते हुए कहा,
"आओ गीता! अब हमें यहाँ से चलना चाहिए, वरना पुलिस हमें डांटकर भगा देगी।"
ऐसा कहते हुए उन्होंने गीता का हाथ कसकर पकड़ा और उसे खींचती हुई अपने घर की ओर ले जाने लगीं। जैसे ही वे दोनों अपने घर पहुँचे, मटिल्डा के रोने-चिल्लाने की जो आवाज़ पहले नीचे वाले घर से आ रही थी, अब वह उनके अपने ही घर के भीतर से गूँज रही थी।
जैसे ही गीता अपनी माँ कुसुमलता के साथ घर की चौखट पार कर भीतर दाख़िल हुई, उसने देखा कि उसकी दादी को शोक संतप्त लोगों की भीड़ ने घेर रखा था। दादी आँखों से अविरल आँसू बहाते हुए, सिसकियों के बीच उनसे कुछ कहे जा रही थीं। गीता के साथ वहाँ पहुँची उसकी माँ कुसुमलता, जो हाँफते हुए बड़ी मुश्किल से वहाँ तक आई थी, गहरे विलाप में डूबी हुई दादी मटिल्डा के समीप गईं और रूंधे हुए गले से इस प्रकार पूछने लगीं:
"मामी! जब आप नीचे वाले घर जा रही थीं, तब क्या वहाँ का दरवाज़ा खुला था?"
तभी, सुबह जो कुछ भी घटित हुआ था, गीता की दादी मटिल्डा ने बिलखते हुए उस वृत्तांत को सुनाना शुरू किया। हालाँकि वे उस समय तक लगभग दस बार इस दर्दनाक कहानी को दोहरा चुकी थीं, फिर भी उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के, अत्यंत सहजता से कुसुमलता को सब कुछ विस्तार से बताना शुरू कर दिया।
"हाय रे… बड़ी मालकिन…मैं चाय लेकर नीचे वाले घर के सामने गई और तुम्हारे मामाजी को आवाज़ लगाई। पर वहाँ बिल्कुल सन्नाटा था। मैंने कई बार आवाज़ दी, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। मुझे कुछ गड़बड़ लगी... मेरा दिल बैठ रहा था। मैंने चाय की थाली बाहर रखे स्टूल पर टिकाई और दबे पाँव पीछे की तरफ़ बढ़ी। वहाँ का दरवाज़ा खोलने के लिए जैसे ही मैंने हाथ लगाया, वह अंदर से बंद नहीं था—सिर्फ़ भिड़ा हुआ था। मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा और मैं सहमी हुई अंदर चली गई... अंदर जाकर मैंने देखा कि वे सिर से पांव तक चादर ओढ़े बिस्तर पर पड़े थे। मैंने फिर से उन्हें जगाने की कोशिश की, पर जब कोई फायदा नहीं हुआ, तो मैंने उनका हाथ छूकर देखा। उनका हाथ बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था... मेरे हाथ-पांव कांपने लगे। मैंने उनके सिर से चादर हटाने का प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस न हुई। मुझे लगा कि शायद चादर कहीं उलझ गई थी।… उनके सिर के अंदर धँसी हुई उस चादर को बाहर खींचना... ऐसा लगा मानो मैं किसी बड़े पत्थर को बाहर खींच रही हूँ! फिर मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर चादर खींची... हाय रा…म! क्या कहूँ! मेरा पूरा चेहरा और कपड़े ख़ून से भीग गए। यह देखो ना... , क्योंकि वह चादर उनके सिर के गहरे ज़ख्म के अंदर तक धँस चुकी थी और अंदर से रिसते हुए खून के साथ मिलकर जमकर बिल्कुल पत्थर जैसी हो चुकी थी।……"
इतना कहकर वे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं।
मटिल्डा द्वारा सुनाई गई इस खौफनाक आपबीती को सुनकर उनके आसपास जमा घर के लोग और पड़ोसी सन्न रह गए। उनमें से कुछ ने अपने सिर पर हाथ रख लिए, तो कुछ ने गालों पर हाथ टिका लिए और 'हे भगवान!', 'हाय राम!!' कहते हुए अपने मुँह से विस्मय, डर और शोक के भाव प्रकट करने लगे। फिर कुसुमलता ने बड़ी बेचैनी से उनसे पूछा,
"हाय राम…!! तो फिर उसके बाद क्या हुआ मामीजी?"
"उसके बाद… यह देखकर जैसे मेरे शरीर की जान ही निकल रही थी। मैं घर के अंदर खड़ी होकर ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी, लेकिन बहुत देर तक किसी को मेरी आवाज़ सुनाई नहीं दी... फिर भी मैं ऐसे ही चिल्लाती हुई घर से बाहर निकली। तभी मैंने देखा कि ऊपर वाली पगडंडी पर राजमिस्त्री नेदिरिस चल रहे थे। मैंने चीखते हुए उन्हें आवाज़ दी और मदद के लिए गुहार लगाई। लेकिन मेरी तरफ आने के बजाय, वे बदहवास होकर इस घर की तरफ दौड़ पड़े।… हे ऊपरवाले! तूने उस बेचारे के साथ ऐसा क्यों किया?..."
ऐसा कहते हुए मटिल्डा ने फिर से फूट-फूटकर रोना शुरू कर दिया।
[अगले भाग से संबंधित]
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