•गीतातीत-[11]
जॉन जी की हत्या की दुखद खबर सुनते ही गांव के सभी लोग समरसिंह जी के घर की ओर उमड़ पड़े। लेकिन उस दिन मिल्टन कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे थे। गीता और स्वर्णा को साफ़ सुनाई दे रहा था कि लोग दबी जुबान में उस अनहोनी के पीछे छिपे रहस्यों को लेकर कानाफूसी कर रहे थे। हालांकि, चार साल की स्वर्णा के कानों में अपने ही पिता के बारे में हो रही थी बातें पड़ तो रही थीं, लेकिन वह इतनी नासमझ थी कि उन बातों के पीछे छिपे गहरे रहस्य को कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। गीता भी उन लोगों की आवाज़ के दायरे में ही मौजूद थी, लेकिन उनकी कानाफूसी सुनने के बजाय वह कुछ और ही सोचते हुए अपनी ही एक अलग दुनिया में खोई हुई थी।
उसी वक्त, पिछली रात बेकरी में बिता कर लौटे गुणवती,पियसेन और रमणी भी वहां आ पहुंचे।
लगभग दस बजे, पुलिस अपने साथ दो खोजी कुत्ते लेकर पहुंची। उन खूंखार और विशाल कुत्तों को देखकर गीता और स्वर्णा के प्राण सूख रहे थे। जिस पुलिस वाले ने कुत्तों की डोर थाम रखी थी, उसने अचानक एक कुत्ते को खुला छोड़ दिया। बंधन से छूटते ही वह बड़ा कुत्ता तेज़ी से भाग कर समरसिंह जी के घर के भीतर दौड़ गया। वह देख वहां मौजूद पुलिस निरीक्षक ने कहा,
"हूँ!… मुझे पूरा संदेह है कि हत्यारा इस घर का ही कोई सदस्य है।"
ये शब्द सुनते ही गुणवती, मटिल्डा और गुरु जी सन्न रह गए और स्तब्ध होकर एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। कुसुमलता भी भय से कांपती हुई उनके बिल्कुल समीप खड़ी थीं। उसके बाद पुलिस ने सभी के बयान दर्ज किए। उस रात सुरक्षा की दृष्टि से दो पुलिसकर्मी उसी घर पर तैनात रहे। भयभीत मटिल्डा, गुणवती और कुसुमलता आपस में दबी आवाज़ में कुछ फुसफुसा रही थीं। गीता, रमणी और स्वर्णा भी डर के मारे उन्हीं के पास दुबक कर बैठी थीं। गीता की छोटी बहन भाग्या, गोरी बहन निरूपा और बाकी सभी बच्चों के साथ कुसुमा का छोटा बच्चा भी उसी कमरे में सिमटा हुआ था; क्योंकि उस दिन गुरु जी, मटिल्डा और गुणवती ने बच्चों को अकेले कहीं भी जाने की अनुमति नहीं दी थी।
पूरा माहौल गहरी ख़ामोशी में डूबा हुआ था। उस भयावह सन्नाटे को चीरती हुई मटिल्डा ने गुणवती के कानों में फुसफुसाकर कहा,
"वैसे छोटी बेटी… कहने से अब क्या होगा, पर सच ही कहूँ तो मुझे हमारे छोटे लड़के पर थोड़ा संदेह हो रहा है।"
"मैं भी आपसे वही कहने वाली थी अम्मा!... मुझे भी छोटे लड़के पर शक है। आखिर इस विपदा के वक्त वह कहां गायब है?"
"मैंने कुसुमा से भी पूछा कि वह कहाँ है, पर उसे भी इस बात की भनक तक नहीं है।"
आपसे एक बात बताऊँ अम्मा,... मैंने खुद देखा और सुना भी था...कि दो दिन पहले वह छोटा लड़का पिताजी से बहुत बुरी तरह बहस कर रहा था।... उस तीखी बहस के अंत में उसने गुस्से में तमतमाते हुए कहा था—
—' ख़ुदा की क़सम, मैं तुझे जान से मार डालूँगा।'—
उस वक्त मैंने सिर्फ यही सोचा था कि वह छोटा लड़का हमारे पिताजी से कितनी घिनौनी भाषा में बात कर रहा था! भैयाजी और मैं तो पिताजी के प्रति अगाध सम्मान के कारण कभी उनकी आँखों में आँखें डालकर सीधे देखते तक नहीं थे।"
इस तरह रात के करीब बारह बजे वे लोग आपस में बातचीत कर रहे थे। उसी बीच, गीता की चार साल की छोटी बहन भाग्या नींद से जागकर घर के मुख्य दरवाजे की तरफ चली गई और वह
"पापा, पापा, पापा..."
बुदबुदाती हुई आगे बढ़ी। और, उस वक्त हल्के अंधेरे में, घर के मुख्य दरवाज़े और बैठकखाने को अलग करने वाले मेहराब के पास खड़े पुलिस सिपाही के एक पैर को उसने अपने नन्हें-नन्हें दोनों हाथों से कसकर गले से लगा लिया। ठीक उसी पल, इस सबसे पूरी तरह बेख़बर समरसिंह जी वहां आ पहुंचे। उन्होंने अपनी नन्ही सी बेटी भाग्या को देखा और तुरंत पुकारा,
"अरे भाई! यह क्या कर रही हो तुम? मैं तो यहाँ हूँ बिटिया...! इधर आओ।"
•••
जॉन जी की हत्या के बाद से, मटिल्डा, गुणवती और कुसुमलता साए की तरह हमेशा एक दूसरे के साथ रहा करती थीं। वे हर समय भय के साए में दबी ज़ुबान से फुसफुसाकर बातें किया करती थीं। कुसुमा अपने कमरे से बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रही थीं, वहीं पियसेन तो बच्चों से भी ज्यादा डरपोक निकले। वे अकेले घर से बाहर पैर रखने तक कतराते थे। इसलिए वे हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि गुणवती जहाँ भी हो, वे ठीक उनके पीछे थोड़ी ही दूरी पर साए की तरह मौजूद रहें। गुरु जी डरे हुए तो नहीं थे, पर अत्यंत उदास थे। वे हर पल बस लंबी-लंबी, गहरी साँसें भरते रहते थे।
इसी तरह बीते तीन दिनों के दौरान, हमेशा की तरह गाँव वाले समरसिंह जी के यहांँ आते-जाते और रात बिताते थे। उनमें से कई लोग समरसिंह जी के परिवार के लिए खाना-पीना भी लाते थे और अपना भोजन भी वहीं करते थे।
आज के समय की तरह उस दौर में खाने-पीने की इतनी अलग-अलग चीजें नहीं हुआ करती थीं। हालत यह थी कि कभी-कभार मिलने वाले 'मारी' बिस्कुट के सिवा, उस वक्त के गांव वालों ने किसी दूसरे तरह का बिस्कुट देखा तक नहीं था। इसलिए, ख़ासकर वे लोग नारियल, सूखी लाल मिर्च, नमक, सूखी मालदीवियन मछली,लाल प्याज, लहसुन, काली मिर्च, और नींबू जैसी सामग्रियों को सिलबट्टे पर पीसकर या ओखली में कूटकर तैयार किए गए श्रीलंकाई नारियल के सम्बल और दाल करी के साथ उबला हुआ कटहल, ब्रेडफ्रुट या भात यानी उबले हुए चावल लाते थे, और नाश्ते के लिए हमेशा ब्रेड ही लाते थे।
भले ही हालात ऐसे थे, बच्चों को वह खाना खाने में बड़ा मज़ा आता था; क्योंकि वे खाद्य पदार्थ किसी एक घर से नहीं, बल्कि दस-पंद्रह अलग-अलग घरों से आते थे।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि गीता का कुछ भी खाने का मन नहीं करता था। उसके हाथ में जो कुछ भी आता, वह उसे खा लेती थी; उसका स्वभाव ही ऐसा था। इतना ही नहीं, जीवन-मरण जैसे गंभीर विषयों और संसार के प्रतिष्ठित व आकर्षक चरित्रों की सुंदर खूबियों को मन ही मन आत्मसात करने की आदत के अलावा, गीता को अपने आसपास होने वाली किसी भी चीज़ की कोई खबर नहीं रहती थी। यही कारण था कि उसके पापा उसे जो भी कपड़े सिलकर देते, वह उसी वक्त उन्हें पहन लेती थी; और उसके बाद उसे यह भान तक नहीं रहता था कि उसने शरीर पर कोई वस्त्र धारण भी किया है या नहीं।
समरसिंह जी को जब अपना मासिक वेतन मिलता,तब वे ख़ासकर गीता के लिए सुंदर-सुंदर हेयरबैंड, रंगों के डिब्बे और कहानियों की किताबें जैसी चीजें लाना कभी नहीं भूलते थे—भले ही वे चीजें आज के समय की तरह मनमुताबिक इस्तेमाल करने जितनी प्रचुर मात्रा में न होती हों।
स्थिति ऐसी होने पर भी, उस क्षण गीता ने वही गाउन पहन रखी थी जो उसने तीन दिन पहले—यानी अपने दादाजी की हत्या वाले दिन की रात को पहना था। ऐसा इसलिए था क्योंकि उस दौर में, आज के समय के विपरित, प्राचीन ग्रामीण रीति-रिवाजों के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु होते ही उसके घर में रखी सभी तस्वीरों और दिनदर्शिकाओं आदि को उल्टा कर दिया जाता था, यानी उनका सामने का कांच या तस्वीर वाला हिस्सा दीवार की तरफ मोड़ दिया जाता था। साथ ही घर के चूल्हे की आग बुझा दी जाती थी और घर के भीतर भोजन या पानी ग्रहण नहीं किया जाता था।
इतना ही नहीं, मृत्यु होते ही परिवार के सदस्य अपने पहने हुए सारे आभूषण उतार देते थे, और दिवंगत व्यक्ति के परिवार के लोग अंतिम संस्कार होने तक अपने पहने कपड़े बदले बिना, रोते-बिलखते समय बिताते थे। यही उस समय के ग्रामीणों की प्रथा थी।
लेकिन गुणवती हर सुबह और शाम अपनी बेटी रमणी के कपड़े बदल देती थीं। दुसरी ओर कुसुमलता भी रोज़ सुबह नियम तोड़कर अपना हाथ-पांव और मुँह धो लिया करती थीं। भले ही मटिल्डा को इस बात का भान न हो, लेकिन उनके इन पारंपरिक रीति-रिवाजों को तोड़ने वाली दूसरी पीढ़ी की पहली महिला उनकी अपनी ही बेटी गुणवती थीं।
तीसरे दिन समरसिंह जी अपनी बेटी गीता से कहा,
"बिटिया रानी,... तुम जाकर कोई और गाउन पहन लो।"
उन दिनों रात का माहौल आम दिनों से बिल्कुल जुदा होता था। घर में मेंटल वाला गैस लैंप यानी पेट्रोमेक्स जलाया जाता था,जिसकी तेज़ रोशनी से न सिर्फ घर का कोना-कोना, बल्कि पूरा आँगन भी जगमगा उठता था। बच्चों को तो पेट्रोमेक्स देखकर बड़ा मज़ा आता था, लेकिन उस रोशनी की सीमा से परे भूतिया दुनिया जैसा दिखने वाले घने जंगल की तरफ देखने में भी उन्हें डर लगता था। इसका कारण यह था कि इन कुछ दिनों के दौरान न केवल घर में, बल्कि पूरे इलाके में जॉन जी की हत्या के कारण एक अजीब सा सन्नाटा और मनहूसियत पसरी हुई थी।
समरसिंह जी का घर दिन-रात आए हुए लोगों से भरा रहता था। उनके बीच जो महिलाएं थीं, वे मटिल्डा के इर्द-गिर्द इकट्ठा होकर उससे फुसफुसाकर बातें कर रही थीं। वहीं दूसरी तरफ,आए हुए पुरुष भी जगह-जगह छोटे-छोटे गुट बनाकर दबी आवाज़ में आपस में चर्चा करते दिखाई दे रहे थे।
उस घर और उसके आसपास पसरे इस खौफनाक सन्नाटे की वजह सिर्फ वह हत्या ही नहीं थी। दरअसल, उस दौर वहां न बिजली थी,न पानी, न दूरभाष और न ही आने-जाने के साधन। ऊपर से वहाँ की आबादी भी इतनी कम थी कि पूरा इलाका यूँ ही वीरान और डरावना नज़र आता था।
इसी बीच रहस्य को और गहरा करते हुए, पाँचवें दिन मिल्टन अचानक घर लौट आए। उस दिन तक जॉन जी का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया था, क्योंकि पुलिस जाँच के चलते इसकी अनुमति नहीं मिली थी।
मिल्टन जैसे ही जॉन जी के पार्थिव शरीर के पास पहुंचे, वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर रोने लगे,
"हाय रा...म!…, हाय भगवा...न!, अब इसके बाद मेरे जीने का क्या फ़ायदा....! हे भगवान... मैं अपने पिता के बिना कैसे जीऊँगा…हा…य!, अरे मेरे प्यारे पिता....!! मैं और मेरे पिता एक दूसरे से कितना प्यार करते थे,... हाय रा...म!! मैं अपने सोने जैसे पिता को फिर कब देख पाऊँगा....,हे ऊपरवाले,... तूने यह क्या कर दिया.....!!!"
उन्हें इस तरह विलाप करते देख, वहाँ मौजूद लोग आपस में कानाफूसी करने लगे;
"यह असल में दुखी नहीं है, बस सबके सामने घड़ियाली आँसू बहा रहा है।"
"हाँ, मैंने खुद देखा कि आते वक्त रास्ते में यह बहुत ख़ुश था।"
"मुझे तो इस आदमी पर ज़रा भी भरोसा नहीं है।"
"हाँ, मुझे भी। भले ही यह हमारे बड़े गुरु जी का भाई है, पर उनके जैसा बिल्कुल नहीं है।"
"अरे भाई! क्या तुम्हें नहीं पता कि यह हमारे बड़े गुरु जी का सगा भाई नहीं है?"
"ओह! सच में?... यह तो बहुत चरित्रहीन इंसान है।... पराई औरतों के साथ संबंध है इसके।... हमारे बड़े गुरु जी कितने भले इंसान हैं, है ना?"
"हाँ,... अगर इस हत्या में इसका थोड़ा भी हाथ हुआ, तो इसे सलाख़ों के पीछे जाना ही होगा।"
जॉन जी की मौत की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही थी। पुलिस ने उनके अंतिम संस्कार के लिए दाह-संस्कार की अनुमति देने से साफ़ इनकार कर दिया था। पुलिस की ओर से केवल दफ़नाने की इजाजत मिली थी, ताकि यदि भविष्य में जाँच के लिए ज़रूरत पड़े, तो शव को दोबारा कब्र से बाहर निकाला जा सके। इस एक फ़ैसले ने पूरे परिवार के भीतर एक अनकहे डर और संदेह को जन्म दे दिया था।
उस रात घर में जो मनहूसियत और खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ था, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन इन सबमें सबसे अजीब और चौंकाने वाली बात यह थी कि मिल्टन के चेहरे पर कोई सवाल नहीं था। उसने तब तक जानने की कोशिश नहीं की कि जॉन जी की मृत्यु कैसी हुई, किन परिस्थितियों में हुई, उन्हें मृत अवस्था में सबसे पहले किसने देखा था, और यह हादसा ठीक कितने बजे हुआ था।उसकी यह रहस्यमई ख़ामोशी किसी बड़े राज़ की तरफ इशारा कर रही थी।
उसी रात जब मिल्टन मटिल्डा के पास गया, तो वहाँ गुरु जी पहले से ही बैठे हुए थे। मिल्टन को सामने देखते ही गुरु जी का पारा चढ़ गया। उन्होंने तीखी नज़रों से उसे घूरते हुए सीधे पूछा,
"तू पिछले कई दिनों से कहाँ गया था?"
"………………"
मिल्टन के होंठों पर जैसे ताला लग गया। वह ख़ामोश ख़ड़ा रहा।
"क्यों तुझे सुनाई नहीं दिया कि मैंने क्या पूछा?"
"म्.. म्... मैं... मैं..."
मिल्टन की आवाज़ बुरी तरह अटक रही थी, उसके पास कोई जवाब नहीं था। मिल्टन को इस तरह हकलाते और बात छुपाते देख गुरु जी का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने चिल्लाते हुए कहा,
"तू मेरी नज़रों के सामने से दूर हो जा!... जा यहाँ से!!.. हुह!! नाजायज़ कहीं का!!"
गुरु जी के मुंह से यह दुत्कार सुनते ही मिल्टन बिना कुछ बोले, चुपचाप वहाँ से पैर घसीटते हुए चला गया।
[अगले भाग से संबंधित]

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