•गीतातीत-[12]
जैसे-तैसे जॉन जी के अंतिम संस्कार का वह भारी दिन भी आ ही गया। उस दिन उनके सभी भाई-बहन, उनके बच्चे और यहाँ तक कि पोते-पोतियां भी वहाँ जमा हुए थे; आखिर मृत्यु के समय इकहत्तर वर्ष की आयु पा चुके जॉन जी उस भरे-पूरे परिवार में सबसे बड़े जो थे। ऊपर से यह कोई सामान्य मौत नहीं थी। उस दौर में, आज के ज़माने की तरह हत्या और डकैती जैसी खौफनाक वारदातें सुनने को नहीं मिलती थीं। जॉन जी के विशाल परिवार के बाकी सदस्यों के आ जाने से वह घर खचाखच भर गया था। दरअसल, जॉन जी के चौदह भाई-बहन थे, जिनमें से चार पहले ही गुज़र चुके थे और बचे हुए सभी सदस्य उस दिन वहाँ मौजूद थे। …………"
अपनी माँ के फेसबुक प्रोफाइल पर यह सब पढ़ते हुए, गीता की इक्यावन साल की छोटी बेटी मन्दारा—जो विश्वविद्यालय में एक व्याख्याता थीं और अपने जीवन का अर्धशतक पूरा कर चुकीं एक बेहद आधुनिक और व्यावहारिक महिला बन चुकी थीं—गहरे विचारों में डूबकर सोचने लगीं,
"ओह गॉड!.. उन बच्चों की माँ तो कभी अपनी गर्भावस्था के दौर से बाहर ही नहीं आ पाई होंगी... पता नहीं उन्होंने अकेले इतने सारे बच्चों को कैसे संभाला और झेला होगा!"
इसी के साथ, उसने अपनी आँखें फिर से कहानी पर टिका दीं, जहाँ से उसे आगे पढ़ना था।
"…………अरे बाप रे...! यह तो अच्छी-खासी भीड़ है।... गीता, ये सब लोग कौन हैं?"
रमणी ने गीता और स्वर्णा से पूछा। लेकिन उस वक्त भी गीता अपनी ही किसी एक दुनिया में खोई हुई थी, और स्वर्णा हैरान होकर उस भीड़ की ओर देख रही थी।
जॉन जी के परिवार के सदस्यों के साथ-साथ उनके अपने गाँव के लोग यानी तुडुगल गाँव वाले भी भारी संख्या में वहाँ पहुँचे थे।
आए हुए मेहमानों, रिश्तेदारों और गाँव वालों के बीच, जॉन जी के सबसे छोटे भाई विलियम भी मौजूद थे, जो जिला सहायक सचिव के ऊंचे पद पर कार्यरत थे। लेकिन इस दुख की घड़ी में उनका सारा प्रशासनिक संभ्रांतपन पीछे छूट गया था। भीड़ के बीच खड़ी गीता, रमणी और स्वर्णा ने देखा कि विलियम जी का दिल अपने भाई को खोने के गम से पूरी तरह टूटा हुआ था। वे अपने हाथ में थामे बड़े से रूमाल से बार-बार अपने आँसू पोंछ रहे थे। विलियम जी, अपने बड़े भाई जॉन जी से अगाध प्रेम करते थे। एक छोटे भाई होने के नाते, उनका यह लगाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं था—उन्होंने सरकार द्वारा मिली अपनी वह कीमती ज़मीन भी गीता के दादाजी जॉन जी के नाम कर दी थी। यही कारण था कि इस अंतिम विदाई पर उनका दुःख सबसे गहरा और हृदयविदारक था।
वहाँ मौजूद जॉन जी के तमाम रिश्तेदारों को व्यक्तिगत रूप से पहचानने वाली इकलौती बच्ची उन तीनों में से केवल गीता ही थी। इसका एक खास कारण था। दरअसल, जॉन के परिवार के सदस्य गीता के माता-पिता का बहुत आदर करते थे; भाई का बेटा होने के नाते वे गुरु जी का सम्मान करते थे और अपनी बहन की बेटी होने की वजह से कुसुमलता का। उन दोनों की संतान होने के कारण वे गीता को भी बहुत मान-सम्मान देते थे। लेकिन स्वर्णा और रमणी के साथ उनका जो रिश्ता था, वह इस पारिवारिक जुड़ाव से बिल्कुल अलग था।
इस अलग रिश्ते का एक गहरा कारण था। असल में, मिल्टन जॉन और मटिल्डा दंपत्ति के अपने कोई बेटे नहीं थे; उन्होंने मिल्टन को गोद लिया था। ठीक इसी तरह, भले ही गुणवती जॉन जी की इकलौती बेटी थीं, लेकिन उनकी बेटी रमणी उनकी सगी बेटी नहीं थी—उसे भी गुणवती ने गोद लिया था। इसी गोद लिए जाने के कारण, जॉन जी के रिश्तेदारों की नज़रों में स्वर्णा और रमणी को उनके अपने बच्चों के रूप में वह मान्यता और अपनापन नहीं मिला था, जो परिवार के बाकी बच्चों को मिलता था।
जहाँ तक गीता के छोटे भाई-बहनों का सवाल था, वे अभी इतने बड़े नहीं हुए थे कि इन रिश्तेदारों को पहचान सकें, क्योंकि वे सभी पाँच वर्ष से कम उम्र के छोटे बच्चे थे। यही वजह थी कि उस पूरे माहौल में केवल छह साल की गीता ही इकलौती ऐसी बच्ची थी, जो खानदान के हर सदस्य को बेहद करीब से और व्यक्तिगत रूप से पहचानती थी ।
जॉन का अंतिम संस्कार समाप्त होते ही सभी रिश्तेदार वापस चले गए। मटिल्डा के रिश्तेदारों में से कोई भी उस अवसर पर उपस्थित नहीं हुआ था। मृत्यु के बाद का पारंपरिक भोजन खाने के लिए केवल घर के लोग और पड़ोसी ही बचे थे।
इस ख़तरनाक हत्या से सब गांव वाले सहमे हुए थे, इसलिए पड़ोसियों ने सात दिनों तक उस घर से नाता जोड़े रखा और रात-बिरात चक्कर लगाते रहे ताकि खौफ के इस माहौल में घरवाले खुद को अकेला न समझें। वे खुद भी इस कदर डरे हुए थे कि अकेले नहीं, बल्कि टोलियां बनाकर वहां आते-जाते थे। चूँकि गाँवों में लोग एक-दूसरे के सुख-दुखों में ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं, इसलिए वे सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा और सांत्वना देने के लिए वहाँ रुक रहे थे।
इस दौरान, मामले की तहकीकात के लिए एक पुलिस उप-निरीक्षक भी समय-समय पर समरसिंह जी के घर आते रहे। माहौल में फैले खौफ और सुरक्षा को देखते हुए, एक पुलिस सार्जेंट सात रातों तक लगातार उसी घर में तैनात रहा। मगर सबसे रहस्यमयी बात तो यह थी कि जैसे ही जॉन जी का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ, मिल्टन अचानक कहीं गायब हो गया था।
हत्याकांड को बीते एक हफ्ता हो चुका था। जिस दिन अंतिम संस्कार हुआ—यानी हत्या की छठी रात को—सिंहली बौद्ध परंपरा के मुताबिक जॉन जी की आत्मिक शांति के लिए धार्मिक पुण्य-कर्म शुरू किए गए। इसके बाद, सातवें दिन सुबह पूजनीय भिक्षुओं के लिए मंदिर में सुबह का भोजन दान ले जाया गया। पुलिस सार्जेंट सुरक्षा के लिहाज से तब भी जॉन जी के घर पर डटे हुए थे, क्योंकि वारदात के लंबे समय बाद—यानी छठे दिन ही जॉन जी का अंतिम संस्कार मुमकिन हो पाया था।
जॉन जी के निधन के बाद, आठवें दिन की सुबह उनकी बेटी गुणवती और दामाद पियसेन कहीं बाहर गए हुए थे। वापस लौटते ही गुणवती ने मटिल्डा से कहा,
"माँ, हमें एक बड़े ज्योतिषी के बारे में पता चला है। लोग कहते हैं कि वह एक चमत्कारी भविष्यवक्ता हैं और उनके मुंह से निकली हर बात सच साबित होती है। पर समस्या यह है कि उनसे मिलने के लिए हमें काफी दूर, दक्षिणी प्रांत तक जाना पड़ेगा। वे 'मातर' के रहने वाले हैं।"
वह बात सुनकर गुरु जी समरसिंह ने कहा,
"झूठ बोलकर पैसे कमाते हैं वे लोग!… उन लोगों पर भरोसा मत करो, छोटी बहन।…"
लेकिन मटिल्डा ने कहा,
"अरे छोटे बेटे, हम वहाँ जाकर तो देखें।… कौन जाने वे सच कह दें।"
गुरु जी ने आगे कुछ भी नहीं कहा; उन्होंने सोचा कि अगर वे बार-बार मना करेंगे, तो अपनी अम्मा का दिल टूट जाएगा।
अगले दिन भोर होते ही मटिल्डा, गुणवती, रमणी और पियसेन 'मातर' जाने की तैयारी में लग गए। इसी बीच गीता भी उनके पास आ गई। जब उसने देखा कि उसकी दादी कहीं दूर जाने की तैयारी में हैं, तो गीता के मासूम दिल में एक गहरा सूनापन और अजीब सी उदासी छा गई। उसने मन ही मन सोचा,
"काश! ...मैं भी दादी के साथ जा पाती..."
गीता के बाल-मन में ऐसा ख्याल आने की एक बड़ी वजह थी। उससे बेपनाह प्यार करने वाले उसके प्यारे दादाजी अब इस दुनिया में नहीं रहे थे। पापा हमेशा अपने काम में व्यस्त रहते थे, और माँ बिना किसी वजह के गीता के खिलाफ गुरु जी के कान भरती रहती थी।
फिर गीता ने देखा कि चलते वक्त दादी ने प्यार से कहा,
"छोटे बेटे, जितनी जल्दी हो सके, हम उतनी ही जल्दी वापस आने की कोशिश करेंगे। तुम अपना और सबका ध्यान रखना।"
उनके जाने के बाद घर में जो सन्नाटा पसरा, उसे कुसुमलता की आवाज़ ने घेर लिया। जैसा कि कहा जाता है—खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं और दुख बाँटने से कम होता है, इसीलिए वे सुबह से लेकर शाम तक जॉन जी की हत्या और उनके जीवित रहते समय की यादों के बारे में ही बातें करती रहीं। कुसुमा के भीतर भी एक अनजानी सी बेचैनी छिपी हुई थी; लेकिन उसकी यह व्याकुलता तो बस रोंगटे खड़े कर देने वाली किसी नई और सनसनीखेज़ खबर को सुनने के लिए जागी एक आतुरता थी, जो कौतूहल से भरी किसी बात को जानने के लिए बेचैन रहती है कोई औरत। उधर गुरु जी समरसिंह बार-बार अपने काम में जुट जाते थे, मानो वे कर्म में डूबकर अपने पिता के वियोग के गहरे दुख को भुलाने का निरंतर प्रयास कर रहे हों। किसी तरह कुसुमलता और गीता भी व्याकुल मन से शाम ढलने की राह देख रही थीं। कुसुमलता के भीतर कोई साधारण उत्सुकता तो नहीं थी, बल्कि अपने सगे मामा व ससुर जॉन जी की हुई इस निर्मम हत्या के पीछे छिपे खौफनाक सच को जानने की एक गहरी छटपटाहट थी।
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