•गीतातीत—[13]
आख़िरकार शाम ढल गई और मटिल्डा, गुणवती, रमणी तथा पियसेन वापस लौट आए।
उनके आते ही सबसे पहले कुसुमलता ने उत्सुकता से पूछा,
"मामीजी, उन बाबा जी ने क्या कहा?... क्या उन्होंने कोई इशारा या संकेत बताया?"
उनका यह सवाल सुनते ही मटिल्डा ने बेहद थके हुए स्वर में कहा,
"अरी बड़ी मालकिन...! इस पूरे वृत्तांत को बार-बार दोहराना आसान नहीं है।… बेहतर होगा कि हमारे छोटे बेटे को और कुसुमा को भी यहीं बुला लिया जाए।"
ऐसा कहती हुई मटिल्डा वहीं रखी एक कुर्सी पर बैठ गईं। कुसुमलता तुरंत अपने पति और कुसुमा को बुलाकर वहाँ ले गईं।
तब गुणवती, रमणी, स्वर्णा, गीता और पियसेन भी वहीं आकर खड़े हो चुके थे। तभी मटिल्डा के सब्र का बाँध टूट गया; वे अपने दिल में दबी हुई सारी बातें बिना रुके बयाँ करने लगीं, जिसे सुन वहाँ मौजूद हर एक आँख नम हो गई; चाहे वह कोई पुरुष हो, घर की कोई नन्हीं लड़की हो या कोई औरत।
"…उन बाबा ने हमें अंदर बुलाया। उसके बाद वे महा भद्रकाली अम्मान की मूर्ति को धूप-धुआँ से नहलाने लगे और उसकी प्रदक्षिणा की। फिर वे मूर्ति की ओर मुड़े, कुछ पान के पत्ते उठाए और उन्हें मूर्ति के सामने फेंक दिया। इसके बाद, वे अपने हाथ जोड़कर, काँपते हुए कड़े स्वर में बोले—"
—'ॐ क्रीं कपालिनी महाकाली, भस्म-अंगाय नमः।......
........बच्चा! तुम्हारे घर की मुख्य शहतीर को ही किसी ने काट दिया है... मैं सही कह रहा हूँ या नहीं?'—
तभी पियसेन ने डर के मारे आगे बढ़कर जवाब दिया,
—'ह,ह,हाँ ब, बाबा जी, आप बि,बिल्कुल सही कह रहे हैं!'—
इस पर बाबा ने पियसेन की ओर देखा और गंभीर होकर कहा, —'तो फिर अब मुझसे क्या जानना चाहते हो?'—
पियसेन ने हाथ जोड़कर, बाबा से भी तेज़ काँपते हुए कहा—
"ब-ब-बाबा जी! ह-हमें बस यही ज-जानना है कि... वह दुर्घटना कैसे हु-हुई थी?"
बाबा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी साँस खींचकर बोले,
— "ॐ जंतर-मंतर स्तंभय-स्तंभय, अकाल मृत्यु निवारय-निवारय। कालभैरवाय हुं फट् स्वाहा॥...…
………बच्चा! मुख्य प्राणी! मुख्य प्राणी!! सिर से पाँव तक चादर!... वह सोता। हाँ, ... शौच के लिए उठता... पिछला दरवाज़ा खोलता! ॐ.. अब बाहर जाता... पेशाब करता ... ॐ... कि एक आदमी!.. अनजान आदमी!!... छुपा हुआ! धीरे-धीरे... घर की ओर ...बढ़ता.. ॐ...मुख्य प्राणी... चादर ठीक करता... कोना ... आदमी के सिर.. छूता! खुला हुआ दरवाज़ा... आदमी...घुस जाता... ॐ... बड़ी डफ़ली! बड़ी डफ़ली!! डफ़ली के पीछे आदमी..!!
…........ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, महाकाल रुद्राय,
दश-दिशा बंधय-बंधय, प्रेत बाधा नाशय-नाशय,
रक्ष-रक्ष, जंतर-मंतर कीलक स्वाहा॥........
........ॐ... मुख्य प्राणी वापस आता...खुला दरवाज़ा!... अंदर आता,... सोने जाता।... चादर ! सिर से पाँव तक!!...ॐ... मुख्य प्राणी... गहरी नींद!! ... खर्राटों की आवाज़... गर् र्, गर् र्...फिर आदमी... अनजान आदमी!! ...बिस्तर के पास...!!! नज़र दौड़ाता ... कुदाल! एक कुदाल!! ...ॐ... उठा लेता कुदाल! ... पूरी ताकत ! मुख्य प्राणी के सिर पर धड़ाम...!!! . ॐ...आगे बढ़ता... कमरे का दरवाज़ा! घुस जाता ... ॐ ॐ ग्रीं...अलमारी... खोलता वह... कपड़े...उलट-पलट... ढूँढता ... कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं!... ॐ... खिड़की... कमरे की खिड़की! आदमी..खोल देता... रोशनी के कदम...दौड़ती रोशनी... आदमी...घबराहट...वापस.. पीछे दरवाज़ा ... बाहर भागता...अँधेरा...गायब!!! ...ॐ..कालभैरवाय हुं फट् स्वाहा॥... '—
तो कुछ इस अंदाज़ में बाबा जी ने उस रात का पूरा मंज़र बयां किया था... हमने बड़ी मुश्किल से उनकी टूटी-फूटी बातों का सिरा पकड़ा था।"
अंत में मैटिल्डा ने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा।
"हे भगवान! कौन हो सकता है वह शख्स?"
कुसुमलता के स्वर में गहरी हैरानी और डर साफ झलक रहा था।
"वह आदमी चाहे जो भी हो... पर मैं तो यह सोच रही हूँ कि... उसने हमारे ही घर के किसी भेदी की मदद से इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया है।"
गुणवती ने फुसफुसाते हुए कहा।
"हमारा छोटा बेटा,... मेरा मतलब तुम्हारे भैया जी, ऐसा नीचा काम कभी नहीं कर सकते! ... और क्या मैं खुद अपने पति को मार डालने में किसी की मदद करूँगी भला? हाँ?! ... फिर रही बड़ी मालकिन, तो क्या वह अपने ही सगे मामाजी को मारने की साज़िश रचेगी? ... और कुसुमा? ... वह भला कैसे मदद कर सकती है, जो ठीक से दो शब्द भी नहीं बोल पाती!… बाकी बचे पियसेन और हमारा छोटा लड़का। अगर मददगार पियसेन होता, तो क्या वह खुद हमारे साथ बाबा के पास जाता? ... ऊपर से यह पियसेन तो वैसे भी डरपोक है। अगर वह यह काम करने जाता, तो हमारी छोटी बेटी को उसकी ढाल बनकर आगे-आगे चलना पड़ता; इस बात में तो कोई दो राय नहीं है।... आखिरकार मैंने सबके बारे में सोच लिया। मुझे तो छोटे लड़के पर ही शक है! ... हाय मेरे भगवान! अगर उस बेचारे को पुलिस ने पकड़ लिया, तो मैं क्या करूँगी? ...पापा तो अब जा चुके हैं, वह तो अब इस दुनिया से रुख्सत हो चुके हैं। ऐसे में, भले ही छोटा बेटा गुनहगार हो, लेकिन अगर उसे जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया, तो हे भगवान, मैं भला कैसे ज़िंदा रहूँगी..."
कहते हुए मैटिल्डा फूट-फूट कर रोते हुए अपनी छाती पीटने लगी।
उनकी बातें सुनकर गुणवती को गहरा गुस्सा आ गया।
"हूँ!… आपकी बात तो बहुत अच्छी है ना माँ!… अगर छोटे लड़के ने हत्यारे की मदद की है, तो पुलिस के आने का इंतज़ार क्यों करें? बल्कि हमें खुद उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना चाहिए ना!"
गुणवती ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा।
"क्यों छोटे बेटे, उन बाबा की बातों के बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?"
मटिल्डा ने गुरु जी से पूछा।
"...सच कहूँ तो मुझे भी उस नालायक पर शक है, क्योंकि उस रात वह घर पर नहीं था।...लेकिन अम्मा, हड़बड़ी में कोई फैसला करना ठीक नहीं होगा,... क्योंकि बाबाओं की बातें पुलिस नहीं मानती।… लेकिन, उन बाबाजी की बात पर... मुझे थोड़ा यकीन इसलिए ही हो रहा है, क्योंकि उन्होंने कहा था कि वहाँ एक बड़ी डफ़ली थी। वह बात सही है ना माँ?… नीचे घर के अंदर एक बड़ी डफ़ली है ना... हूँ...! वैसे पुलिस हत्यारे को पकड़ ही लेगी, तब सबकुछ साफ हो जाएगा, और इस बात का भी पर्दाफ़ाश हो जाएगा कि घर के भीतर उसका मददगार कौन था।"
चहुँओर पसरे खौफ के बीच दिन ब दिन कट रहे थे। होरकेटिया गाँव में बिजली, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं का नामोनिशान तक नहीं था। समरसिंह जी का वह इकलौता मकान पाँच एकड़ के एक बेहद सुनसान इलाके में था, जिसके चारों तरफ बड़े-बड़े और घने पेड़ फैले हुए थे।
गुरु जी ने गीता के मन पर तो इस खौफ की परछाईं तक पड़ने नहीं दी थी। फिर भी, उस अशांत माहौल को देखते हुए उन्होंने बच्चों को अकेले घर से बाहर कदम तक नहीं रखने दिया। हर पल घुटते हुए इस तरह अनवरत जीना नामुमकिन होता जा रहा था, इसलिए मटिल्डा ने एक योजना बनाई। उन्होंने गुरु जी से कहा,
"छोटे बेटे, इस तरह हर पल खौफ से कांपते हुए जिया नहीं जा सकता।"
"तो फिर हम क्या करें अम्मा?"
गुरु जी ने पूछा।
"क्यों न हम शरत को यहाँ बुला लें?"
"अरे माँ, वह अब बाल-बच्चेदार है... वह भला यहाँ कैसे आ पाएगा? और वह भी हमेशा के लिए रहने?…"
"अरे कोई बात नहीं छोटे बेटे, हम उससे कहेंगे कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को भी अपने साथ ही ले आए।"
"हाँ माँ, आप जैसा ठीक समझें वैसा ही कीजिए। पर शरत तो हमारे पापाजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद अभी कुछ ही दिन पहले वहाँ पहुँचा होगा, है ना?"
मटिल्डा ने उसी पल अपने दामाद पियसेन को आवाज़ दी,
"पियसेन, तुम अभी के अभी जाओ और शरत को एक टेलीग्राम भेज दो— 'सपरिवार तुरंत यहाँ चले आओ'।"
चार दिन बाद शरत —यानी कुसुमलता के छोटे भाई—अपनी पत्नी वायलट और दो बेटों के साथ समरसिंह जी के यहाँ आ पहुँचे। उनके आने के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। कुसुमलता के छोटे भाई शरत एक बेहद निडर और साहसी व्यक्ति थे, जिसके कारण घरवालों का डर भाग गया था। इसके अलावा घर की खामोशी भी दूर हो गई थी, क्योंकि उनके आने से घर में सदस्यों की संख्या बढ़ गई थी।
"शरत,... तुमने अपनी नौकरी छोड़ दी है क्या?"
मटिल्डा ने शरत से पूछा।
"हाँ मामीजी... वरना मैं इतनी जल्दी यहाँ कैसे आ पाता?"
"अरे... यह तो बहुत अफ़सोस की बात है... लेकिन इस मुश्किल वक़्त में तेरा आना हमारे लिए बहुत बड़ी मदद है।"
मटिल्डा ने कहा।
शरत के आने से उस घर में कुल नौ बच्चे और नौ बड़े सदस्य हो गए थे। बच्चों में गीता, उसकी दो बहनें भाग्या और निरूपा, छोटा भाई जनक, रमणी, मिल्टन के दो बच्चे स्वर्णा और समिंद, और इसके अलावा शरत के दो बेटे निलंत और नंदन थे। बड़े सदस्यों में—मटिल्डा, गुरु जी, कुसुमलता, मिल्टन, कुसुमा, गुणवती, पियसेन, शरत और उनकी पत्नी वयलट शामिल थे।
एक तरह से देखा जाए तो वह बहुत ही खूबसूरत परिवार था, क्योंकि खाना पकाते समय मटिल्डा, कुसुमा और शरत की पत्नी वयलट, कुसुमलता की मदद कर रही थीं। ऐसे वक़्त गुणवती रसोईघर के आसपास भी नहीं जाती थीं; वे या तो कोई कपड़ा सिल रही थीं या फिर लेस गूँथ रही थीं।
शरत हर शाम घूमने जाता था, और सुबह से शाम तक बार-बार एक ही काम करता था। अगर कहूँ कि वह काम क्या था... तो वह था लड़ाई करने का अभ्यास!
एक दिन मटिल्डा ने शरत से कहा,
"शरत, तुम आज भी शाम को घूमने जाओगे ना... तो थोड़ा जल्दी वापस आ जाना!"
"क्यों बड़ी मामीजी? बात क्या है? अभी भी मेरे पास कोई काम नहीं है ना, इसलिए मैं बाहर कोई रोज़गार ढूँढने जाता हूँ। मैं फालतू में समय बर्बाद करने नहीं जा रहा हूँ। बताइए मामीजी, क्या काम है?"
"हमारी छोटी बेटी—यानी तुम्हारी गुणवती दीदी—उनके पति पियसेन ने जो बेकरी खोली थी ना?... तुम्हारे बड़े मामाजी की हत्या के बाद से वह आज तक बंद है। पियसेन बुदबुदा रहा था, 'क्या करूँ, अकेले जा भी नहीं सकता, बहुत डर लगता है।'... तो शरत, क्या तुम आज रात उनके साथ बेकरी में रुकने जा सकते हो? अगर तुम सिर्फ आज की रात वहाँ बिता लोगे, तो उनकी बहुत बड़ी मदद हो जाएगी।… कल सुबह तक तुम वापस आ जाना।"
"जी हाँ मामीजी, क्यों नहीं? मैं ज़रूर जाऊँगा," शरत ने कहा।
उसके बाद पियसेन ने अपनी बेकरी फिर से खोल ली, लेकिन वे रात में वहाँ नहीं रुकते थे।
जॉन जी के कत्ल के बाद तीन महीने बीत चुके थे और उनकी पुण्यतिथि का तीसरा मासिक श्राद्ध भी संपन्न हो चुका था। इसके बावजूद भी, उस पूरे घर में से अकेले बाहर निकलने की हिम्मत सिर्फ शरत में ही थी। दूसरी तरफ, गुरु जी तो घर से बाहर पैर तक नहीं रखते थे; वैसे भी घर के अंदर ही अपने कामों में व्यस्त रहना उनका जन्मजात स्वभाव था। लेकिन सबसे विस्मयजनक चीज़ तो यह है कि रात के समय कहीं जाते हुए जो मिल्टन डर के मारे,
"यक्ष प्रेत जब सामने आए,
उनको तथागत याद दिला दूं !!
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,
महाबीर जब नाम सुनावै॥"
ऐसा बुदबुदाता हुआ, घबराहट में चारों तरफ देखते और काँपते हुए जाता था; वही मिल्टन, जॉन जी के कत्ल के बाद से दिन-रात, समय-समय पर घर से गायब रहने लगा था।
गीता को अपने शरत मामा का एक काम बहुत अच्छा लगता था, और वह काम यह था—
समरसिंह जी के घर के सामने वाली छोटी सी ढलान पर मैंगोस्टीन का एक बड़ा और ऊँचा पेड़ था, जिसकी चारों ओर बड़ी-बड़ी शाखाएँ फैली हुई थीं। शरत ने उन शाखाओं में से जो सबसे नीचे वाली शाखा थी, उसे लगभग दो फीट की लंबाई छोड़ते हुए काट दिया। उसके बाद शरत ने एक बड़े बोरे को रेत से भर दिया और उसका ऊपरी हिस्सा कसकर बाँध दिया। फिर उन्होंने मैंगोस्टीन की शाखा के उसी कटे हुए दो फीट के हिस्से पर रेत से भरा वह बड़ा बोरा लटका दिया। उस बीच गीता बड़े ध्यान से उनका यह काम देख रही थी, और उसने देखा कि बोरा लटकते ही अपने शरत मामाजी एक शेर की तरह लपक-लपक कर उस पर वार करने लगे। उसे पता नहीं था कि शरत मामा ऐसा क्यों कर रहे थे। जब गीता ने अपनी माँ से पूछा, तो उन्होंने कहा,
"तुम्हारे मामाजी बुरा करने वालों के लिए यमराज हैं, और अच्छे इंसानों के लिए वे खुद एक बहुत अच्छे इंसान हैं।
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