•गीतातीत—[2]

             उस दिन उस नन्ही दादी के पति 'नेपो सिंज्ञो' जी भी गीता के यहाँ आए थे। वैसे, समरसिंह जी और नेपो सिंज्ञो जी बैठकख़ाने में बातचीत कर रहे थे। उस वक्त गीता की माँ कुसुमलता भी भंडारघर में काम कर रही थीं, तब मटिल्डा ने कुसुमलता से कहा,

      "बड़ी मालकिन,... अरी ओ बड़ी मालकिन...!! अब तुम इस बिटिया को साफ करके इसे कुछ खिला दो।.... अबे ओ! यह सुनो बड़ी, सबसे पहले हमारे छोटे बेटे को और नेपोसिंज्ञो जी को चाय-बिस्कुट वगैरह दे दो।"
       मटिल्डा, उनके पति जॉन और परिवार के सभी लोग कुसुमलता को 'बड़ी मालकिन' पुकारते थे। इसका कारण यह था कि कुसुमलता, जॉन की छोटी बहन की बड़ी बेटी थी, और चूँकि उसके माता-पिता उसे इसी नाम से पुकारते थे, इसलिए घर के बाकी लोग भी उसे 'बड़ी मालकिन' ही कहने लगे।
       उतना ही नहीं, मटिल्डा और जॉन अपने बड़े बेटे यानी आचार्य समरसिंह  को 'छोटे बेटे' कहकर पुकारते थे; इकलौती बेटी गुणवती को 'छोटी बेटी' कहकर पुकारते थे और परिवार में सबसे छोटे बेटे मिल्टन को 'छोटा लड़का' या सिर्फ़ 'लड़का' भी पुकारते थे।
        कुछ देर बाद कुसुमलता अपने पति और नेपो सिंज्ञो जी, दोनों के लिए चाय ले जा रही थीं। गीता भी अपनी माँ के पीछे-पीछे चली गई।
        उधर बैठकख़ाने में समरसिंह जी के साथ नेपोसिंज्ञो जी बातचीत कर रहे थे। गीता ने इतने बूढ़े आदमी को इससे पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए वह बड़े अचरज से उनकी तरफ देख रही थी। उनकी आवाज़ काँप रही थी और उसने देखा कि नेपोसिंज्ञो दादाजी के हाथ और सिर भी काँप रहे थे। वे कुछ खा रहे थे और बार-बार थूक रहे थे, और इसी बीच अपनी माँ कुसुमलता ने चाय की ट्रे स्टूल पर रखी और वापस चली गईं।
        नेपोसिंज्ञो जी ने गट-गट करके चाय पी ली, क्योंकि वे किसी भी चीज़ को ज़्यादा देर तक हाथ में रोककर नहीं रख सकते थे, क्योंकि उनके हाथ काँपते थे।
        कुछ देर बाद कुसुमलता गीता को बुलाने वापस आईं। उस वक्त नेपोसिंज्ञो जी ने तम्बाकू का एक बड़ा टुकड़ा लेकर उसे अपने मुँह में डाल लिया। वह देखकर कुसुमलता को तीव्र घिन आई और वे उल्टी करने जैसी आवाज़ें निकालते हुए,
      "ओह्ह... थू! उबकाई... उव्वक!"
करने लगीं।
      गुरु जी ने अपनी पत्नी कुसुमलता को खूब डाँटा, और कुसुमलता चुपचाप घर के अंदर चली गईं। यह देखकर गीता को बहुत दुख हुआ।
         चारों ओर अंधेरा घिर आया था। सभी लोग वापस जा रहे थे। नन्ही दादी भी अपने पति नेपोसिंज्ञो के साथ वापस चली गईं। उसके बाद गीता को वे जादुई पल बार-बार याद आ रहे थे।
                   ***
      अगले दिन, सुबह से आचार्य समरसिंह के वहाँ बहुत आगंतुक आ रहे थे, इसलिए गीता के लिए वह दिन भी बहुत अपूर्व था।
        सुबह की पहली किरण के साथ ही गीता की माँ कुसुमलता ने उसे जगाया। जब गीता की आँखें खुलीं, तो उसने देखा कि घर के सभी सदस्यों ने नए कपड़े पहने हुए थे। उसकी माँ, दादी माँ और बुआ जी गहनों से सजी हुई थीं। यहाँ तक कि रमणी दीदी ने भी एक बहुत खूबसूरत गाउन पहना हुआ था; लेकिन सिर्फ पापाजी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में—यानी सारौंग और बनियान में ही थे।
       कुसुमलता ने गीता को भी एक नया गाउन पहनाया। फिर उन्होंने गीता के बालों की पोनीटेल बना दी, लेकिन गीता पोनीटेल नहीं बनवाना चाहती थी। क्योंकि वह अपनी नई गुड़िया के साथ खेलना चाहती थी, जो उसके पिता ने उसे कुछ दिन पहले दिला दी थी।
      रमणी भी गीता की उम्र की ही थी। वह चल सकती थी, और बोल भी सकती थी, लेकिन ठीक से नहीं। उसका मुँह दाँतों से खाली था। उसने गीता को बुलाया,
    "गीदा, जद्दी आओ! तुम्हें कुद् दिकाना है।"
      तब गीता उसके पास चली गई। वहाँ जाते समय उसने देखा कि घर की सभी दीवारों पर गुब्बारे और फूल लटके हुए थे। घर के सामने जो नारंगी का पेड़ था, उस पर एक बड़ी बाल्टी भी रखी थी।
     सचमुच, वह बाल्टी और कुछ नहीं बल्कि एक लाउडस्पीकर था; लेकिन इससे पहले गीता ने कभी कोई लाउडस्पीकर नहीं देखा था, और न ही उसने कभी ऐसा कोई शब्द सुना था। फिर उसने देखा कि आँगन में बहुत सारी कुर्सियाँ भी रखी थीं, और उधर लोग बातें कर रहे थे। कुछ देर बाद, खाना खाने के लिए गीता की बुआ गुणवती ने रमणी को बुला लिया। उसके बाद गीता वहाँ अकेली रह गई थी। थोड़ी देर बाद कुसुमलता ने भी गीता को आवाज़ दी,
     "इधर आओ गीता, जल्दी से खाना खा लो। जल्दी करो, मुझे और भी बहुत काम हैं।"
      गीता नाश्ता करने चली गई। मेज़ पर खाने-पीने की बहुत सारी चीज़ें रखी थीं। वहाँ रमणी भी मौजूद थी, क्योंकि वह गीता से पहले ही अपनी माँ के साथ वहाँ आ चुकी थी। उस वक्त रमणी मेज़ पर सजी मिठाइयों की हर प्लेट में अपना छोटा सा हाथ डालकर मिठाई ले रही थी, और गुणवती मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देख रही थीं।
      कुसुमलता ने गीता के हाथ पर अतिरस का एक टुकड़ा रखा। तभी रमणी ने गीता के हाथ से वह मिठाई का टुकड़ा छीन लिया और बाहर फेंक दिया। लेकिन रमणी की माँ यानी  गुणवती ने रमणी को ज़रा भी नहीं डांटा। इसके बाद जब रमणी ने गीता को पीटना शुरू कर दिया, तो कुसुमलता गीता को वहाँ से बाहर ले गईं। वहाँ से जाते हुए वे मन ही मन बुदबुदा रही थीं—
       "छी! कितनी बदतमीज़ लड़की है वह रमणी। उसने इसे इतना पीटा, फिर भी गुणवती दीदी ने उसे कुछ नहीं कहा!… अगर इसके पापा ने यह सब देख लिया, तो वे सारा गुस्सा मुझ पर ही उतारेंगे। आखिर यह काली-कलूटी मेरे पति की जान जो है... इसीलिए तो यह लड़की मासूम होने पर भी मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आती।"
      घर के सामने पहुँचते ही कुसुमलता ने गीता का ध्यान भटकाने के लिए कहा,
     "वह देखो गीता, चाचियाँ डफली बजा रही हैं।"
    उस बड़ी डफली के चारों तरफ बहुत से महिला-पुरुष बैठे हुए थे।
      बहुत देर बाद गीता ने देखा कि उसके चाचाजी मिल्टन के साथ एक चाची भी बैठी थीं, जो उसे बहुत अजीब लगीं।
        अब अगर मैं इस कहानी की लेखिका—अयोध्या सिंह—के नज़रिए से बयां करूँ कि नन्ही गीता को ऐसा क्यों लगा, तो सच तो यह है कि मिल्टन के साथ बैठी वह महिला और कोई नहीं, बल्कि उनकी नई दुल्हन थीं। गीता को वे चाची इसलिए अजीब लगीं क्योंकि वे अत्यधिक अश्वेत और भारी शरीर की थीं। उनके चेहरे पर मुस्कान की एक बूंद तक नहीं थी। इतना ही नहीं, जब वे दुल्हन मिल्टन के पास खड़ी हुईं, तो किसी विशाल स्तंभ जैसी दिखाई दे रही थीं।
      दोपहर के भोजन के बाद, मिल्टन पड़ोस की एक महिला के साथ मिलकर गीत गा रहे थे। मिल्टन ने गाया—
"मेरा प्यार भी तू है-ये बहार भी तू है,
तू ही नज़रों में जान-ए-तमन्ना,
तू ही नज़ारों में, नज़ारों में..."
तब उन महिला ने उनके साथ सुर मिलाते हुए गाया—
"मेरा प्यार भी तू है,
ये बहार भी तू है..."
तू ही नज़रों में जान-ए-तमन्ना,
तू ही नज़ारों में, नज़ारों में..."
       गीता ने देखा कि उन दोनों की आवाज़ सुनकर उसके पिताजी कमरे से बाहर झाँके और फिर वापस अंदर चले गए।
फिर मिल्टन गाने लगे,
      "तू ही तो मेरा नील गगन है..."         

   और वे महिला भी उनके साथ गाने लगीं। वे दोनों काफी देर तक गाते रहे। समरसिंह जी भी बार-बार कमरे से बाहर निकलते और वापस अंदर चले जाते।  सच तो यह था कि मिल्टन और वे महिला, दोनों में से कोई भी सुरीला नहीं गा रहा था; फिर भी नन्ही गीता चुपचाप खड़ी उन्हें सुन रही थी। गाते समय मिल्टन के हिस्से की पंक्तियाँ भी वे महिला ही गा रही थीं, क्योंकि मिल्टन को पूरा गीत याद नहीं था।
वे महिला साड़ी-ब्लाउज़ पहने, नाच-नाचकर गा रही थीं। असल में, मिल्टन और वे महिला दोनों गाने के नाम पर जैसे चिल्ला रहे थे। चारों तरफ इतना शोर-शराबा था कि कोई भी उनका गाना ढंग से नहीं सुन पा रहा था।
      जैसे-तैसे गाना खत्म हुआ। इसके बाद समरसिंह जी ने मिल्टन को अंदर बुलाया। गीता भी अपने चाचाजी के पीछे-पीछे पिताजी के कमरे की तरफ चली गई। गुरु जी ने अपने छोटे भाई मिल्टन को फटकार लगाते हुए कहा,
     "तुझे ज़रा भी शर्म नहीं है?… तमीज़ से काम लिया कर! ह! … अपनी नई-नवेली दुल्हन के सामने पराई औरतों के साथ सबके बीच प्रेम गीत गा रहा है? ऊपर से आज का यह खास दिन!… लोग क्या-क्या सोचेंगे? तू तो कभी सुधरने वाला नहीं।… ह्म्म्! अब जा यहाँ से और अपनी पत्नी के पास बैठ! नालायक कहीं का!"
     मिल्टन ने मुँह उठाकर भी नहीं देखा और चुपचाप वहाँ से चला गया। उस समय मटिल्डा भी वहाँ मौजूद थीं। उन्होंने गुरु जी से कहा,
    "रहने दो छोटे बेटे, लड़के को मत डांटो। अभी उसे समझ नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत।… आखिर वह घर में सबसे छोटा है ना।"
      "हुंह!... अम्मा आप भी ना! समझ नहीं है? क्यों नहीं है?... छब्बीस साल की उम्र में भी समझ नहीं आएगी तो कब आएगी?... बदतमीज़ कहीं का!"
     गुरु जी गुस्से में बोले। तब मटिल्डा खाँसती हुई वहाँ से चली गईं, क्योंकि जब भी उन्हें गुस्सा आता था, वे खाँसने लगती थीं।

     

                    शाम को आए हुए गाँव वालों के साथ गीता भी बैठी थी। वह कुछ भी खाने-पीने वाली बच्ची नहीं थी, इसलिए बस अपने पिताजी के पास ही बैठी रही। तभी रमणी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

"आओ गीदा, हम नई मामी के पात् तलते हैं।"
फिर गीता भी उसके साथ अपनी नई दुल्हन चाची के कमरे में चली गई। उस वक्त गीता की नई चाची एक पुराना, लंबा गाउन पहने बिस्तर पर बैठी थीं।
     "मामीदी, तोते मामादी का हैं?"
      रमणी ने अपनी नई मामी से पूछा।
लेकिन नई दुल्हन ने कोई जवाब नहीं दिया। रमणी ने जब बार-बार वही सवाल दोहराया, तब नई दुल्हन ने बहुत मुश्किल से शब्द बटोरते हुए जवाब दिया—
"मुझे... पता... न... हीं...!"
"मामीदी, आपुका नाम का है?"
       रमणी ने फिर उत्सुकता से अपनी तोतली बोली में पूछा।
       "............"
       "बताइ ए ना मामीदी, का नाम है आपुका?"
        "............"
        "मामीदी, हमे अपुना नाम बताइ ए ना!"
        "............"
       तभी अचानक वहाँ मटिल्डा आ गईं। उन्होंने अपनी नई बहू की तरफ देखा और पूछा,
     "और छोटी बहू, तुम्हारा नाम क्या है?"
         "............"
मटिल्डा ने फिर से दो-तीन बार वही सवाल दोहराया, लेकिन नई बहू के होंठ टस से मस न हुए।
      "अरी ओ!... क्या तुम बहरी हो? या गूँगी हो?"      
     मटिल्डा ने इस बार थोड़े ऊँचे और कड़क स्वर में पूछा। लेकिन नई दुल्हन के चेहरे पर कोई हलचल नहीं हुई, वह पहले की तरह ही खामोश रही। तब रमणी ने बीच में कहा,
      "नयी, नयी नानी माँ! इन्हें सब सुनाई दे रा है…! औउर ये बोल बी सत्ती हैं।"
     रमणी की बात सुनकर मटिल्डा और भी ज़ोर से चिल्लाईं—
     "तो फिर बताती क्यों नहीं? क्या नाम है तेरा? क्या तेरा इस दुनिया में कोई नाम ही नहीं है?... अगर तूने अपना नाम नहीं बताया, तो मैं तुझे एक नया नाम देती हूँ—गुमसुम कहीं की! तुझसे तो एक ही नाम अच्छी तरह मेल खाता है... 'घुग्घू'!"
      "............"
     कमरे में एक बार फिर वही गहरा सन्नाटा छा गया। नई दुल्हन ने अपनी आँखें झुका रखी थीं और मटिल्डा के चेहरे पर गुस्से के भाव साफ़ दिख रहे थे।
      बार-बार पूछने पर भी नई बहू के चुप रहने से मटिल्डा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने हद से ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाकर कहा,
     "अरी! जल्दी से अपना नाम बता, वरना मैं तुझे..."
     तभी डर के मारे नई दुल्हन के मुँह से बमुश्किल आवाज़ निकली। वह काँपते हुए फुसफुसाई,
     "कु.. सु.. मा..!"
     अपनी मामी का नाम सुनते ही रमणी खुशी के मारे उछलते हुए चिल्लाने लगी,         
     "कुतुमा, कुतुमा, कुतुमा, कुतुमा...!"
तब मटिल्डा ने कहा,   
     "कुसुमा... अब तुम उठो, रसोई में जाकर चाय पी लो।"
     ऐसा कहकर वह कमरे से बाहर चली गईं। लेकिन रमणी ने अब भी चिल्लाना बंद नहीं किया था,
     "कुतुमा, कुतुमा, कुतुमा, कुतुमा...!"    
    उसी समय पियसेन कमरे में आया और उसने रमणी को डांटकर चुप कराया।
     कमरे में इतना बड़ा शोर-शराबा होने पर भी, नन्ही गीता एक छोटे से चूहे की तरह दुबककर चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई थी। वह बिना हिले-डुले अपनी मासूम आँखों से उन सारी घटनाओं को निहार रही थी; असल में, यही उसका स्वभाव था।
      उस वक्त चारों तरफ अंधेरा घिर रहा था। उसी बीच एक पड़ोसी घर आए। उन्हें देखकर गुरु जी बोले,
      "अरे! कैसे हो?"
    और ऐसा कहते हुए वे अंदर चले गए। उस वक्त कुसुमलता रसोई में चाय बना रही थीं। जो पड़ोसी आए थे, वे कुर्सी पर बैठ गए और मेज़ पर रखी गीता की गुड़िया की पलकें हिलाने लगे। गुड़िया की आँखों से 'टक-टक' की आवाज़ आने लगी। यह सुनकर मटिल्डा अंदर से ज़ोर से बोलीं,
      "अरे ओय,रिचर्ड…! तुम बच्ची की गुड़िया मत तोड़ना।"
     जब रिचर्ड चाय पीने चले गए, तो एक और बुजुर्ग आदमी वहाँ आए। उनके हाथ, सिर और आवाज़ काँप रहे थे। उन्हें देखकर गीता को 'नेपो सिंज्ञो' दादा की याद आ गई। उस बूढ़े आदमी ने गीता से कहा,
     "आओ छोटी बेटी, हम नाचेंगे।"
    गीता शर्मा गई। उसने देखा कि वे बूढ़े दादाजी अकेले ही नाचने लगे और नाचते-नाचते कहने लगे,
      "दहिं, दहिं, दहिं, दहिं..."
      गीता धीरे-धीरे अपनी माँ के पास चली गई। तब कुसुमलता ने उससे पूछा,
      "वे कौन दादाजी हैं?"
गीता ने लजाते हुए कहा,
       "दहिं दादा।"
                       ***

   [अगले भाग से संबंधित]     

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