•गीतातीत—[4]
उसके कुछ हफ्तों के बाद, एक दिन जब गुरु जी पुनः घर आए, तो उनके वापस लौटते समय गीता और कुसुमलता भी उनके साथ चली गईं। वे भोर की पहली किरण के साथ घर से निकले थे। एक लंबा सफर तय करने के बाद, धीरे-धीरे शाम का धुंधलका गहराने लगा। कार के भीतर भी अंधेरा पसर चुका था। जब गीता अपनी माँ की गोद में लेटी, तो उसने खिड़की से देखा कि सोने की थाली सा चमकता चंद्रमा भी उनके साथ-साथ भागा चला जा रहा था। वह रह-रहकर सफेद सूती बादलों के ओट में छिप जाता था। चंद्रमा के इस लुका-छिपी के खेल को निहारते-निहारते कब गीता की पलकें भारी हो गईं और वह गहरी नींद में सो गई, उसे पता ही नहीं चला।
अगली सुबह गीता के सोकर उठने से पहले ही उसके पिताजी स्कूल जा चुके थे, क्योंकि वे पेशे से एक शिक्षक थे। जब गीता की आँख खुली, तब तक धूप काफी तेज हो चुकी थी। वह एक शुष्क यानी सूखा क्षेत्र था, जिसके कारण वह नया घर गीता को बेहद अजीब और अनजाना सा लग रहा था। तभी गीता की नज़र घर में मौजूद एक बुजुर्ग दादाजी पर पड़ी। उन्होंने स्नेहपूर्वक गीता की ओर देखा और कहा—
"छोटी बिटिया, ज़रा इधर आओ।"
ऐसा कहते हुए वे घर के भीतर जाने लगे और गीता भी उत्सुकतावश उन दादाजी के पीछे-पीछे चल दी। अंदर जाते समय गीता की नज़र ऊपर टँगी हुई कुछ चीज़ों पर पड़ी, जो हवा में लटक रही थीं। वह बड़ी जिज्ञासा से उन्हें निहार ही रही थी कि दादाजी ने उसकी उत्सुकता को ताड़ लिया और पूछा—
"क्यों छोटी बिटिया! क्या तुम्हें नहीं पता कि ये क्या हैं?"
गीता ने संकोचवश कुछ नहीं कहा और चुपचाप खड़ी रही। तब दादाजी ने मुस्कुराते हुए बताया,
"ये तरकारियाँ यानी सब्ज़ियाँ हैं। इन्हें तोरई, चिचिंडा और भिंडी कहते हैं। और वह जो दूसरी तरफ देख रही हो, वे सुखाने के लिए टाँगे गए तंबाकू के पत्ते हैं।"
फिर दादाजी ने स्नेह से पूछा,
"छोटी बिटिया!… क्या मैं तुम्हारे लिए एक कुआँ बना दूँ? ...फिर तुम उस कुएँ से पानी निकालना।"
गीता ने बड़ी मासूमियत से हाँ में सिर हिला दिया। अपने वादे के मुताबिक दादाजी वहीं बैठकर गीता के लिए लकड़ी और मिट्टी से एक खिलौने वाला कुआँ बनाने लगे, और गीता भी अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से कौतूहलवश उसे बनते हुए देखने लगी। उसने ऐसा कुआं इससे पहले कभी नहीं देखा था, क्योंकि गीता के गांव में कुएं ज़मीन पर खोदे गए थे और भले ही यह कुआं भी ज़मीन पर खोदा गया था, उससे पानी खींचना था।
तभी गीता ने देखा कि उन दोनों के पास एक मामाजी आए। उन्होंने चिंतित स्वर में दादाजी से कहा,
"पिताजी, उन जंगली सूअरों ने हमारे आधे नए पौधे नष्ट कर दिए हैं। अब हम क्या करेंगे?"
दादाजी ने अपना काम रोकते हुए धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा,
"चलो, चलकर देखते हैं।"
दादाजी ने गीता के लिए जो कुआँ बनाया था, वह बेहद खूबसूरत और अनूठा था। कुछ देर बाद, वे मामाजी बाहर जाने लगे। गीता ने देखा कि जाते समय वे अपने साथ एक बहुत बड़ा बर्तन भी ले जा रहे थे। इस अजनबी माहौल में गीता को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, इसलिए उसने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अपनी माँ से तीन सवाल पूछे:
१. "वे मामाजी कौन हैं?"
२. "उन मामाजी का नाम क्या है?"
३. "उस बड़े से बर्तन में क्या था?"
कुसुमलता ने मुस्कुराते हुए बेटी के सवालों का जवाब दिया:
"वे मामाजी तुम्हारे बड़े दादाजी के इकलौते बेटे हैं, उनका नाम 'सूर्य' है, और उस बर्तन में उन मामाजी के लिए चाय थी।"
गीता ने थोड़ा उलझते हुए फिर से एक सवाल दागा,
"हूँ…! बड़े दादाजी...? वे कौन हैं माँ?"
"अरे! वे जो बड़े पेट वाले दादाजी हैं ना, जो अभी तुम्हारे लिए इतना सुंदर कुआँ बना रहे थे... वही तो तुम्हारे बड़े दादाजी हैं! और कौन?..."
कुसुमलता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
और उस घर में एक बुज़ुर्ग महिला भी रहा करती थीं, जो उन बड़े दादाजी की पत्नी थीं। उनके आगे के दाँत इतने लंबे थे कि उनका मुँह ठीक से बंद ही नहीं हो पाता था। वे बूढ़ी दादी रोज़ नियम से जाँते अनाज पीसने वाली पारंपरिक चक्की पर बाजरा पीसा करती थीं। उस समय तक लगभग दो वर्ष और आठ महीने की हो चुकी गीता को अपनी उन बड़ी दादी का यह काम बहुत पसंद आ रहा था, इसलिए वह भी अपने खेल-घर की छोटी सी दुनिया में बैठकर बाजरा पीसने की नकल करने लगती। चूँकि उसके दाँत उन दादी जितने लंबे नहीं थे, इसलिए वह बिल्कुल उनके जैसा दिखने के लिए अपने सामने के दो दाँतों के बीच नारियल के पत्ते की सींक का एक छोटा सा टुकड़ा फँसा लिया करती थी।
एक शाम, वे बड़ी दादी, बड़े दादाजी और गीता उनके बेटे 'सूर्य' से मिलने उनके खेत की ओर चल दिए। वे एक संकरी पगडंडी से होकर गुज़र रहे थे, जिसके दोनों किनारों पर छोटी-छोटी झाड़ियाँ उगी हुई थीं। वहाँ दूर-दूर तक कोई बड़ा पेड़ नज़र नहीं आ रहा था। रास्ते में कुछ किसान खेत साफ़ करने के लिए सूखी घास और झाड़ियों के ढेरों को जला रहे थे, जिससे जगह-जगह से धुआँ उठ रहा था।
जब गीता, अपनी बड़ी दादी और बड़े दादाजी के साथ सूर्य के खेत पर पहुँची, तो वहाँ का नज़ारा देखकर हैरान रह गई। खेत में चारों ओर हरी-भरी सब्ज़ियाँ लहलहा रही थीं, लेकिन वहाँ की मिट्टी पूरी तरह सूखी थी और दूर-दूर तक पानी की एक बूँद भी नज़र नहीं आ रही थी।
रविवार की शाम गुरु जी के एक मित्र उनसे मिलने आए, जो स्वयं भी एक शिक्षक थे। जब वे वापस जाने की तैयारी कर रहे थे और दहलीज़ से उतरकर ज़मीन पर कदम रख ही रहे थे, तभी अचानक उनका पैर फिसल गया और वे 'धड़ाम' से नीचे गिर पड़े। गिरते ही उनकी धोती पूरी तरह कीचड़ से सन गई। दरअसल, उस शुष्क क्षेत्र की यह विशेषता थी कि वहाँ बारिश होते ही सूखी मिट्टी बेहद फिसलन भरी हो जाती थी। उस अप्रत्याशित घटना को देखकर नन्हीं गीता का कोमल दिल भर आया और उसकी आँखों में आँसू छलक आए। इसके बाद, चाहे वह खाना खा रही हो, सोने जा रही हो, या फिर अगली सुबह नींद से जाग रही हो—हर एक पल उस दुर्घटना की याद गीता के मासूम दिल को झकझोर देती थी। भले ही वह बहुत छोटी बच्ची थी, लेकिन अपनी हमउम्र के अन्य बच्चों की तुलना में वह विस्मयकारी रूप से संवेदनशील थी।
"ओह मेरी छोटी बिटिया! कल से क्यों इतनी खोई-खोई सी रहती हो? आज अपने कुएँ के पास खेलने नहीं जाओगी?"
बड़े दादाजी ने गीता का अकेलापन और उदासी देखकर स्नेह से पूछा। बड़े दादाजी के इस सवाल का जवाब गीता ने नहीं, बल्कि कुसुमलता ने दिया—
"कल इसके पापा के एक मित्र गुरु जी यहाँ आए थे ना... दहलीज़ पर पैर फिसलने से वे गिर गए और उनकी धोती पूरी तरह कीचड़ से सन गई थी। बस, उसी पल से गीता के दिमाग में उस बात के सिवाय कोई दूसरी बात आ ही नहीं रही है। वे गुरु जी तो उस घटना को यहीं भूल-भलाकर चले गए और अब शायद किसी उत्सव में हँस-खेल रहे होंगे; पर हमारी यह गीता अब तक उसी एक घटना को लेकर बैठी है और लगातार उसी के बारे में सोचे जा रही है।"
कुछ समय बाद एक रात कुसुमलता—जो गर्भवती थीं—के पेट में अचानक तेज़ दर्द, यानी प्रसव वेदना शुरू हो गई। गुरुजी ने बिना देर किए उन्हें पास के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया, जो घर से महज़ कुछ ही दूरी पर था।
अपनी माँ के बिना नन्हीं गीता का बुरा हाल था; उसे माँ की इतनी याद आ रही थी कि वह लगातार रोए जा रही थी। जब गुरु जी अस्पताल से वापस घर लौटे, तो अपनी लाडली का यह रोना उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। वे तुरंत ही गीता को अपनी गोद में उठाकर अपने साथ अस्पताल ले गए।
अस्पताल जाते समय गीता ने ऊपर देखा; आसमान में मुस्कुराता हुआ, सोने की थाली जैसा वही बड़ा चंदा एक बार फिर मानो उनके साथ-साथ अस्पताल की तरफ ही भागा चला जा रहा था।
अस्पताल के कमरे में कुसुमलता एक बिस्तर पर लेटी हुई थीं। उस रात घर वापस आते समय कुसुमलता गीता के साथ नहीं लौट सकीं, वे अस्पताल में ही भर्ती रहीं; इसलिए गीता उस रात अपने पिताजी के पास ही सिमटकर सो गई।
अगली सुबह कुसुमलता गुरु जी के साथ घर वापस लौटीं, और उनकी गोद में एक छोटी सी नवजात बच्ची भी थी। गुरु जी ने मुस्कुराकर गीता से कहा—
"बिटिया रानी देखो, यह तुम्हारी छोटी बहन है।"
ऐसा कहकर गुरु जी कमरे से बाहर चले गए। गीता ने उत्सुकता और संकोच के साथ आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ छू लिया। तभी अचानक कुसुमलता ने बहुत ही रूखे स्वर में कहा—
"जाओ गीता, जा... यहाँ से जा! तू इस छोटी बच्ची के पास बिल्कुल मत आना!"
माँ के मुँह से निकले इन रूखे और तीखे शब्दों को सुनकर नन्हीं गीता के कोमल दिल को गहरी ठेस पहुँची। उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं और अपने आँसू छुपाती हुई, वह दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गई। लेकिन कमरे से बाहर आते ही माँ का वह रूखा बर्ताव उसके मन से पूरी तरह गायब हो गया। इसका कारण यह था कि गीता अपने पापा की पहली संतान थी और उन्होंने हमेशा गीता को अपनी पलकों पर बिठाकर रखा था; पिता के उसी असीमित लाड़-प्यार ने उसके दिल में माँ की कड़वाहट के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी थी।
और गीता उस समय अपनी हमउम्र के आम बच्चों जैसी बिलकुल नहीं थी, क्योंकि उसके पिताजी ने 'मैं', 'मेरा' और 'मुझे' जैसी संकीर्ण व स्वार्थी भावनाओं को उसके निष्कपट दिल में कभी पनपने ही नहीं दिया था। माँ के उस रूखे बर्ताव को भुलाकर, वह नन्ही बच्ची एक बार फिर तीन अलग-अलग बार उनके पास जाने के लिए आगे बढ़ी। लेकिन हर बार जैसे ही वह कमरे की चौखट तक पहुँचती, उसे माँ की कही हुई वही कड़वी बात याद आ जाती और वह भारी मन से वहीं से उल्टे पाँव वापस लौट आती। और, उस दिन के बाद से कुसुमलता ने गीता को कभी अपने करीब नहीं आने दिया। बस कभी-कभार पिताजी ही उसे दुलार से अपनी गोद में बिठा लेते थे।………………"
कहानी के इस हिस्से को पढ़कर गीता की छोटी बेटी मन्दारा थोड़ी देर के लिए गहरे विचारों और कल्पनाओं के समंदर में डूब गई। वह अपलक शून्य में निहारते हुए सोचने लगी—
—"अरे! हमारी माँ भी कितनी अजीब थीं ना! उस दिन जब नानी माँ ने मेरी माँ को उनकी महज़ तीन साल की छोटी सी उम्र से ही पूरी तरह अस्वीकार कर दिया था, तो उन्हें उसी पल अपनी माँ का मोह छोड़ देना चाहिए था ना?… पर अपनी उम्र के साठ साल पूरे होने तक, मेरी माँ न जाने किस जिम्मेदारी का कटोरदान उठाए घूमती रही थीं और किस कर्तव्य की अंतहीन चक्की में खुद को पीसती रही थीं?..."—
ऐसा सोचने के बाद मन्दारा ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और फिर से कहानी पढ़ने लगी—
…………गीता जिस घर में रहती थी, ठीक उसी के पास एक मंत्री जी का बंगला था। उन मंत्री जी का नाम 'कुमारसिंह' था और उन्होंने एक बहुत बड़ा कुत्ता पाल रखा था। एक दिन जब गीता अपने पापाजी के साथ वहाँ गई, तो वह बड़ा कुत्ता उन्हें देखकर ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। उस घटना से डरी हुई गीता, उस दिन के बाद से 'मंत्री जी' नाम सुनते ही डर के मारे काँपने लगती थी।
उन मंत्री जी के अलावा, वहाँ एक पड़ोसन युवती भी रहती थी। वह हमेशा एक मैला-कुचैला सा घाघरा-ब्लाउज़ पहने रहती थी; वैसे भी वहाँ कोई सुंदर या नए कपड़े नहीं पहनता था। उस युवती का नाम 'सिरियालता' था और वह गीता को प्यार से 'सुनहरी छोटी बेटी' कहकर पुकारती थी। वहाँ एक और युवती भी थी, जिसका नाम गीता को आज तक मालूम नहीं हो सका। इसीलिए बचपन में वह उसे 'दोस्त चाची' कहकर ही बुलाती थी।
एक शाम जब कुसुमलता, उनकी नवजात बच्ची और गीता घर पर अकेले थे, तभी गीता ने देखा कि 'दोस्त चाची' वहाँ आईं और उन्होंने कहा—
"ओह...! मेरी सुनहरी लाड़ली छोटी बिटिया आओ, हमारे घर चलो। आज तो तुम्हें मेरे साथ चलना ही पड़ेगा।..."
इसके बाद गीता की उस दोस्त चाची ने कुसुमलता से इजाज़त मांगी,
"मैडमजी, क्या मैं छोटी बिटिया को कुछ देर के लिए अपने घर ले जाऊँ?"
तब गीता ने देखा कि अपनी माँ ने लंबे दाँतों वाली दादी की तरफ देखकर पूछा,
"ये सुनिए, यह हमारी गीता को अपने साथ ले जाने के लिए कह रही है। कोई दिक्कत तो नहीं है?"
कुसुमलता की एक आदत थी, वे किसी से बात करते हुए कभी रिश्तों के शब्दों का इस्तेमाल नहीं करती थीं। यह बात भले ही बहुत अच्छी न लगती हो, लेकिन उनका स्वभाव ऐसा ही था। तब गीता ने सुन लिया कि दादी ने जवाब दिया,
"हाँ-हाँ, कोई बात नहीं।... इस समय वहाँ कोई नहीं है, केवल गोरी है।"
गाँव वाले गीता की उन चाची को 'गोरी' कहते थे, क्योंकि वह बहुत गोरी थी। गीता देख रही थी कि लंबे दांत वाली दादी क्या कहेंगी। गीता को सुनाई दी कि उन्होंने चाची से कहा,
"बच्ची के साथ जल्दी वापस आना गोरी।"
गीता के मन में दोस्त चाची के लिए गहरा स्नेह था, लेकिन वह बेहद शर्मीली लड़की थी। इसी वजह से अचानक सामने आने वाली परिस्थितियों का निडरता से सामना करने का साहस उसमें नहीं था। साथ ही, उसके भीतर की गहरी आज्ञाकारिता के कारण—लंबे दांतों वाली दादी, अपनी माँ और दोस्त चाची द्वारा लिए गए फैसले के सामने—भय, संदेह और लज्जा रूपी तीन राक्षसों के बीच फंसकर पिसती, सहमती और कांपती हुई, अंततः गीता अपनी दोस्त चाची के साथ उनके घर चली गई।
उस घर के सामने बहुत सारे बड़े-बड़े पेड़ थे, और इसलिए ही घना अंधेरा भी था। गीता के दिल में भय रूपी भूत उसे बिना बताए ही जाग उठा था। जैसे ही वे दोनों घर के सामने पहुँचे, दोस्त चाची ने कहा,
"छोटी, मैं पीछे से आती हूँ। तब तक तुम अंदर बैठो।"
गीता दरवाज़े पर ही खड़ी रही, क्योंकि घर के अंदर बहुत अंधेरा था। घर के अंदर की तरफ़ देखते ही उसके मन में एक बड़ा सूनापन और मनहूसियत यानी उदास कर देने वाला सन्नाटा छा गया। यहाँ तक कि वह उस घर के अंदर अपनी आँखें उठाकर देखने से भी डर रही थी। जब दोस्त चाची घर के पिछले हिस्से की तरफ चली गईं, तब गीता को एक ऐसी असीम तन्हाई और अकेलेपन का अहसास हुआ जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। इसलिए वह अंदर नहीं गई।
। "चलो सुनहरी बिटिया, अंदर चलो ना!"
दोस्त चाची ने फिर से चिल्लाकर कहा। उस पल गीता के अत्यधिक आज्ञाकारी स्वभाव के कारण वह एक बड़ी दुविधा में पड़ गई; क्योंकि एक तरफ तो वह दोस्त चाची के घर के अंदर जाने के आग्रह को टाल नहीं सकती थी, और दूसरी तरफ उसने अपनी जिंदगी में उस दिन से पहले कभी भी इस तरह अकेले किसी अजनबी घर में कदम नहीं रखा था।
आखिर भय और शर्म से कांपती हुई वह अंदर तो गई, लेकिन कुर्सियां एक नहीं चार-पांच थीं। अपने संकोच यानी शर्मीलेपन के कारण वह कुछ देर इसी कशमकश में जूझती रही कि आखिर किस कुर्सी पर बैठना सही होगा, और अंततः वह डरते-डरते एक कुर्सी पर बैठ गई।
वहाँ हर तरफ गहरी खामोशी थी। घर की दीवार पर एक बड़ी घड़ी लटकी हुई थी, जिससे
".....टिक-टिक,
टिक-टिक,
टिक-टिक,
टिक-टिक....." की आवाज़ आ रही थी। अचानक वह बड़ी घड़ी बजने लगी। गीता चौंक गई! उसका रोना निकल आ रहा था और उसका गला रुँधने लगा था। गीता की झिझक इस कदर थी कि वह रोने में भी लज्जा महसूस कर रही थी। इसलिए वह यहाँ-वहाँ देखते हुए अपने रुँधते हुए गले को बार-बार सहलाने लगी और आँखों में उमड़ने को बेताब आँसुओं को रोकने की कोशिश करने लगी।
"अरेरे, मेरे प्यारे आँसू..…! प्लीज... तुम आँखों में मत आओ ना, …मेरे सुनहरे आँसू, प्लीज़, प्लीज़,… तुम आँखों में मत आओ ना।"
कुछ पल बाद फिर उसका मन थोड़ा शांत हुआ और तभी उस बड़ी घड़ी से, पहले बजने वाले सामान्य संगीत के बजाय,
"ढांग, ढांग, ढांग,
ढांग, ढांग, ढांग।"
के रूप में एक के बाद एक बजना शुरू कर दिया। गीता ने झट गिनने लगी—
" एक, दो, तीन, चार, पांच, छह।"
उसके बाद घड़ी फिर से शांत हो गई, लेकिन वह एक ही ध्वनि लगातार सुनाई देती रही—
"टिक-टिक,
टिक-टिक,
टिक-टिक,
टिक-टिक..."
गीता का डर तो भाग गया था, लेकिन उसको बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था।
तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ आई।
"छोटी, चाय पियोगी क्या?"
गीता के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। उसने देखा कि दोस्त चाची हाथ में एक चाय की प्याली लिए अंदर आईं। उन्होंने प्याली से तश्तरी में थोड़ी चाय डाली और दुलार से कहा,
"...छोटी, यह चाय पी लो...।"
इतना कहकर उसने तश्तरी गीता के मुँह के पास ले आईं और उसे धीरे-धीरे चाय पिलाने लगी। चाय पीने के कुछ देर बाद उसने कहा,
"सुनहरी छोटी, अब हमें चलना चाहिए, वरना देर हो जाएगी।"
गीता ने बिना कुछ बोले उनके साथ बाहर आ गई।
इस तरह कुछ महीने बीत गए। बड़े दादाजी के बेटे यानी गीता के सूर्य मामाजी रोज़ की तरह सुबह-सुबह अपने खेतों पर चले गए थे। इधर गीता अपने खेल-घर में अकेली थी। उसके पास तीन गुड़ियां थीं, जिनके नाम उसने खुद नहीं, बल्कि कुसुमलता ने 'ललिता', 'गंगा' और 'नीला' रखे थे। उसी सुबह जब गीता अपनी उन्हीं गुड़ियों के साथ खेलने में मग्न थी, तभी अचानक कुसुमलता की आवाज़ गूँजी—
"गीता..., जल्दी यहाँ आओ! वरना देर हो जाएगी। हमें बहुत दूर जाना है।"
घर के भीतर से आती उस आवाज़ में एक अजीब सी हड़बड़ी थी। घर का माहौल गवाही दे रहा था कि कहीं जाने की तैयारी है, पर नन्हीं गीता इस बात से बिलकुल बेखबर थी कि उनका ठिकाना कहाँ होने वाला है। जब वह अपनी माँ के पास गई, तो उन्होंने उसे तैयार करना शुरू किया। माँ ने गीता को वही खूबसूरत गाउन पहनाया, जिसे उसके पिताजी ने खुद अपनी सिलाई मशीन की घरघराहट के बीच बड़ी हसरत के साथ उसके लिए सिला था। इसके बाद उन्होंने गीता के रेशमी बालों को दो हिस्सों में बाँटा और करीने से उसकी चोटियाँ गूँथ दीं। इसके बाद, वे अपनी बेटी गीता की तीनों गुड़ियों सहित उसके सारे खिलौने समेट कर अपने कमरे में ले गईं।
कुछ देर बाद कुसुमलता ने गीता से कहा,
"चलो, अब दादाजी और दादी के पैर छूकर नमस्कार करो।"
उसने दोनों को प्रणाम किया। गीता को देखते ही दादाजी की आँखें भर आईं और दादी भी खुद को रोक नहीं पाईं। गीता यह सब बड़ी हैरानी से देख रही थी।
दादाजी अपने आँसू पोंछते हुए सुबक कर बोले,
"अरे गुरु साहब जी, हम इस बच्ची को देखे बिना अब आगे कैसे जी पाएँगे... न जाने फिर कभी इस मासूम का चेहरा नसीब होगा भी या नहीं..."
उधर दादी माँ भी अपनी छींट के पल्लू से आँखें पोंछ
रही थीं। उन्होंने रुँधे हुए गले से पापा के सामने एक बड़ा बक्सा रखा और कहा,
"इसमें कुछ मिठाइयाँ और ताज़ी तरकारियाँ हैं। आप सबके लिए मैंने खुद ये मिठाइयाँ बनाई थीं।... हम ग़रीबों के पास आप लोगों को देने के लायक और क्या ही हो सकता है भला।"
[अगले भाग से संबंधित]

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