•गीतातीत—[5]

            जब आचार्य जी  अपनी पत्नी, गीता और भाग्या दोनों बेटियों के साथ दोबारा गाँव वापस आए, तब उस घर में गुणवती, पियसेन और रमणी के अलावा परिवार के बाकी सभी सदस्य—यानी मटिल्डा, मिल्टन, कुसुमा और उनकी बेटी 'स्वर्णा' रह रहे थे। शुष्क क्षेत्र की उस तपती धरती को छोड़कर वापस आने के बाद, गुरु जी भी इसी पैतृक घर में सबके साथ मिलकर रहने लगे; क्योंकि अब उनका स्थानांतरण गाँव के ही स्कूल—'होरकेटिया कनिष्ठ विद्यालय'—में हो गया था।

        एक दिन गीता अपनी गुड़ियों के साथ खेल रही थी। तभी रमणी ने उसकी सारी गुड़ियाँ छीन लीं। गीता चुपचाप घर के अंदर चली गई, क्योंकि वह झगड़ा करने वाली बच्ची नहीं थी। इतना ही नहीं, महज़ तीन साल की छोटी बच्ची होने के बावजूद गीता के मन में कोई नाराज़गी या दुख नहीं था। गुणवती भी वहाँ मौजूद थीं, पर उन्होंने रमणी को न तो डांटा और न ही कुछ कहा; बल्कि वे मुस्कुरा रही थीं। वहीं, गीता की नई चाची कुसुमा तो शुरू से ही शांत और कम बोलने वाली थीं, इसलिए वे भी चुपचाप सब देखती रहीं।
      रमणी द्वारा गुड़ियाँ छीन लिए जाने के बाद, गीता अपने पापा के कमरे में चली गई। वे वहाँ बैठकर एक बंद पड़े रेडियो को ठीक करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।  गीता के पिता समरसिंह जी जानते थे कि तकनीकी कार्य कैसे किए जाते हैं। तकनीकी कार्यों के अलावा भी उन्हें कई तरह के काम आते थे; जैसे—कपड़े सिलना, रबड़ के पेड़ों से दूध निकालना, वाद्य यंत्र बनाना और बजाना, गीत गाना, चित्रकारी करना, मिठाइयाँ और तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाना, बेंत से टोकरियाँ व ट्रे बनाना, चटाई बुनना तथा राजमिस्त्री और प्राथमिक चिकित्सा से जुड़े काम करना।
        उस वक्त रेडियो मेज़ पर रखा था और उसके सामने कुर्सी पर गुरु जी बैठे थे। शुष्क क्षेत्र में रह कर वापस गांव आने के बाद, गुरु जी ने अपनी प्यारी बड़ी बिटिया रानी गीता के खेलने के लिए एक छोटा सा कुआँ भी बना दिया था, जो उनके कमरे के ठीक सामने था।
      गीता ने फिर से अपना खेल शुरू कर दिया। रमणी द्वारा सारी गुड़ियाँ छीन लिए जाने के बाद, वह अपने खेल-घर में कपड़े धोने का खेल खेलने लगी। उसी वक्त गीता की माँ कुसुमलता कमरे से रसोईघर की तरफ जा रही थीं। उन्होंने देखा कि गीता खिलौने वाले कुएँ पर कपड़े धो रही है।  गीता के सिर पर दो मुक्के मारकर वे सीधे रसोईघर की ओर बढ़ गईं। कुछ ही देर बीती थी कि गीता की छोटी बहन भाग्या के रोने की आवाज़ गूँज उठी। रोने की आवाज़ सुनते ही कुसुमलता लपककर कमरे की तरफ आईं और दाख़िल होते ही एक बार फिर गीता के सिर पर दो मुक्के दे मारे।  मटिल्डा ने यह देखा और वे ज़ोर से चिल्लाईं,
      "अरी ओए बड़ी...! मैंने दो-तीन बार देख लिया है कि तुम जब भी आती-जाती हो, उस बेचारी बच्ची के सिर पर मुक्के मारकर भाग जाती हो! तुझे क्या हो गया है, हाँ? पागल हो गई है क्या तू?! ..वह मासूम बच्ची तो बस चुपचाप खेल रही थी, और तुम...? नालायक कहीं की!"
       कुसुमलता चुपचाप कमरे के अंदर चली गईं। तभी गुरु जी ने कमरे से ही अपनी अम्मा से पूछा,
       "क्यों? क्या हुआ अम्मा?"
      "कुछ नहीं... अब ठीक है,"
     मटिल्डा ने अपने गुस्से को शांत करते हुए कहा।
      "अरे अम्मा... आख़िर हुआ क्या? अगर कुछ नहीं हुआ, तो फिर आप ऐसे चिल्ला क्यों रही थीं?"
      गीता के पापा ने इस बार थोड़े ऊँचे स्वर में पूछा, क्योंकि वे अपने काम में व्यस्त थे और उन्होंने बाहर कुछ देखा नहीं था। तब मटिल्डा ने अपने स्वभाव को थोड़ा शांत करते हुए कहा,
       "वह... मैं कह रही थी कि... मैंने दो-तीन बार देखा कि वह बड़ी मालकिन... बिना बात के इस बच्ची के सिर पर मुक्के मार रही थी। बस इसीलिए मैं उस पर चिल्ला पड़ी... हाहाहा..."
       "पागल है क्या? क्या हो गया है उसे!"
     गुरु जी ने झुंझलाते हुए कहा और फिर से अपने काम में जुट गए।

       कुछ हफ़्तों बाद, कुसुमलता ने एक और बेटी को जन्म दिया। उस समय गीता की उम्र लगभग चार साल हो चुकी थी और उसकी छोटी बहन भाग्या महज़ एक साल की थी। उन दिनों भी गीता के दादाजी जॉन उसी रेस्तरां में काम करने जाते थे, जहाँ बरसों पहले उनकी मुलाक़ात मटिल्डा से हुई थी।
       उस समय जॉन जी की उम्र लगभग अड़सठ वर्ष थी। एक दिन जॉन जी ने अपने बेटे गुरु जी से कहा,
      "छोटे बेटे! अब तो मैं बहुत थक गया हूँ... कभी-कभी लगता है कि अब काम पर जाना भी मुश्किल हो गया है।"
       "तो मत जाइए न। इस उम्र में आपको काम करने के लिए कहता ही कौन है?… मैंने पहले भी आपसे कई बार कहा है कि अब आप काम छोड़ दीजिए,"
      गुरु जी ने जब यह कहा, तो उसके बाद से जॉन जी घर पर ही रहने लगे। लेकिन उन्होंने खाली बैठने के बजाय घर पर ही एक नया काम शुरू कर दिया।
       जॉन जी की वह ज़मीन, जिस पर उनका घर बना था, पूरे पाँच एकड़ की थी। जॉन जी उसमें से ढाई एकड़ का हिस्सा अकेले ही साफ़ करने में जुट गए। लेकिन घर में किसी को अंदाज़ा नहीं था कि वे इतनी ज़मीन किसलिए साफ़ कर रहे हैं। आख़िरकार, एक दिन गुरु जी ने कौतूहलवश अपने पापाजी से पूछ ही लिया,
       "पापाजी, आप किस काम के लिए इतनी कड़ी धूप में पसीना बहा रहे हैं? इस उम्र में इतनी थकान मोल लेना आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं ना!"        
गुरु जी ने चिंता जताते हुए कहा।
      "अरे छोटे बेटे, मैं यह सब अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी प्यारी बिटिया रानी के लिए कर रहा हूँ। मैं उसी के लिए ज़मीन का यह हिस्सा साफ़ कर रहा हूँ,"
      जॉन जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
      "क्या?... हमारी बेटी के लिए? बिटिया रानी के लिए ऐसा क्या करने जा रहे हैं आप?"
     गुरु जी ने अचरज से पूछा।
     "छोटे बेटे... हमें अपनी बिटिया रानी के भविष्य के बारे में अभी से सोचना चाहिए, है कि नहीं?... इसीलिए मैंने सोचा कि उसके लिए यहाँ 'रबर के पौधे' लगा दूँ। अभी से मेहनत करूँगा, तब कहीं जाकर वे बड़े होंगे। आख़िर कौन जानता है कि आगे हमारे साथ क्या-क्या हो भला?"
     जॉन जी ने सुदूर अतीत या भविष्य में ताकते हुए गंभीर स्वर में कहा
  ***

      उन दिनों घर में सभी के लिए भोजन पकाने की मुख्य ज़िम्मेदारी कुसुमलता की ही थी, और मटिल्डा भी इस काम में उनकी मदद किया करती थीं। कभी-कभी गीता की मौसी यानी कुसुमलता की छोटी बहन हेममाली भी उनसे मिलने आया करती थीं, जो काफी दूर किसी दूसरे प्रांत में रहती थीं। जब भी वे आतीं, उनकी बेटी 'निशा' और बेटा 'दुशांत' भी उनके साथ होते थे। हेममाली जब भी गुरु जी के इस निवास—'होरकेटिया हाउस' में आतीं, तो आते ही बिना थके घर के कामों में जुट जाती थीं; वे स्वभाव से ज़रा भी आलसी नहीं थीं। रसोई सँभालने, बर्तन धोने और साफ़-सफ़ाई करने के साथ-साथ वे बगीचे को संवारने और नए पौधे लगाने में भी हाथ बटाती थीं। लेकिन फिर एक समय ऐसा आया, जब एक लंबे अरसे तक उनकी तरफ़ से कोई संदेश या ख़बर नहीं मिली।
(अगले भाग से संबंधित)                 
                    


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