•गीतातीत—[6]

               एक दिन जब समरसिंह जी बाहर से वापस लौटे, तो उनके साथ एक बहुत बूढ़े दादाजी भी थे। उन दादाजी ने गीता को अपने पास बुलाया और अपनी हथेलियों में कुछ छुपाते हुए बोले—

       "चिड़िया, चिड़िया... मेरी मुट्ठी में एक चिड़िया है—छूटो, छूटो!"
     उनकी इसी बात के कारण गीता ने उनका नाम 'छूटो दादा' रख दिया था। बुजुर्ग होने के कारण उनकी आवाज़ भी किसी पक्षी की तरह बहुत पतली और तेज़ थी। छूटो दादाजी मटिल्डा के पिताजी यानी गुरु जी के नाना जी थे। उनका कद बहुत छोटा था और वे हमेशा एक लाठी के सहारे चलते थे। कुसुमलता ने गीता को बताया था कि उस लाठी को 'बैसाखी' कहते हैं
     एक दिन जब समरसिंह जी कहीं बाहर से वापस लौटे, तो उनके साथ एक बहुत बूढ़े दादाजी भी थे। उन दादाजी ने गीता को अपने पास बुलाया और अपनी हथेलियों में कुछ छुपाते हुए बोले—    
      "चिड़िया, चिड़िया... मेरी मुट्ठी में एक चिड़िया है—छू.. टो, छू.. टो!"
     उनकी इस बात की वजह से गीता ने उनका नाम 'छूटो दादा' रख दिया था। उनकी आवाज़ भी किसी पक्षी जैसी ही थी। छूटो दादाजी मटिल्डा के पिताजी यानी गुरु जी के नाना जी थे। उनका कद बहुत छोटा था और वे हमेशा एक डंडे के सहारे चलते थे। कुसुमलता ने गीता से बताया था कि उस डंडे को 'बैसाखी' कहते हैं।
     छूटो दादाजी को अंडे का पीला भाग यानी जर्दी खाना बहुत पसंद था। एक दिन दोपहर के भोजन में अंडे बने थे। छूटो दादा खाना खा चुके थे, लेकिन उन्होंने अंडे का पीला भाग नहीं खाया था। वे उसे पत्तल पर रखकर बस निहार रहे थे और बार-बार गीता को भी दिखा रहे थे। काफी देर बाद, आखिरकार उन्होंने उस जर्दी को अपने पॉपला मुँह में डाल ही लिया। यह देखकर गुरु जी ने मुस्कुराते हुए छूटो दादा की पत्तल पर एक और अंडा रख दिया।

      एक सुबह रमणी और गीता खेल रही थीं। वहाँ गीता की बुआ गुणवती भी मौजूद थीं। उन्होंने रमणी से कहा,
     "अरे ओ रमणिया… यह देख! गीता के बाल तो तुझसे भी लंबे हैं।"
      "जी हाँ माँ, बहुत सुंदर हैं ना?"
रमणी ने कहा।
      गुणवती चिढ़कर बोलीं,
      "अरी पगली! ऐसा नहीं होना चाहिए। तू किसी भी चीज़ में गीता से पीछे मत रह!"
       जब गुणवती ने ऐसा कहा, तो रमणी के मन में गीता के प्रति जलन की भावना पैदा होने लगी।
      इसी बीच, रमणी के पिता पियसेन ने एक नई बेकरी खोली। वह बेकरी समरसिंह जी के घर से करीब तीन किलोमीटर दूर थी। पियसेन हफ्ते में दो या तीन बार रात को उसी बेकरी में रुक जाते थे। कभी-कभी गुणवती और रमणी भी महीने में एक या दो बार रात बिताने वहाँ चली जाती थीं और अगली सुबह घर वापस लौट आती थीं।
      उस समय रमणी और गीता लगभग पाँच वर्ष की थीं, जबकि मिल्टन की बेटी स्वर्णा तीन साल की थी। रमणी, स्वर्णा और गीता हमेशा साथ खेलती थीं। गीता की छोटी बहन भाग्या हमेशा अपनी माँ कुसुमलता के साथ ही रहती थी। वहीं दूसरी तरफ, स्वर्णा और गीता को चित्रकारी करना बहुत पसंद था, इसलिए वे दोनों अक्सर कमरे में बैठकर चित्र बनाया करती थीं।
     उस दिन भी वे दोनों कमरे में बैठकर चित्र बना रही थीं, तभी रमणी दौड़ती हुई उनके पास आई और बोली,
      "अरे गीता, स्वर्णा! जल्दी आओ, मुझे तुम दोनों को कुछ दिखाना है।"
       स्वर्णा और गीता रमणी के पीछे-पीछे चली गईं।
      "वह देखो, छूटो दादा सूसू कर रहे हैं!"
       रमणी ने हँसते हुए कहा।
      "अरे रमणी दीदी!… मैंने सोचा था कि आप हमें कोई अनोखी चीज़ दिखाने जा रही हैं। इसमें क्या अजीब बात है? सूसू तो सभी करते हैं ना! मैं तो वापस जा रही हूँ।"
        यह बात स्वर्णा ने कही। जैसे ही वह गीता का हाथ पकड़कर वापस कमरे की तरफ चलने के लिए तैयार हुई, तभी रमणी ने उन दोनों को रोकते हुए कहा,
        "अरे स्वर्णा…, मत जाओ! छूटो दादाजी के सामने जाकर देखो। आओ, मैं तुम दोनों को दिखाती हूँ।"
         तभी जॉन जी उनकी तरफ आने लगे। उनके पास पहुँचने से पहले ही रमणी वहाँ से भाग खड़ी हुई, जबकि स्वर्णा और गीता वहीं खड़ी रह गईं। रमणी को भागते देख जॉन जी को बहुत गुस्सा आ गया और वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे,
        "अरी ओ रमणी!… मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं। तू इन छोटी बच्चियों को भी बिगाड़ रही है! मुझे बहुत अच्छी तरह पता है कि ऐसी बदमाशी सिर्फ यह रमणी ही कर सकती है। बूढ़े आदमी को चैन से सूसू भी नहीं करने देती यह लड़की! नालायक कहीं की!... अगर मैंने तुझे पकड़ लिया, तो तेरी खैर नहीं! हुह!!!"
        ऐसा कहकर जॉन जी वहाँ से चले गए। स्वर्णा और गीता भी अपने कमरे में लौट आईं। कुछ देर बाद रमणी अपनी माँ के साथ पियसेन यानी उसके पिताजी की बेकरी में रात बिताने चली गई।
         कभी-कभी जॉन जी नीचे वाले यानी गुणवती के घर पर सोने और आराम करने चले जाते थे। खासतौर पर जब गुणवती और रमणी रात को बेकरी पर होती थीं, तब जॉन जी उस 'नीचे वाले घर' में सोने चले जाते थे। 
      उसी रात छूटो दादाजी की तबीयत बहुत खराब हो गई। उन्होंने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था और शाम होते-होते तो उन्होंने बोलना भी बंद कर दिया। गुरु जी ने उनकी बहुत अच्छी तरह से देखभाल की और उन्हें ठीक करने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी हालत और भी बिगड़ती जा रही थी।
      उस रात जॉन जी नीचे वाले घर में सो रहे थे। लगभग भोर के दो बजे, गुरु जी छूटो दादा को देखने गए और उन्होंने उनसे बात करने की भी कोशिश की, लेकिन छूटो दादा ने कोई जवाब नहीं दिया। वे बिल्कुल निश्चेष्ट लेटे हुए थे। तब गुरु जी ने उनका हाथ पकड़कर देखा कि शरीर में गर्माहट कैसी है; हाथ की गर्माहट तो सामान्य थी। फिर उन्होंने दादाजी के नथुनों के सामने अपना हाथ रखकर देखा कि साँस चल रही है या नहीं। तभी गुरु जी को महसूस हुआ कि उनकी साँसें रुक चुकी थीं।
      गुरु जी ने अपनी माँ मटिल्डा को बुलाया। उन्होंने भी वैसी ही जाँच की, यानी दादाजी के नथुनों के पास हाथ रखकर देखा और उनका हाथ छूकर परखा।
      "म्...हूँ! अब कोई फ़ायदा नहीं... सब खत्म हो गया!"
     मटिल्डा ने उदास होकर कहा।
     "अब हम क्या करेंगे अम्मा?"
गुरु जी ने पूछा।
       "सबसे पहले तुम्हारे पापा को बताएंगे।"
      "जी, मैं अभी उन्हें बुलाकर लाता हूँ,"
गुरु जी ने कहा।
         सुबह होने के साथ ही गुरु जी के घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। गीता को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है, लेकिन उसने देखा कि उस दिन से विशाल फूफा, पापा, बुआ आदि सभी घर पर ही थे और लोगों का लगातार आना-जाना लगा हुआ था। पड़ोसी और रिश्तेदार गीता के परिवार के लिए बाहर से खाना लेकर आ रहे थे। घर के अंदर बहुत भीड़ थी और सभी ने सफेद कपड़े पहन रखे थे। गीता इन सब बातों से बिल्कुल अनजान थी। तभी उसकी माँ ने उसके पास आकर धीमी आवाज़ में कहा,
      "गीता, तुझे पता है? छूटो दादा अब हमारे बीच नहीं रहे।"
     माँ की वह बात गीता को समझ में नहीं आई, क्योंकि उस समय वह सिर्फ पाँच साल की बच्ची थी। इसलिए जीना, मरना जैसी बातें उसके लिए बिल्कुल अजनबी थीं। उसने अपनी माँ से कुछ नहीं कहा और बस सोचने लगी। कुछ देर बाद गीता ने मासूमियत से पूछा,    
"माँ... छूटो दादा अब नहीं रहे, तो वे फिर कब रहेंगे?"
"कभी नहीं।"
"इसका क्या मतलब है?"
"इसका मतलब है कि वे अब कभी वापस नहीं आएंगे।"
"क्यों माँ, ऐसा क्यों?"
"क्योंकि वे मर गए हैं।"
मर गए ? वह क्या होता है?"
"मरना... यानी मृत्यु।"
"क्या हमारे साथ भी ऐसा ही होगा, माँ?"
"हाँ गीता..."
"माँ, अब कहाँ हैं छूटो दादा?"
"अब वे उस बड़े बक्से... यानी ताबूत में हैं।"
"मुझे भी देखना है!"
"अरे नहीं-नहीं! अगर तुम वहाँ गईं, तो पापा मुझे बहुत डांटेंगे।"
      उनकी वह बातचीत वहीं खत्म हो गई, लेकिन उसके बाद गीता अक्सर सोचा करती थी कि मृत्यु के बाद इंसान पूरी तरह टूटकर बिखर जाता है। उसके ऐसा सोचने का कारण यह था कि गुरु जी ने कुसुमलता से साफ कह दिया था कि बच्चियों को छूटो दादा का शव मत दिखाना। कुसुमलता ने भी गीता को उस ताबूत के आसपास भटकने तक नहीं दिया था।
        दो दिन बाद घर का माहौल फिर से बदल गया। सब-कुछ बहुत बारीकी से देखने वाली गीता ने गौर किया कि उस दिन शाम के बाद छूटो दादा का वह संदूक वहाँ नहीं था। जब उसने अपनी माँ से पूछा, तो उन्होंने बताया कि अब वे ज़मीन के भीतर हैं।
                     ***
      
        उस वर्ष जनवरी के महीने तक गीता करीब पाँच साल आठ महीने की हो चुकी थी, और आचार्य समरसिंह ने उसे अपने ही स्कूल की पहली कक्षा में दाखिल करा दिया था। स्कूल में उसे न केवल अपने पिता गुरु जी समरसिंह का, बल्कि सभी छात्र-छात्राओं और शिक्षक-शिक्षिकाओं का भी भरपूर प्यार मिलता था। लेकिन स्कूल में उसके सामने एक अजीब तरह की समस्या खड़ी हो गई थी। बात यह थी कि अंतराल के समय जहाँ स्कूल के सभी बच्चे पूरे मैदान में दौड़-भाग करते और तरह-तरह के खेल खेलते थे, वहीं अपने पिता के असीमित प्यार के कारण गीता के लिए खेलना पूरी तरह मना था। आचार्य समरसिंह ने गीता पर कोई सख्त पाबंदी नहीं लगाई थी, लेकिन अपने बेहद आज्ञाकारी स्वभाव के कारण, उसने पहले ही दिन अपने पिता द्वारा कही गई इस बात को गाँठ बाँध लिया था:
      "बिटिया रानी, तुम उन बच्चों के साथ नहीं खेल सकतीं। गिर जाओगी तो चोट लग जाएगी... इसलिए क्लास में ही बैठकर कोई किताब पढ़ा करो।"
   गीता के अत्यधिक आज्ञाकारी स्वभाव रूपी अंकुश ने, खेलने की उसकी तीव्र इच्छारूपी विशाल हाथी को, अनजाने में ही पिता द्वारा कहे गए इन शब्दों के मार्ग पर अग्रसर कर दिया था।
     स्कूल की स्थिति ऐसी होने के बावजूद, घर लौटने पर कुसुमलता गीता की बाल्यावस्था रूपी तितली को मिट्टी के बर्तन में बंद करके रख देती थी। इसके बाद भी, गीता अपनी माँ द्वारा सौंपे गए कामों के बीच-बीच में चित्रकारी जैसे मनोरंजक कार्यों और अपने स्कूल के काम में लगी रहती थी।            उस समय कुसुमलता पुनः गर्भवती थीं। पहले से ही तीन बेटियों की माँ होने के कारण, वे गर्भावस्था में खुद को आराम देने के लिए गीता का सहारा लेती थीं। परंतु, इसके बावजूद वे गीता को अंग्रेज़ी के शब्द, गणित, इतिहास और बाल कहानियों जैसी कई चीज़ों का ज्ञान भी दे रही थीं।
[अगले भाग से संबंधित]


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