•गीतातीत-[7]

                उस घटना को गुजरे दो हफ्ते हो चुके थे। निशा अपने पूरे शबाब पर थी और घर के सभी सदस्य रात्रिभोज के पश्चात निद्रा के आगोश में समा चुके थे। तभी, रात के लगभग ग्यारह बजे, सन्नाटे को चीरती हुई बाहर से किसी की चीख गूँज उठी—

     "अरे... मेरे बड़े गुरु साहब जी...! सर्वनाश हो गया... सर्वनाश हो गया…!! आज तो हम मिट गए! बचा लीजिए हमें, बचा लीजिए…!!! शीघ्र आइए... हमारी सहायता कीजिए...! मेरे हुज़ूर... हमें बचा लीजिए…!!"
     इस प्रकार बदहवास चिल्लाते हुए किसी के समरसिंह जी के आवास की ओर ही दौड़े चले आने पदचाप साफ़ सुनाई दे रही थी। बिस्तर पर लेटी गीता स्तब्ध होकर इस पूरी हलचल को सुन रही थी। तभी सन्नाटे को भेदती हुई कदमों की एक डरावनी आहट उसके कानों में पड़ी—
"डिग-डिग, डिग-डिग, डिग-डिग, डिग-डिग...."
       तेजी से बढ़ते उन भारी कदमों की आवाज़ सुनते ही गीता चौंक उठी और उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। उसे भनक लगी कि उसके पिता ने उठकर अत्यंत शांति से मुख्य द्वार खोला। समरसिंह जी अपने पिता जॉन के विपरीत स्वभाव के थे; वे किसी भी विकट परिस्थिति में अपना धैर्य नहीं खोते थे। कुसुमलता और कुसुमा को छोड़कर परिवार के बाकी सदस्य समरसिंह जी की पीठ के पीछे मुस्तैद हो गए थे। चूँकि कुसुमलता गर्भवती थीं, इसलिए सुरक्षा के लिहाज़ से वे अग्रिम पंक्ति में नहीं आईं। वहीं कुसुमा भी आगे नहीं गईं, क्योंकि उनकी गोद में चार महीने का एक छोटा सा बच्चा था।
     बदहवास चिल्लाता हुआ वह आदमी गुरु जी के घर के सामने आकर रुका। उसे देखते ही मटिल्डा चौंककर बोलीं,
      "अरे! यह तो कंधों पर राजमिस्त्री है ना!"
     गीता अपनी माँ के पास चली गई।
     "बचा लो हमें, बचा लो...! मेरी बहू को बच्चा होने वाला है, बच्चा होने वाला है!!.... देखो मेरे हुज़ूर, जल्दी चलो ना...!"
     "अरे ओ, राजमिस्त्री!! यह क्या बकवास कह रहे हैं आप? बातें घुमाए बिना साफ़-साफ़ और जल्दी कहो, हम सुन रहे हैं!!"
     मटिल्डा ने थोड़े कड़े स्वर में कहा।"
      "अरे ब... ब... बड़ी मालकिन! बहू को बच्चा पैदा हो रहा है! आधा बाहर भी आ चुका है। अरे मेरे गुरु साहब! भगवान आपकी रक्षा करें,……! जल्दी चलकर मेरी बहू को बचा लो ना……!"
    बाघ की गुर्राहट जैसी भारी और कांपती आवाज में यह कहते हुए, वह शख्स हाथ जोड़कर रो पड़ा।
मटिल्डा ने तुरंत पूछा,
    "धर्मपाल कहाँ है? क्या वह घर पर नहीं है?"
    "हमारा बेटा घर पर नहीं है, मालकिन!"
    कहते हुए वह आदमी फूट-फूटकर रोने लगा।
      तभी मटिल्डा ने अपने बेटे आचार्य समरसिंह को तुरंत अंदर बुलाया और उनसे कहा,
     "छोटे बेटे, उसकी मदद करनी ही होगी। है ना?"   
    "बात तो सही है,... लेकिन हम कैसे मदद करेंगे, अम्मा?"
    गुरु जी ने असमंजस में पूछा।
    "अरे भाई! अगर हम नहीं गए तो वह औरत मर जाएगी ना!"
     मटिल्डा छटपटाते हुए बोलीं।
     "अरे अम्मा, पागल हो गई हो क्या?... यह बहुत बड़ी समस्या बन जाएगी! मेरी नौकरी भी जा सकती है।"
     गुरु जी ने अपनी चिंता जताई।
      "अरे, मैं हूँ ना छोटे बेटे... तू डर मत! अगर सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा तो मैं जाऊँगी। चल न मेरे बच्चे, हम दोनों चलेंगे!"
    मटिल्डा ने दृढ़ता से कहा।
     गुरु जी, मटिल्डा, जॉन जी और मिल्टन तुरंत 'कंधों पर राजमिस्त्री' के साथ चले गए। गीता ने देखा कि जाते समय पापा अपने साथ कैंची, सर्जिकल स्पिरिट की शीशी, सुई और धागा लेकर गए थे।
       "माँ, वे बूढ़े बाबा कौन हैं?"
     उसने अपनी अम्मा कुसुमलता से पूछा।
       "वे 'कंधों पर राजमिस्त्री' हैं।"
     कुसुमलता ने जवाब दिया।
    "आँ...? ऐसा भी कोई नाम होता है क्या?"
   गीता ने अचरज से पूछा।
      "अरे नहीं-नहीं, वह उनका असली नाम नहीं, बल्कि एक उपनाम है जो गाँव वालों ने उन्हें दिया है। उनका असली नाम तो मुझे भी नहीं पता।''
      "पर माँ, लोगों ने उन्हें ऐसा नाम क्यों दिया?''
     "हूँ……मैंने सुना है कि वे अपनी शादी के दिन, अपनी दुल्हन को अपने कंधों पर बिठाकर घर लेकर आए थे। बस, उसी दिन से गाँव के लोगों ने उन्हें 'कंधों पर राजमिस्त्री' कहना शुरू कर दिया था, क्योंकि वे एक राजमिस्त्री भी हैं।"
     "अरे! यह तो एक ज़बरदस्त कहानी है।"
    वे दोनों माँ-बेटी यह बात कर ही रही थीं कि तभी मिल्टन वापस घर आए और उन्होंने हड़बड़ाते हुए कुसुमलता से कहा,
     "बड़ी मालकिन! मैं थोड़ा गर्म पानी, सूखी लकड़ी, नारियल के खोल और माचिस का डिब्बा लेने आया हूँ। जल्दी से ये चीज़ें तैयार कर दीजिए।"
      कुसुमलता तुरंत उन चीज़ों को इकट्ठा करने लगीं। इसी बीच उन्होंने मिल्टन से पूछा,
     "क्यों मिल्टन भैया! क्या उतने घने जंगल के बीच में बने हुए उस घर में जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं है?!"
     "क्या कहूँ बड़ी मालकिन!… वहाँ तो ज़मीन पर लीपा हुआ गोबर भी जगह-जगह से उखड़ गया है। उस बेचारी औरत को लिटाने के लिए एक अदद बिस्तर तक नहीं है। अरे बड़ी मालकिन, थोड़ा मिट्टी का तेल भी दे दीजिए, वह भी ले जाना पड़ेगा।… न जाने आगे चलकर हमारे भैया को ही उसकी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी, हाहाहाहा!"
    इस तरह मज़ाक उड़ा के हँसते हुए सारा सामान भी लादकर वापस जा रहे अपने चाचाजी के उस उपहासपूर्ण अंदाज़ को गीता बड़े अचरज से देख रही थी।
     इसके बाद मिल्टन और जॉन लगातार चक्कर लगा रहे थे। वे एक-एक करके पानी, कॉफी, अदरक, साबुन, ओडीक्लोन, बाल्टी, पुराने कपड़े, बाम और आग सुलगाने के लिए एक बड़ा लोहे का तसला जैसी तमाम चीज़ें उठाकर ले जा रहे थे। जब जॉन अगली बार आए, तब कुसुमलता ने उनसे पूछा—
     "क्यों बड़े मामाजी, सच में उस घर में कुछ भी नहीं है क्या? और यहाँ से ले जाने में तो कोई दिक्कत नहीं, लेकिन सूत, लकड़ी, पानी जैसी चीज़ें भी नहीं हैं क्या उस घर में?"
     "पता नहीं बड़ी मालकिन,… वहाँ तो कुछ भी नहीं था। उस घर की बड़ी बच्ची से जब कुछ माँगा, तो उसने कहा— 'नहीं'। तुम्हारी मामी ने उससे पूछा कि तुम लोगों ने रात को क्या खाया, तब उसने कहा कि साबुत मूँग खाई है। इस पर मामी ने पूछा— 'भात के साथ केवल साबुत मूँग खाई है क्या?'... तब बच्ची ने जवाब दिया— 'नहीं, भात नहीं, सिर्फ साबुत मूँग ही खाई है।"
       इसके बहुत देर बाद गुरुजी, मटिल्डा, मिल्टन और जॉन घर लौटे। उनके आते ही कुसुमलता ने अपनी सास मटिल्डा से—जो रिश्ते में उनकी मामीजी भी लगती थीं—पूछा—
     "क्या हुआ मामी जी, सब ठीक है ना? और... नन्हा मेहमान कौन आया है, बेटी या बेटा?"   
       दादी ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा,
       "बेटी हुई है। पर हालत देखकर दिल बैठ गया बड़ी मालकिन।... उस नन्ही बच्ची को सुलाने के लिए उनके पास एक बिस्तर तक नहीं है। कितनी अजीब और लाचार दुनिया है।"
     बिस्तर पर लेटने के बाद, कुसुमलता ने धीरे से मुस्कुराते हुए फुसफुसाकर अपने पति गुरु जी से कहा,
     "सुनिए, जो कुछ भी हुआ... उसके बारे में बाहर किसी को मत बताइएगा। वरना पूरे गाँव के लोग आपको 'दाइयों वाले बड़े गुरु जी' कहना शुरू कर देंगे!"    
     गुरु जी को शर्म आ गई होगी। उन्होंने कहा, 
    "हँ! अरे... पागल है क्या? तुम भी न, कुछ भी कह रही हो।"
[अगले भाग से संबंधित।] 


Comments

Popular posts from this blog

නිශා , නුඹ හිනැහියන්

यादों के फूल।

भोर से हीरक तक-[ 2 ]