•गीतातीत-[8]

            एक शनिवार की सुबह लगभग दस बजे, मटिल्डा लेस गूंथ रही थीं। कुसुमलता अपने छोटे बेटे को सुला रही थीं और गीता चित्र बना रही थी। उसकी दो बहनें भाग्या और निरुपा, कमरे में खेल रही थीं। मिल्टन, कुसुमा और उनके दोनों  बच्चे स्वर्णा और समिंद कुसुमा के गाँव गए हुए थे। जॉन अपने भाई को देखने गए थे। गुणवती, रमणी और पियसेन उनकी बेकरी में थे। उधर गुरु जी अपनी नानी को देखने गए थे।

       कुछ समय बाद मटिल्डा रसोई की ओर चली गईं। कुसुमलता भी कमरे से बाहर आईं और गीता भी अपनी माँ के पास ही खड़ी थी। तभी एक अनजान व्यक्ति उनके घर की ओर आता दिखा। उसने धूप का चश्मा पहन रखा था। वह  गोरा, छैला युवक, घर के सामने आकर रुका, लेकिन किसी अजनबी की तरह नहीं, बल्कि पूरे हक से सीधा अंदर आया और कुसुमलता से पूछा,
        "मुझे पहचान सकती हो?"
       "म्.... हँ! मुझे तो.... आइए, अंदर आइए। यहाँ बैठिए। मैं अभी आती हूँ।"
      इतना कहकर कुसुमलता ने तुरंत अंदर चली गईं। और वे मटिल्डा के पास गईं। गीता भी अपनी माँ के पीछे-पीछे रसोईघर तक गई।
      "बड़ी मामी, बड़ी मामी!.... ये सुनिए मामीजी !  कोई आया है। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसे पहचान सकती हूँ? मुझे तो समझ नहीं आ रहा। आप ज़रा जाकर देख लीजिए कि वह कौन है।"
      कुसुमलता मटिल्डा को 'बड़ी मामी' बोलती थीं, क्योंकि गीता के दादाजी और नानी सगे भाई-बहन थे।
      मटिल्डा फटाफट बाहर चली गईं। कुसुमलता और गीता भी उनके पीछे-पीछे गईं।
     "अरे!, यह हमारा शरत है ना! हे हे हे... तो कैसे हो शरत? कैसे आना हुआ? अब तुम कहाँ रहते हो? कितने लंबे समय बाद आए हो! वैसे शरत, क्या तुमने अब शादी-वादी आदि कर ली है?... और बिटिया रानी, यह तो तुम्हारे मामाजी हैं।"
      गीता ने देख रहा था कि दादी ने एक ही सांस में कई सवाल पूछ डाले।
    "... बड़ी मामी ने तो मुझे झट से पहचान लिया, लेकिन मेरी अपनी बड़ी बहन ही मुझे नहीं पहचान पाईं!...  इसका मतलब हमारी बड़ी मामी की आँखें अब भी बहुत अच्छी हैं, हा हा हा!"
      शरत ने हँसते हुए कहा।
       "अरे, मैं कैसे पहचानती? तुम तो बहुत समय पहले हमारे घर से भाग गए थे। उस समय तुम्हारे चेहरे पर मूंछें भी नहीं थीं! वैसे अब तुम शादीशुदा हो क्या?
     कुसुमलता ने पूछा।
     "पहले मैं हमारी बड़ी मामी के सवालों का जवाब दूँगा। ...मैं 'पोलोन्नरुवा' शहर में रहता हूँ, क्योंकि मेरी शादी वहीं हुई है।"
  शरत ने कहा।
     "पत्नी का नाम क्या है? और...  बच्चे भी हैं क्या?"
      वह आवाज़ कुसुमलता की थी।
        "उसका नाम 'वायलेट' है। एक बेटा है और दूसरा अभी आने वाला है। कल रात ही मैंने सोचा कि गाँव जाना चाहिए। वैसे, यह बिटिया अब कौन सी कक्षा में पढ़ रही है?"
     "अभी तो यह पहली श्रेणी में पढ़ रही है।... रुको ज़रा मैं चाय फटाफट बना कर लाती  हूँ।"
      यह कहकर कुसुमलता घर के अंदर चली गईं।
      "शरत , ...क्या तुम तुडुगला गाँव गए हो?"
     मटिल्डा ने पूछा।
      "अभी तक तो नहीं। सोच रहा था कि सबसे पहले बड़ी दीदी के पास ही जाऊँगा।"
     "...कल ही चले जाओ। तुम्हें देखकर अपनी नानी को बहुत अच्छा लगेगा। तुम तो उनकी आँखों का तारा हो ना!"
      अगले दिन सुबह ही शरत तुडुगल गाँव जाकर शाम वापस लौट आए। वे एक सप्ताह तक अपनी बड़ी दीदी के यानी कुसुमलता के यहाँ रहे। उस सप्ताह के दौरान वे हर शाम घूमने बाहर जाते थे और उन्होंने गाँव के हर एक व्यक्ति को पहचान लिया था।
        उसके वापस चले जाने के बाद, बिना किसी खास घटना के लगभग दो हफ़्ते गुज़र गए।
             
            फिर एक दिन गीता के दादाजी, जॉन, अचानक एक तार लेकर आए। यह उनके सबसे छोटे भाई विलियम का था, जो उस समय कोलंबो में जिला सचिव थे और अपनी पत्नी के गाँव, कोट्टे में घर बना कर रहते थे। उन्होंने वह तार कुसुमलता के हाथ में रख दिया। कुसुमलता ने जब उसे देखा, तब उसे समझ आया कि उसके छोटे मामाजी ने इसे गुरुजी के लिए भेजा था।    
    फिर कुसुमलता ने वह तार सभी को पढ़कर सुना दिया—
     "दादी का देहांत हो गया है। अंतिम संस्कार शनिवार, ग्यारह तारीख को किया जाएगा। — छोटे चाचा।"
     तभी गुरुजी और मटिल्डा भी वहाँ आ गए। गीता ने देखा कि उसकी माँ ने रोते हुए कहा,  
    "क्या? ... तो क्या हम अभी जाएँगे ना?"
       तभी पापा ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा,
     "अरे बड़ी मालकिन... तुम?... तुम कैसे जाओगी? फिर बच्चियों को किसके साथ छोड़ेंगे?… तुम हमारी माँ के साथ घर पर ठहरो। मैं पिताजी के साथ जाऊँगा।"
      उनकी बात खत्म होते ही दादी अम्मा ने कहा,           
      "बड़ी मालकिन, तुम्हारा दुख बिल्कुल जायज है। जब तुम्हारे माता-पिता नहीं रहे, तब तुम्हारे मामाजी के साथ मिलकर तुम्हें पालने-पोसने वाली तुम्हारी नानी अम्मा ही तो थीं... लेकिन बड़ी मालकिन, जरा अपनी इस हालत को तो देखो! एक तो तुम गर्भवती हो, ऊपर से इन तीन छोटी-छोटी बच्चियों को लेकर अगर वहाँ जाओगी, तो तुम अपनी नानी अम्मा का आखिरी बार चेहरा भी ठीक से नहीं देख पाओगी।…और फिर, अब जब उनकी उम्र एक सौ एक साल हो चुकी थी, तो तुम्हारी नानी अम्मा इससे ज्यादा और कितने दिन जीतीं... अगर यह ज़रूरत हमारे तुडुगल गाँव में होती, तो हम सब मिलकर वहाँ चले जाते... ऊपर से, तुम्हारे छोटे मामा के घर के आस-पास हमारा कोई जान-पहचान वाला भी नहीं रहता। इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम्हारे बड़े मामा के साथ हमारे छोटे बेटे को ही जाकर आने दो..."
       उसी दिन कुछ देर बाद कुसुमलता ने गीता से फुसफुसाकर कहा,
     "देखो गीता, बचपन में ही मैंने अपने माँ-बाप को खो दिया था। तब से हम तीनों को नानीजी ने ही पाला-पोसा। आज उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने का नसीब भी नहीं है मुझे।"
      "माँ, नानी को क्या हुआ है?"
गीता ने पूछा।
    "मेरी नानी भी भगवान के पास चली गई हैं।"
     "भगवान के पास?.. तो यह तो अच्छा है ना?"
   "तुम्हारे बड़े दादा, .. मतलब छोटे दादा... उनके साथ जो कुछ हुआ था, आज मेरी नानी के साथ भी वही हुआ है।"
     "माँ, वे भगवान के पास चली गईं जो नानी माँ आपकी हैं ना,... तो मेरी नानी माँ कहाँ हैं अब?"
     "तुम्हारी नानी माँ भी भगवान के पास चली गई हैं।"
     "तो माँ, आपने मुझे उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने का नसीब क्यों नहीं होने दिया?"
     "अरी गीता, तुम्हारी नानी माँ के अंतिम संस्कार के दिन तो तुम इस दुनिया में आई भी नहीं थी।"
    कुसुमलता यह कहकर घर के अंदर चली गई, क्योंकि उसे गीता की छोटी बहन निरूपा, यानी 'गोरी' के रोने की आवाज़ सुनाई दे गई थी।
                       ••
[अगले भाग से संबंधित] 


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