•गीतातीत-[9]
उस घटना के लगभग एक सप्ताह बाद जॉन जी ने सभी बच्चों को बुलाया।
"बिटिया रानी स्वर्णा, रमणी, भाग्या... बच्चियों, तुम सब जाओ। बुआ के घर जाओ, जल्दी करो!"
"दादाजी, मेरा छोटा भाई?"
स्वर्णा ने पूछा।
"उसे छोड़ दो, तुम अपनी बहनों के साथ जाओ। मैं कुछ समय बाद तुम सभी को बुलाऊँगा, तब वापस आना।"
तभी मटिल्डा, गीता की सबसे छोटी बहन गौरी को भी लेकर आईं और बोलीं,
"बिटिया रानी... तू इस गौरी को भी अपने साथ ले जा।"
ऐसा कहकर उन्होंने गोरी बहन को गीता को सौंप दिया। सभी बच्चियां नीचे गुणवती के घर चली गईं। काफी देर बाद जब जॉन जी ने उन्हें आवाज़ दी, तब वे वापस ऊपर अपने घर आईं।
"बिटिया रानी, जरा इधर तो आना..."
अपनी दादी की ममता भरी आवाज़ सुनकर गीता कमरे की तरफ चली गई। वहाँ का दृश्य देखकर वह ठिठक गई— बिस्तर पर उसकी माँ लेटी हुई थीं और उनके पास एक छोटा-सा, बेहद सुंदर नवजात बच्चा था।
"यह देखो, तेरा छोटा भाई है यह। आजा, इधर आकर यहाँ बैठ जा।"
मटिल्डा ने लाड़ से कहा। जब गीता बिस्तर पर बैठ गई, तो मटिल्डा ने गीता के छोटे भाई को उसकी गोद में लिटा दिया। उसे तुरंत याद आया कि जब कुछ समय से पहले कुसुमा चाची का बेटा पैदा हुआ था, तब भी दादी ने उसे बिल्कुल इसी तरह अपनी गोद में रख दिया था और वह उस छोटे भाई के प्रति उपजे स्नेह के कारण एक ही मुद्रा में बहुत देर तक बैठी रही।
इस वक्त भी गीता अपने इकलौते भाई को भी उसी तरह बहुत प्यार से गोद में रख कर निश्चल थी। इस तरह अब गीता की दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई हो गए।
लेकिन जैसे ही मटिल्डा कमरे से बाहर गईं, कुसुमलता ने गीता से कहा,
"गीता, बच्चे को मुझे दे दो और तुम आँगन से दो-तीन जलाऊ लकड़ियाँ अंदर ले आओ।"
गीता वह काम निपटाने बाहर चली गई। उसी बीच कुसुमलता ने फिर से उसे पुकारा,
"गीता...! गीता..., अरी ओ गीता...!!!"
"…मैंने कितनी बार मना किया है कि छोटी बच्चियों को उनका नाम लेकर मत पुकारा करो!... लेकिन हाँ, यह औरत तो कभी नहीं सुधरने वाली।....."
कमरे से आई यह कड़क आवाज़ गुरु जी की थी।
उनके के मना करने के बावजूद भी कुसुमलता हमेशा गीता को नाम से ही पुकारती थीं। हाँ, गुरु जी के सामने उन्होंने खुद को बदल लिया था और 'गीता बेटी' कहकर बुलाने की आदत डाल ली थी।
•••
वैसे, जब गीता दूसरी श्रेणी में पढ़ती थी, एक शाम लगभग छह बजे जॉन जी ने अपनी बहू तथा भांजी कुसुमलता से कहा,
"बड़ी मालकिन, अब मैं नीचे घर जा रहा हूँ। वहाँ मुझे कुछ काम है। रात के खाने के लिए तुम मेरे लिए कुछ तैयार कर दो, क्योंकि मैं आज रात को वापस घर नहीं आऊँगा।… वैसे, बड़ी मालकिन, क्या अब घर पर खाना तैयार है या नहीं?"
"खाना तो मैं तैयार कर चुकी हूँ मामाजी! रुकिए, मैं अभी लेकर आती हूँ,"
कुसुमलता ने कहा।
और कुछ देर बाद कुसुमलता खाने का डिब्बा ले आईं और उसे अपने मामाजी के हाथ में सौंप दिया। डिब्बा लेकर जॉन जी चुपचाप अपनी बेटी के घर चले गए।
उस वक्त समरसिंह जी के घर के सामने की पगडंडी पर बहुत सारे लोग आ-जा रहे थे, क्योंकि उसी रात फ़ॉन्सेका मिस की शादी का जश्न होने वाला था। लोग उन शिक्षिका जी को 'फॉंसेका मिस' इसलिए कहते थे क्योंकि उनका कुलनाम 'फॉंसेका' था। गुरु जी के घर से उनके घर की दूरी लगभग दो किलोमीटर थी।
शाम से लेकर देर रात तक सामने के रास्ते पर काफी गहमागहमी थी। उस रात करीब दस बजे, जब घर में सभी सो रहे थे, तब कुसुमलता ने अपनी बेटियों को जगाया और कहा,
"गीता, भाग्या, जल्दी आओ! तुम्हें कुछ दिखाना है।"
गीता और भाग्या अपनी आँखें मलते हुए माँ के पीछे-पीछे चली गईं।
"वह देखो! वहाँ, वहाँ...! अरे भाग्या, यहाँ नहीं, वहाँ देखो... उन लालटेनों की रोशनी की तरफ देखो!"
"किधर माँ?"
भाग्या ने पूछा।
"अरे बुद्धू! उन पेड़ों के बीच में देखो!!"
"हाँ...!! जी माँ, अब दिखा।"
"वे लोग इसी तरफ आ रहे हैं। आज फ़ॉंसेका मिस दुल्हन बन गई हैं," कुसुमलता ने बताया।
गीता और भाग्या कभी किसी की शादी के उत्सव में शामिल नहीं हुई थीं। इसका कारण यह था कि गुरु जी अपनी बेटियों को कहीं भी बाहर जाने नहीं देते थे। उनका हमेशा यही कहना था कि अगर बच्चों को बचपन में ही सही अनुशासन न दिया जाए, तो बड़े होने पर उन्हें कोई नहीं सुधार सकता। उनका मानना था कि अगर बच्चियों ने बचपन में कोई गलत चीज़ देख ली, तो आगे चलकर उनके लिए ही परेशानी खड़ी हो सकती है।
"दुल्हन? वह क्या होती है माँ?"
भाग्या ने मासूमियत से पूछा।
"मतलब आज उनकी शादी हो रही है।"
"पर किसकी शादी माँ?"
"अरे पगली!... फ़ॉन्सेका मिस की ही तो! और किसकी होगी भला, मेरी?"
"वह तो किसी जुलूस जैसा दिख रहा है ना, माँ?"
"हाँ, वह भी एक जुलूस ही होता है।"
"अरे वाह! फिर तो वहाँ हाथी, नाचने वाले और ढोल-नगाड़े बजाने वाले भी होंगे?"
"मुझे भी पक्का नहीं पता, लेकिन भेरियों की आवाज़ तो आ ही रही है ना... चलो, यहीं से ध्यान से देखते हैं,"
कुसुमलता ने कहा।
गीता के स्कूल की किताबों में जुलूस की तस्वीरें छपी थीं, और भाग्या भी उन किताबों को लेकर तस्वीरें देखती थी। इसलिए गीता और भाग्या जानती थीं कि जुलूस क्या होता है। गीता ने देखा कि कुछ ही देर में चाचीजी, स्वर्णा, दादीजी और पिताजी भी उनके पास आ गए। उसे यह भी पता था कि उस दिन चाचाजी मिल्टन घर पर नहीं थे, इसीलिए ही वे इस जुलूस को देखने नहीं आए।
थोड़ी देर बाद गीता की छोटी, गोरी बहन भी आँखें मलती हुई उनके पास आ गई। वह अब तक सो रही थी और उस समय सिर्फ दो साल आठ महीने की बच्ची थी।
गुरु जी के घर के चारों ओर जो बड़े-बड़े पेड़ थे, उनके पत्तों के बीच से, जगमगाते हुए जुगनुओं की तरह, लालटेनों की रोशनी जगह-जगह बिखर रही थी। उन दिनों उनके गाँव में पानी, बिजली और गाड़ियों जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, फिर भी रात का वह मंगल उत्सव बहुत ही मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहा था।
तभी वह नव-दंपति गुरु जी के घर के सामने से पैदल गुज़र रहे थे। गीता की गोरी बहन यानी निरूपा ने अपनी दादी मटिल्डा से पूछा,
"उस हाथी को गोरी साड़ी क्यों पहनाई है?"
उसका यह सवाल सुनकर पास खड़ी कुसुमलता की बत्तीसी खिल गई। यह देख गोरी को गुस्सा आ गया और वह जोर से रोने लगी।
"ओहो... मेरी लाड़ली, तू रो मत। मैं तुझे बताती हूँ... मेरी छोटी बिटिया, वह हाथी नहीं है, वह दुल्हन है। फोंसेका मैडम बहुत मोटी हैं ना... भला कौन नहीं सोचेगा कि जुलूस में जा रहा वह जीव एक हाथी है?"
दादी ने कहा।
"दादी माँ, दुल्हन किसे कहते हैं?"
गोरी ने पूछा।
"बहुत खूबसूरती से सजी हुई औरत को हम 'दुल्हन' कहते हैं।"
"औरतों को!... हूँ।... दादी माँ, कहाँ जा रही थी वह दुल्हन?"
"वह अपने पति के घर रहने जा रही थी।"
"पति? कौन है वह?"
"शादी के दिन लड़कियों को पति मिलता है।"
"क्या दादी माँ भी दुल्हन बनी थीं?"
"हाँ, मैं भी दुल्हन बनी थी।"
"हूँ...! तो वह पति कहाँ है, जो दादी माँ को शादी के दिन उपहार के रूप में मिला था?"
"वे तो तुम्हारे दादा जी हैं ना।"
उन दोनों की यह बातचीत सुनकर कुसुमलता अपनी हँसी दबाने की कोशिश कर रही थीं। गोरी ने कुसुमलता की तरफ देखा और सवाल पूछना बंद कर दिया। फिर उसने अपना मुँह लटका लिया। यह देखकर मटिल्डा ने कुसुमलता से कहा,
"अरी ओ बड़ी मालकिन…, इतना हँसना अच्छा नहीं है। बहुत जल्द कोई मुसीबत आ सकती है।"
[अगले भाग से संबंधित]
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